सरदार सरोवर परियोजना के डूब प्रभावितों के पुनर्वास और मुआवजे के दावों की पोल खुल गई है। बड़वानी में अफसरों की हठधर्मिता के कारण विस्थापित ढाई दशकों बाद भी भटक रहे हैं। सिस्टम किस तरह जीवित लोगों को कागजों में उलझाकर परेशान कर रहा है, इसे 3 मामलों से समझें- कागजी पेंच बंद हों, खारी जमीन के पट्टे निरस्त हो: प्रभावितों ने बड़वानी कलेक्टर और जीआरए (इंदौर) से कागजी पेंच बंद करने, गुजरात की खारी जमीन के पट्टे निरस्त करने और सुप्रीम कोर्ट के आदेशानुसार 60-60 लाख का विशेष पुनर्वास अनुदान तत्काल जारी करने की मांग की है। 1. जो गांव उजड़ चुके उसी के सचिव से मांग रहे हैं रिपोर्ट सनगांव के डूब प्रभावित राधेश्याम की मां के निधन के बाद उन्हें 54 लाख रु का शेष मुआवजा (60 लाख का कुल पैकेज, 6 लाख पूर्व में मिले) मिलना है। 1986 की मार्कशीट, नपा टैक्स रसीद, रजिस्टर्ड गोदनामा और तहसीलदार का कब्जा प्रमाण पत्र होने के बावजूद जीआरए द्वारा वारिस प्रमाण पत्र मांगने पर तहसीलदार ने खाली हो चुके गांव के सचिव से रिपोर्ट लाने की शर्त रख दी। सचिव का कहना है कि जब गांव में कोई रहता ही नहीं, तो रिपोर्ट कैसे दें? 2. गुजरात में 14 साल पहले रद्द हुआ आवंटन ग्राम कुकरा निवासी हिम्मत सिंह को 2001-02 में गुजरात के भरूच में जमीन आवंटित की गई थी। कब्जा न मिलने पर बड़ोदरा के सहायक आयुक्त ने 2012 में ही आवंटन निरस्त कर मप्र में पुनर्वास की सिफारिश की थी। इसके बावजूद सर्वोच्च न्यायालय के आदेशानुसार 2 हेक्टेयर जमीन के बदले मिलने वाला 60 लाख रुपये का विशेष पैकेज एनवीडीए द्वारा ‘दोहरी राहत’ का फर्जी हवाला देकर रोका गया है। 3. समुद्र किनारे खारी जमीन का धोखा किया ग्राम कुकरा (राजघाट) के बहादुर सिंह, बाबू सिंह, कनक सिंह समेत 22 परिवारों को 2001 में गुजरात के केसरोल (भूखी खाड़ी) में समुद्र तट के पास जमीन दी गई, जहां खारे पानी से फसलें चौपट हो गईं। 2008 में ग्राम सभा द्वारा जमीन निरस्तीकरण की सिफारिश के बाद ये परिवार मप्र लौटकर मजदूरी कर रहे हैं, लेकिन इन्हें भी 60 लाख का पैकेज नहीं दिया जा रहा। दत्तक पुत्र होने के कारण नियमानुसार सिविल कोर्ट से विधिक उत्तराधिकार प्रमाण पत्र लाना आवश्यक है। कोर्ट का प्रमाण पत्र प्रस्तुत करने के बाद ही भुगतान होगा। अन्य मामलों की फाइलों की जांच करवाकर नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी। – भूपेंद्र रावत, एसडीएम, बड़वानी
