मैहर जिले में त्रिकूट पर्वत पर स्थित मां शारदा का मंदिर आस्था और पौराणिक मान्यताओं का प्रमुख केंद्र है। विंध्य की पहाड़ियों के बीच करीब 600 फीट की ऊंचाई पर स्थित इस मंदिर तक पहुंचने के लिए श्रद्धालुओं को करीब एक हजार सीढ़ियां चढ़ना पड़ती हैं। जिला मुख्यालय से मंदिर की दूरी करीब 6 किलोमीटर है। मान्यता है कि यहां माता सती का हार गिरा था, इसलिए इस स्थान का नाम मैहर पड़ा। बताया जाता है कि मंदिर में स्थापित मां शारदा की प्रतिमा करीब 1500 साल पुरानी है। यहां 50 साल से अखंड ज्योति भी जल रही है। नवरात्र के दौरान मंदिर में विशेष पूजा-अर्चना और आरती होती है। दैनिक भास्कर की टीम ने शारदा धाम पहुंचकर प्रधान पुजारी पवन पांडे महाराज से मंदिर से जुड़ी मान्यताओं, परंपराओं और इतिहास के बारे में जाना। रात में बंद हो जाते हैं पट, सुबह मिलता है सजा हुआ दरबार प्रधान पुजारी पवन पांडे के मुताबिक, मंदिर से जुड़ी मान्यता है कि आल्हा और ऊदल रोजाना मां शारदा की पूजा करने आते हैं। प्राचीनकाल में चंदेल राजा परमाल के सेनापति दसराज के बेटे आल्हा और ऊदल महोबा के वीर योद्धा थे। दोनों मां शारदा के परम भक्त माने जाते हैं। मान्यता है कि उन्होंने ही जंगल और पहाड़ियों के बीच इस मंदिर की खोज की थी। दोनों ने पृथ्वीराज चौहान की सेना से भी मुकाबला किया था। मंदिर के पट रात 12 बजे बंद कर दिए जाते हैं। इसके बाद पुजारी और श्रद्धालु पहाड़ी से नीचे उतर आते हैं। मान्यता है कि रात में मंदिर परिसर में कोई नहीं रुकता। कहा जाता है कि जो यहां रुकने की कोशिश करता है, उसकी मृत्यु हो जाती है। इस मान्यता से जुड़ी एक और खास बात बताई जाती है। सुबह मंदिर के पट खुलने पर मां को अक्षत अर्पित और ताजे फूलों से सजा हुआ पाया जाता है। श्रद्धालु इसे आल्हा-ऊदल के रोजाना पूजा करने आने से जोड़कर देखते हैं। 12 साल तपस्या के बाद देवी ने दिया था आल्हा को आशीर्वाद मान्यता है कि मंदिर की खोज के बाद आल्हा और ऊदल मां की भक्ति में लीन हो गए थे। आल्हा ने देवी को प्रसन्न करने के लिए 12 साल तक कठोर तपस्या की। कहा जाता है कि देवी ने प्रसन्न होकर उन्हें आशीर्वाद दिया। पूजा के दौरान आल्हा मां को ‘शारदा माई’ कहकर पुकारते थे, तभी से देवी को मां शारदा के नाम से जाना जाने लगा। मंदिर के पुजारी दीपक पांडेय के मुताबिक, उनके पिता स्वर्गीय देवी प्रसाद बताते थे कि करीब 1600 ईस्वी में लोगों को त्रिकूट पर्वत पर मां शारदा के मंदिर की जानकारी मिली थी। मान्यता है कि गुरु आदि शंकराचार्य ने भी यहां मां की पूजा की थी। इसके बाद 1951 में स्थानीय लोगों ने पैसे जुटाकर मंदिर के निर्माण और वहां तक पहुंचने के लिए सीढ़ियां बनवाने का काम किया। माता सती का हार गिरने से पड़ा मैहर नाम पौराणिक मान्यता के अनुसार, माता सती भगवान शिव की पहली पत्नी और प्रजापति दक्ष की बेटी थीं। दक्ष भगवान शिव को पसंद नहीं करते थे। उन्होंने एक यज्ञ का आयोजन किया, लेकिन शिव और सती को आमंत्रित नहीं किया। शिव के मना करने के बावजूद