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सबरीमाला केस, सुप्रीम कोर्ट बोला बार-बार रुख नहीं बदल सकते:बोहरा समाज में बहिष्कार और धार्मिक अधिकारों पर 1986 की PIL की वैधता पर सवाल उठाए

सुप्रीम कोर्ट में बुधवार को सबरीमाला मामले की सुनवाई हुई। कोर्ट ने 40 साल पुरानी जनहित याचिका ( PIL) की वैधता पर सवाल उठाए। यह याचिका दाऊदी बोहरा समुदाय में बहिष्कार (एक्सकम्युनिकेशन) के अधिकार और उसके संवैधानिक संरक्षण से जुड़ी है। कोर्ट ने कहा कि उसे पुराने फैसले के साथ रहना होगा और वह अपना रुख अचानक नहीं बदल सकता। नौ जजों की संविधान पीठ यह सुनवाई कर रही है। इसमें महिलाओं के धार्मिक स्थलों में प्रवेश, जैसे सबरीमाला मंदिर, और अलग-अलग धर्मों में धार्मिक स्वतंत्रता के दायरे पर भी विचार हो रहा है। 7 सवाल, जिन पर बहस हो रही… क्या है मामला? यह मामला 1986 में सेंट्रल बोर्ड ऑफ दाऊदी बोहरा कम्युनिटी की PIL से जुड़ा है। इसमें 1962 के उस फैसले को रद्द करने की मांग की गई थी, जिसमें बॉम्बे प्रिवेंशन ऑफ एक्सकम्युनिकेशन एक्ट, 1949 को रद्द कर दिया गया था। उस कानून के तहत किसी सदस्य को बहिष्कृत करना गैरकानूनी था। 1962 के फैसले में कहा गया था कि धार्मिक आधार पर बहिष्कार का अधिकार समुदाय के धार्मिक मामलों के प्रबंधन का हिस्सा है। इसलिए 1949 का कानून संविधान के अनुच्छेद 26(b) के तहत मिले अधिकारों का उल्लंघन करता है। सुनवाई के दौरान वरिष्ठ वकील राजू रामचंद्रन ने सुधारवादी बोहराओं की ओर से दलील दी। उन्होंने कहा कि बहिष्कार सीधे तौर पर मानव गरिमा को प्रभावित करता है। उन्होंने यह भी बताया कि उनके मुवक्किल के पिता असगर अली इंजीनियर खुद बहिष्कार के शिकार रहे थे। रामचंद्रन ने कहा कि दाऊदी बोहरा समुदाय में धार्मिक प्रमुख को “दाई” कहा जाता है, जिसे सर्वोच्च अधिकार प्राप्त है। उन्होंने बताया कि बच्चे बालिग होने पर दाई के प्रति पूर्ण निष्ठा की शपथ लेते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि हर धर्म में अनुशासन बनाए रखने के लिए कुछ नियम होते हैं। लेकिन असली सवाल सजा की सीमा और उसके मानव गरिमा पर असर का है। इस दौरान जस्टिस नागरत्ना ने पूछा कि क्या याचिका आर्टिकल 32 के तहत 1962 के संविधान पीठ के फैसले को रद्द करने की मांग कर रही है। उन्होंने कहा कि कोर्ट अपने ही पुराने फैसले को ऐसे कैसे नजरअंदाज कर सकता है। कॉन्सिट्यूशन बेंच का फैसला बदला तो यह गंभीर मुद्दा उन्होंने कहा, “हम भी सख्त नियमों से बंधे हैं। अगर हर आर्टिकल 32 की याचिका पर कॉन्सिट्यूशन बेंच के फैसले को बदला जाएगा, तो यह गंभीर मुद्दा है।” जस्टिस नागरत्ना ने यह भी कहा कि कोर्ट कल सबरीमाला मामले में इसी तरह की याचिकाओं पर सवाल उठा रहा था। ऐसे में अब अलग रुख नहीं अपनाया जा सकता। इससे पहले मंगलवार को कोर्ट ने इंडियन यंग लॉयर्स एसोसिएशन से भी सवाल किए थे। इसी NGO की याचिका पर सबरीमाला मंदिर में सभी उम्र की महिलाओं के प्रवेश की अनुमति दी गई थी। इसी बीच, वरिष्ठ वकील डेरियस खंबाटा ने पारसी महिला की ओर से दलील दी। उन्होंने कहा कि अगर आर्टिकल 26(b) को ज्यादा महत्व दिया गया तो यह व्यक्तिगत धार्मिक अधिकारों को खत्म कर सकता है। खंबाटा के मुताबिक, आर्टिकल 26(b) का उद्देश्य धार्मिक संस्थाओं को सरकारी हस्तक्षेप से बचाना है, न कि व्यक्तियों के अधिकारों को दबाना। बता दें कि यह मामला 1962 के फैसले को चुनौती देने से जुड़ा है, जिसे बॉम्बे हाई कोर्ट ने भी बरकरार रखा था। सुनवाई गुरुवार को भी जारी रहेगी। सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को कहा है कि अगर कोई पारसी महिला दूसरे धर्म में शादी करती है और उसे समुदाय से बाहर कर दिया जाता है, तो यह पहली नजर में भेदभाव लगता है। सुनवाई गुरुवार को भी जारी रहेगी। सबरीमाला मामले पर 7 अप्रैल से सुनवाई हुई सबरीमाला मंदिर मामले पर 7 अप्रैल से सुनवाई शुरू हुई थी। इस दौरान केंद्र सरकार ने महिलाओं की एंट्री के विरोध में दलीलें रखीं। सरकार ने कहा था कि देश के कई देवी मंदिरों में पुरुषों की एंट्री भी बैन है, इसलिए धार्मिक परंपराओं का सम्मान किया जाना चाहिए। पिछली 9 सुनवाई में क्या हुआ, पढ़िए… 7 अप्रैल : केंद्र की दलील- मंदिर में महिलाओं की एंट्री का फैसला गलत 8 अप्रैल- जो भक्त नहीं, वो धार्मिक परंपरा को चुनौती कैसे दे रहा 9 अप्रैल- सुप्रीम कोर्ट बोला- मंदिरों में एंट्री रोकने से समाज बंटेगा 15 अप्रैल- सबरीमाला मैनेजमेंट बोला- अयप्पा मंदिर रेस्टोरेंट नहीं, यहां ब्रह्मचारी देवता 17 अप्रैल- SC बोला- संविधान सबसे ऊपर, निजी धार्मिक मान्यताओं से उठकर फैसला जरूरी 21 अप्रैल- सुप्रीम कोर्ट ने पूछा-छूने से देवता अपवित्र कैसे होते हैं 22 अप्रैल- सुप्रीम कोर्ट बोला- हिंदू एकजुट रहें, संप्रदायों में बंटे नहीं 23 अप्रैल- इस्लाम में महिलाओं के मस्जिद आने पर रोक नहीं 28 अप्रैल- धार्मिक प्रथाओं के नाम पर सड़कें ब्लॉक नहीं कर सकते 29 अप्रैल- सुप्रीम कोर्ट बोला- धर्म के विनाश का हिस्सा नहीं बनेंगे 5 मई- सबरीमाला केस में वकीलों ने याचिका लगाई; जज ने कहा- अपने लोगों के लिए काम करें

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