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लोकायुक्त ने जिसे फंसाया,वो आरटीआई के दायरे में लाया:रिटायर्ड टीआई ने 9 साल लड़ी कानूनी लड़ाई, बोले- सब मुझे ताने मारने लगे थे

डिपार्टमेंट के लोग मुझे संदेह की नजर से देखते थे। परिवार और समाज को भी लगता था कि यदि लोकायुक्त ने कार्रवाई की है तो जरूर मैंने कुछ गलत किया होगा। मेरी सफाई के बावजूद लोग भरोसा नहीं करते थे। आज सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद सभी को सच्चाई समझ आई। ये कहना है रिटायर्ड टीआई कामता प्रसाद मिश्रा का, जिनकी याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने लोकायुक्त संगठन को आरटीआई कानून के दायरे में ला दिया। 15 जून को कोर्ट ने कहा कि लोकायुक्त की विशेष पुलिस स्थापना कोई खुफिया या सुरक्षा एजेंसी नहीं है, इसलिए उसे आरटीआई से बाहर नहीं रखा जा सकता। कोर्ट ने कहा- इससे जुड़ी छूट वाली अधिसूचना रद्द कर दी। जानिए मिश्रा ने अदालत का दरवाजा क्यों खटखटाया था। ‘अपनों ने भी शक की नजर से देखा’
कामता प्रसाद मिश्रा बताते हैं, “10 फरवरी 2017 को मैं कटनी जिले के माधवनगर थाने में टीआई था। अचानक अनिल तिवारी नाम के व्यक्ति ने लोकायुक्त में शिकायत की कि मैं एक मामले की जांच के बदले उससे 50 हजार रुपए की रिश्वत मांग रहा हूं।”मिश्रा के लिए यह बड़ा झटका था। वे कहते हैं, “जिस शिकायत का हवाला देकर आरोप लगाया गया, उसकी फाइल दो साल पहले ही बंद हो चुकी थी। मेरे पास ऐसा कोई मामला लंबित नहीं था, जिसके बदले मैं पैसे मांगता।” लोकायुक्त ने शिकायत के आधार पर कार्रवाई शुरू की। मिश्रा का कहना है कि भ्रष्टाचार साबित करने के लिए मोटिव, डिमांड, एक्सेप्टेंस और रिकवरी जरूरी हैं, लेकिन उनके मामले में इनमें से एक भी बात साबित नहीं हुई। रसूखदारों के खिलाफ कार्रवाई की मिली सजा
मिश्रा के अनुसार, उन्होंने धारा 307 के एक मामले में प्रभावशाली लोगों के दबाव के बावजूद आरोपी को गिरफ्तार करने से इनकार नहीं किया। इसी रंजिश में उन्हें निशाना बनाया गया। फाइलों का खेल और बदलती सरकारें
अभियोजन स्वीकृति के लिए फाइल सरकार पहुंची तो तत्कालीन गृह मंत्री भूपेंद्र सिंह ने मंजूरी देने को उचित नहीं माना। बाद में गृह मंत्री बाला बच्चन ने नौ बिंदुओं पर स्पष्टीकरण मांगा। लोकायुक्त ने लिखित में माना कि मिश्रा के पास कोई काम लंबित नहीं था, रिश्वत नहीं मांगी गई थी और कोई बरामदगी नहीं हुई थी। इसके बावजूद 2020 में चालान पेश कर दिया गया। छह साल बाद भी आरोप तय नहीं हुए हैं। आरटीआई की जंग और हाई कोर्ट का जुर्माना
मिश्रा कहते हैं, “जब मेरे खिलाफ इतना बड़ा फैसला लिया गया, तो मुझे जानने का हक था कि फाइल पर किस अधिकारी ने क्या टिप्पणी लिखी। लोकायुक्त और सरकार के बीच क्या पत्राचार हुआ और किस आधार पर अभियोजन मंजूर हुआ। इसी लिए मैंने आरटीआई लगाई।” लोकायुक्त ने जानकारी देने से इनकार कर दिया। मिश्रा हाईकोर्ट पहुंचे। हाईकोर्ट ने उनकी दलील सही मानते हुए अधिकारियों पर 5,000 रुपए जुर्माना लगाया और जानकारी देने का आदेश दिया। फिर भी जानकारी नहीं दी गई और मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया। ‘यह सिर्फ मेरी नहीं, व्यवस्था में पारदर्शिता की लड़ाई थी’
कामता प्रसाद मिश्रा के लिए यह आत्मसम्मान की लड़ाई थी। वे कहते हैं, “इस झूठे मामले ने मेरी सामाजिक और विभागीय छवि को नुकसान पहुंचाया। लोग मुझ पर शक करते थे। आज सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद लोगों को सच समझ आ रहा है। मुझे उम्मीद है कि पूरी फाइल सामने आएगी और न्याय मिलेगा।” वे कहते हैं कि यह लड़ाई व्यवस्था में पारदर्शिता की भी थी। जांच एजेंसियां जानकारी छिपाएंगी तो गलतियां सामने नहीं आएंगी। आरटीआई जवाबदेही का सबसे सशक्त माध्यम है। अब आगे क्या… इस फैसले के बाद सवाल है कि क्या लोकायुक्त और अन्य जांच एजेंसियों में पारदर्शिता बढ़ेगी। आरटीआई एक्टिविस्ट शिवानंद द्विवेदी का कहना है कि इसका सीधा असर केवल मध्य प्रदेश लोकायुक्त की SPE पर पड़ेगा, क्योंकि कोर्ट ने सिर्फ उसी अधिसूचना को रद्द किया है। कानूनी खामियों का हवाला देकर अन्य एजेंसियां अब भी जानकारी देने से बच सकती हैं। अभियोजन स्वीकृति और निर्णय प्रक्रिया में पारदर्शिता जरूरी है, हालांकि केस डायरी सार्वजनिक करने की मांग अदालतें पहले खारिज कर चुकी हैं। यह फैसला नजीर बनेगा, लेकिन जानकारी पाने के लिए लोगों को अब भी लंबी कानूनी प्रक्रिया से गुजरना पड़ सकता है।

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