सती यज्ञ में पहुंच गईं। वहां दक्ष ने उनका अपमान किया, जिससे दुखी होकर सती ने यज्ञ कुंड में आत्मदाह कर लिया। इसके बाद भगवान शिव सती के शरीर को लेकर तांडव करने लगे। मान्यता है कि सृष्टि का संतुलन बनाए रखने के लिए भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर के टुकड़े किए। उनके शरीर के अंग और आभूषण अलग-अलग स्थानों पर गिरे, जिन्हें शक्तिपीठ माना जाता है। मान्यता के अनुसार, मैहर में माता सती का हार गिरा था। इसी वजह से इस स्थान का नाम ‘माई का हार’ से मैहर पड़ा। मंदिर के पीछे गुफा में 50 साल से जल रही अखंड ज्योति प्रधान पुजारी पवन पांडे के मुताबिक, मंदिर के पीछे स्थित गुफा में 50 साल से अखंड ज्योति जल रही है। इसके पीछे पूर्व प्रधान पुजारी स्वर्गीय देवी प्रसाद की साधना से जुड़ी मान्यता है। बताया जाता है कि देवी प्रसाद मां शारदा की साधना के लिए मंदिर परिसर में स्थान तलाश रहे थे। इसी दौरान मां ने उन्हें गुफा में साधना करने का निर्देश दिया। मान्यता के अनुसार, मां ने उनसे वहां अखंड ज्योति प्रज्वलित करने के लिए कहा था। इसके बाद उन्होंने गुफा में तपस्या की और करीब 50 साल पहले अखंड ज्योति जलाई, जो आज भी लगातार जल रही है। परिसर में हनुमानजी और भगवान नृसिंह के भी दर्शन मां शारदा मंदिर परिसर में हनुमानजी और भगवान नृसिंह की प्रतिमाएं भी स्थापित हैं। मुख्य पुजारी के मुताबिक, हनुमानजी को मां शारदा के पुत्र के रूप में विराजमान माना जाता है। मान्यता है कि वे मंदिर की पहरेदारी करते हैं। भगवान नृसिंह की प्रतिमा भी प्राचीन बताई जाती है। श्रद्धालु मां शारदा के दर्शन के साथ इन दोनों देवताओं के दर्शन भी करते हैं। नवरात्र में 56 भोग, 114 सीसीटीवी और दो ड्रोन से निगरानी नवरात्र में मंदिर में 10 लाख से अधिक श्रद्धालुओं के पहुंचने का अनुमान है। गर्भगृह को पुणे से मंगाए गए देशी-विदेशी सुगंधित फूलों से सजाया गया है। सुबह 4 बजे मंगला आरती के दौरान मां को 56 प्रकार के व्यंजनों का भोग लगाया जाता है। दोपहर में पूरी, हलवा, सब्जी, दाल और चावल का पारंपरिक भोग अर्पित किया जाता है। शाम 7:30 बजे आरती और रात 10:30 से 11 बजे के बीच शयन आरती होती है। मेला कंट्रोल रूम के मुताबिक, नवरात्र में मंदिर रोजाना करीब 19 घंटे खुला रहेगा। श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए सीढ़ियों और दामोदर रोपवे के रास्ते पर बैरिकेडिंग कर कतारें बनाई गई हैं। मेला क्षेत्र और पहाड़ी पर 650 से अधिक पुलिसकर्मी तैनात किए गए हैं। सुरक्षा के लिए 114 सीसीटीवी कैमरों और दो ड्रोन से निगरानी की जा रही है। शहर के बाहर अलग-अलग स्थानों पर पार्किंग की व्यवस्था भी की गई है। ————————————— यह भी पढ़ें- श्मशान से घिरा मां बगलामुखी मंदिर आगर-मालवा जिला मुख्यालय से 35 किमी दूर नलखेड़ा स्थित मां बगलामुखी मंदिर चारों दिशाओं से श्मशान और कब्रिस्तान से घिरा हुआ है। लखुंदर नदी के किनारे स्थित इस मंदिर में तांत्रिक अनुष्ठानों का विशेष महत्व है। पढ़ें पूरी खबर
