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बेटी को थैलेसीमिया मुक्त कराने IVF की मदद ली:दूसरी बच्ची पैदा कराई; 3 साल की होने पर बहन को बोन मैरो डोनेट कराया

हर तीन-चार हफ्ते में नन्ही बेटी की नसों में खून चढ़ते देखना…हर रिपोर्ट के साथ बढ़ती चिंता… और मन में एक ही डर क्या हमारी बच्ची कभी सामान्य जीवन जी पाएगी? इंदौर के एक दंपती ने सालों तक इसी डर, उम्मीद और संघर्ष के साथ जिंदगी बिताई, लेकिन हार नहीं मानी। कोरोना जैसे मुश्किल दौर में भी उन्होंने एक साहसिक फैसला लिया- आईवीएफ और एडवांस्ड जेनेटिक तकनीक की मदद से ऐसी संतान को जन्म देने का, जो बड़ी बेटी की जिंदगी बचा सके। लंबे इलाज, कई प्रयासों के बाद IVF की मदद से छोटी बेटी का जन्म हुआ। लेकिन संघर्ष यहीं खत्म नहीं हुआ। माता-पिता ने तीन साल तक धैर्य रखा, ताकि उसका शारीरिक विकास पूरा हो सके और वह अपनी बड़ी बहन के लिए बोन मैरो डोनर बन सके। आखिरकार उसी नन्ही बहन ने अपनी बड़ी बहन को थैलेसीमिया जैसी गंभीर बीमारी से मुक्त कर दिया। यह कहानी है इंदौर के रहने वाले मनीष पटेल और स्नेहा पटेल की। आइए जानते हैं इनकी बेटी को नया जीवन के लिए उनके इंतजार और संघर्ष की पूरी कहानी…. जन्म के 45 दिन बाद सामने आई गंभीर बीमारी मामला इंदौर की आठ साल की कायरा का है, जो जन्म से ही थैलेसीमिया मेजर से पीड़ित थी। महज 45 दिन की उम्र में ही डॉक्टरों ने इस बीमारी की पहचान कर ली थी। इसके बाद से उसे हर तीन से चार हफ्ते में नियमित रूप से खून चढ़ाना पड़ता था। थैलेसीमिया एक गंभीर आनुवांशिक बीमारी है, जिसमें शरीर पर्याप्त स्वस्थ हीमोग्लोबिन नहीं बना पाता। इस बीमारी में मरीज को जीवनभर खून चढ़ाने की जरूरत पड़ती है और इसका स्थायी इलाज केवल बोन मैरो ट्रांसप्लांट ही होता है। लेकिन कायरा के मामले में सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि परिवार में कोई भी उपयुक्त बोन मैरो डोनर नहीं मिल रहा था। ऐसे में परिवार के सामने बेटी को बचाने का रास्ता लगभग बंद होता नजर आ रहा था। कोविड काल में लिया गया साहसिक फैसला बेटी की जिंदगी बचाने के लिए मनीष पटेल और स्नेहा पटेल ने नवंबर 2020 में इंदौर की फर्टिलिटी एक्सपर्ट डॉ. कल्याणी श्रीमाली से संपर्क किया। डॉक्टरों ने उन्हें आईवीएफ और एडवांस्ड जेनेटिक टेस्टिंग के जरिए ‘सेवियर सिबलिंग’ की संभावना के बारे में बताया। इस तकनीक के जरिए ऐसे भ्रूण का चयन किया जाता है, जो बीमारी से मुक्त हो और जेनेटिक रूप से मरीज के लिए बोन मैरो डोनर बनने के योग्य हो। यह प्रक्रिया मेडिकल साइंस की सबसे एडवांस और सटीक तकनीकों में से एक मानी जाती है। तीन कोशिश, 11 एम्ब्रियो और सिर्फ एक उम्मीद युविका का जन्म बना कायरा के जीवन का टर्निंग पॉइंट सफल भ्रूण ट्रांसफर के बाद स्नेहा पटेल ने गर्भधारण किया और अगस्त 2023 में एक स्वस्थ बच्ची युविका का जन्म हुआ। डॉक्टरों की सलाह के अनुसार, युविका के शारीरिक विकास के पूरा होने तक परिवार ने तीन साल तक धैर्यपूर्वक इंतजार किया। इसके बाद उसकी HLA जांच दोबारा की गई, जिसमें पुष्टि हुई कि वह पूरी