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नल में जल नहीं, सरकारी रिपोर्ट में पानी उत्तम…:जांच में उल्टी-दस्त का वायरस, आदिवासी गांवों में नल-जल पर 4 करोड़ रुपए खर्च

बालाघाट के बिरसा क्षेत्र में आदिवासी बच्चों की मौतों के बीच पानी को लेकर तीन अलग तस्वीरें सामने हैं। जमीन पर नलों में पानी नहीं है, सरकारी रिकॉर्ड में उन्हीं गांवों का पानी ‘मिनरल वाटर के मानकों के अनुरूप’ है। वहीं अब आईसीएमआर की जांच में प्रभावित गांवों से लिए गए पानी के सभी सैंपल में एडिनोवायरस मिला है। यह वायरस उल्टी-दस्त सहित पेट-आंतों का संक्रमण कर सकता है और दूषित पानी से भी फैल सकता है।
जिन गांवों में 19 से ज्यादा बच्चों की मौत हुई, वहां सरकारी रिकॉर्ड में शत-प्रतिशत घरों तक नल-जल और प्रति व्यक्ति रोज 55 से 70 लीटर शुद्ध पानी पहुंचने का दावा है। नल-जल योजना के पोर्टल पर जुलाई तक इन गांवों के पानी की जांच की 40 से ज्यादा रिपोर्ट अपलोड हैं। इन्हें सही मानें तो यहां पानी की गुणवत्ता ‘मिनरल वाटर के मानकों के अनुरूप’ है। भास्कर की गांव-गांव पड़ताल में तस्वीर इसके उलट मिली। इन गांवों में जल जीवन मिशन पर करीब ₹4 करोड़ खर्च होने के बावजूद 5% घरों में भी साफ पानी नहीं पहुंच रहा। कुछ जगह नल दो साल से सूखे हैं। ग्रामीण नदी-नालों और खुले कुओं का पानी पीने को मजबूर हैं। रिकॉर्ड में 100% घरों तक नल-जल, हकीकत: हैंडपंप-कुओं का सहारा बोंदारी- 8 मौतें: योजना बंद, लेकिन 20 से ज्यादा रिपोर्ट में पानी ‘उत्तम’ नल सूखे हैं, ग्रामीण नाले किनारे गड्ढों से पानी लेते हैं। फिर भी जुलाई तक 20 से ज्यादा जांच में पानी ‘उत्तम’ और शत-प्रतिशत जलापूर्ति दर्ज है। योजना पर ₹32 लाख खर्च हुए। कुंडेकसा- 2 मौतें: 32 लाख रुपए खर्च, फिर भी खुले कुएं पर निर्भर ग्रामीण बारिश व पशुओं का पानी मिलने वाले खुले कुएं का पानी पी रहे हैं और नहाने के लिए नदी पर निर्भर हैं। योजना पर करीब ₹32 लाख खर्च दर्ज है। मछुरदा-मातला : ₹1.5 करोड़ की योजना, कुछ दिन ही आया पानी टंकी बनने के बाद कुछ दिन पानी आया, फिर आपूर्ति बंद हो गई। ग्रामीण हैंडपंप और नदी-नालों पर निर्भर हैं, जबकि विधानसभा में प्रति व्यक्ति रोज 70 लीटर पानी देने का दावा है। बिना जलस्रोत-संचालन के योजना ‘पूरी’ कैसे? कई जगह टंकी-पाइपलाइन बनते ही योजना पूरी दिखा दी गई। न जलस्रोत व संचालन की व्यवस्था हुई, न पंचायत को योजना सौंपी गई। ग्रामीणों के वीडियो व पुष्टि के आधार पर पोर्टल पर इसे पूर्ण दर्ज कर दिया गया। बालाघाट के मौतों वाले गांवों में आईसीएमआर की जांच- 80% बच्चे मलेरिया पॉजिटिव, मीजल्स के 10 में 10 सैंपल भी पॉजिटिव बालाघाट के जिन आदिवासी गांवों में 19 से ज्यादा बच्चों की मौत हुई है, वहां आईसीएमआर (भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद)की जांच में बीमारी और दूषित पानी को लेकर तीन गंभीर तथ्य सामने आए हैं। बीमार 64 बच्चों के खून की जांच में 50 यानी करीब 80% मलेरिया पॉजिटिव मिले। मछुरदा, बोंदारी और कुंडेकसा से मीजल्स की जांच के लिए लिए गए सभी 10 नमूनों में संक्रमण की पुष्टि हुई। मलेरिया : 64 बच्चों में 50 पॉजिटिव; फिर आंकड़ों में मलेरिया में कैसे घटा?
प्रदेश के मलेरिया मामलों में बालाघाट की हिस्सेदारी 2024 में 57% थी, जो 2025 में 30% रह गई। वर्षों से मच्छरदानी न के बराबर बंटी, छिड़काव भी कम हुआ। अब जांच में 64 में 50 बच्चे पॉजिटिव मिले। खसरा : 3 गांवों के सारे पॉजिटिव; फिर टीकाकरण की पहुंच कितनी? मछुरदा, बोंदारी और कुंडेकसा से लिए सभी 10 नमूनों में मीजल्स (खसरे) की पुष्टि हुई। वहीं पूरे प्रदेश में संस्थागत प्रसव 95% है। लेकिन इन इलाकों में मात्र 50%। मतलब टीकाकरण अभियान फेल है।

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