तरह स्वस्थ है और कायरा के लिए बोन मैरो डोनर बन सकती है। इसके बाद विशेषज्ञ डॉक्टरों की टीम ने कायरा का बोन मैरो ट्रांसप्लांट किया। ट्रांसप्लांट सफल रहा और अब कायरा को खून चढ़ाने की जरूरत नहीं पड़ रही है। आठ साल की उम्र में अब वह थैलेसीमिया से मुक्त होकर सामान्य जीवन जी रही है। डॉक्टर बोले- IVF अब जेनेटिक बीमारियों के इलाज में भी कारगर आईवीएफ फर्टिलिटी के चीफ ऑपरेटिंग ऑफिसर बिश्वनाथ गांगुली ने बताया कि पूरा इलाज सुरक्षित और एथिकल फर्टिलिटी केयर के तहत किया गया। फर्टिलिटी एक्सपर्ट डॉ. कल्याणी श्रीमाली ने कहा कि यह सफर चिकित्सकीय और भावनात्मक रूप से बेहद चुनौतीपूर्ण था। उन्होंने बताया कि यह केस साबित करता है कि आईवीएफ केवल बांझपन के इलाज तक सीमित नहीं है, बल्कि जेनेटिक बीमारियों के नियंत्रण और इलाज में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। उन्होंने दंपतियों को सलाह दी कि गर्भावस्था की योजना बनाने से पहले थैलेसीमिया जैसी आनुवांशिक बीमारियों के लिए कैरियर स्क्रीनिंग जरूर करानी चाहिए। “बेटी को बचाने के लिए हर चुनौती स्वीकार की” माता-पिता मनीष और स्नेहा पटेल के लिए यह सफर भावनात्मक रूप से बेहद कठिन रहा। उन्होंने बताया कि कोरोना काल में इलाज की योजना बनाना और संक्रमण से बचाव करना बड़ी चुनौती थी। स्नेहा पटेल ने कहा- कायरा का मासूम चेहरा हमेशा हमारी आंखों के सामने रहता था। हम जानते थे कि उसे बचाने के लिए हमें हर संभव प्रयास करना होगा। आज उसे स्वस्थ देखकर लगता है जैसे कोई चमत्कार हुआ हो। परिवार ने उम्मीद जताई कि उनकी कहानी अन्य माता-पिता को समय रहते जेनेटिक जांच और सही इलाज के लिए प्रेरित करेगी। हर साल हजारों बच्चे होते हैं प्रभावित विशेषज्ञों के अनुसार, भारत में हर साल लगभग 10 से 15 हजार बच्चे गंभीर थैलेसीमिया के साथ जन्म लेते हैं। हालांकि गर्भावस्था से पहले एचबी इलेक्ट्रोफोरेसिस जैसी जांच के जरिए इस बीमारी के कैरियर की पहचान कर समय रहते रोकथाम संभव है। एडवांस्ड जेनेटिक टेस्टिंग और आईवीएफ जैसी तकनीकें अब गंभीर आनुवांशिक बीमारियों से जूझ रहे बच्चों के लिए नई जिंदगी की उम्मीद बनकर सामने आ रही हैं। अब डिटेल में जानिए थैलेसीमिया क्या है? यह एक वंशानुगत ब्लड डिसऑर्डर है। यह हमारे शरीर की हीमोग्लोबिन बनाने की क्षमता को प्रभावित करता है। लाल रक्त कोशिकाओं में एक प्रोटीन होता है, जिसे हीमोग्लोबिन कहते हैं। खून के जरिए पूरे शरीर में ऑक्सीजन पहुंचाने का काम इसी प्रोटीन का है। इससे शरीर की अन्य कोशिकाओं को पोषण मिलता है। अगर किसी को थैलेसीमिया है तो उसकी बोन मैरो लाल रक्त कोशिकाएं कम बना पाएगी। इसका नतीजा यह होगा कि एनीमिया की स्थिति बन जाएगी। इसके अलावा ऑक्सीजन से वंचित होकर शरीर की अन्य कोशिकाओं की ऊर्जा कम हो जाएगी। यह स्थिति जानलेवा भी हो सकती है। थैलेसेमिया जन्मजात बीमारी है। इसका मतलब है कि इसका हमारी लाइफस्टाइल से कोई सीधा संबंध नहीं है। हालांकि हमारी लाइफस्टाइल का इसके लक्षणों पर सीधा असर पड़ता है।

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