शिवपुरी के नरवर किले की ऐतिहासिक कचहरी से 15-16 जुलाई की दरमियानी रात 3.5 टन वजनी तोप चोरी हुए एक माह बीत चुका है। पुलिस की जांच राजस्थान तक पहुंच गई है। संदिग्धों से पूछताछ हुई, वारदात में इस्तेमाल वाहन जब्त किया गया और संभावित ठिकानों पर जेसीबी व मेटल डिटेक्टर से तलाश भी की गई, लेकिन तोप का अब तक कोई सुराग नहीं मिला। घटना के एक माह बाद दैनिक भास्कर की टीम नरवर किले पहुंची। यहां सामने आया कि मामला सिर्फ एक तोप की चोरी तक सीमित नहीं है। किले की तोपों की नंबरिंग 26 तक है, लेकिन कचहरी में अब सिर्फ 13 तोपें मौजूद हैं। 2011 में चोरी के बाद बरामद एक तोप आज भी नरवर थाने में पड़ी है। वहीं 2007 में चोरी हुई दूसरी तोप का भी कोई स्पष्ट रिकॉर्ड सामने नहीं है। यानी सवाल सिर्फ 15-16 जुलाई की चोरी का नहीं, बल्कि नरवर किले से वर्षों में गायब हुई ऐतिहासिक तोपों के पूरे हिसाब का है। पढ़िए पूरी रिपोर्ट… 26 तक नंबरिंग, कचहरी में सिर्फ 13 तोपें कचहरी परिसर में रखी तोपों की पहचान 26 नंबर तक होने की जानकारी सामने आई। वर्तमान में कचहरी में 13 तोपें मौजूद हैं। 15-16 जुलाई की रात चोरी हुई तोप को जोड़ें तो कचहरी की 14 तोपों का हिसाब बनता है। इसके अलावा 2011 में चोरी के मामले में बरामद एक ऐतिहासिक तोप नरवर थाने में रखी है। इस तरह वर्तमान में कुल 15 तोपों का पता सामने आता है। इस हिसाब से 26 नंबरिंग वाली बाकी तोपें कहां गईं? यह सवाल अब पुरातत्व विभाग और प्रशासन के सामने सबसे महत्वपूर्ण जांच बिंदुओं में से एक होना चाहिए। दो संदिग्ध गिरफ्तार, पूछताछ में जुटी पुलिस नरवर किले से दो संदिग्धों को गिरफ्तार किया है। दोनों से पूछताछ कर पुलिस चोरी हुई तोप तक पहुंचने और वारदात में शामिल अन्य लोगों की भूमिका की जानकारी जुटा रही है। पुलिस जांच में चोरी की वारदात की कड़ियों को राजस्थान से भी जोड़कर देखा जा रहा है। 1985 में 18 तोपें थीं, दस्तावेजीकरण में 14 रह गईं नरवर किले पर शोध करने वाले डॉ. मनोज माहेश्वरी ने वर्ष 1998 में किले पर शोध के बाद पीएचडी प्राप्त की थी। उनके अनुसार करीब वर्ष 1985 में उन्होंने किले में 18 तोपें देखी थीं। बाद में दस्तावेजीकरण के दौरान इनकी संख्या 14 रह गई। वहीं किले के इतिहास और तोपों की जानकारी रखने वाले बसर अली के अनुसार राजाओं के समय नरवर में करीब 26 तोपें सुरक्षित रही होंगी। इन आंकड़ों को वर्तमान स्थिति से जोड़ने पर किले की ऐतिहासिक तोपों का पूरा दस्तावेजी ऑडिट कराने की जरूरत सामने आती है। नरवर में बनती थीं तोपें, जयपुर और ग्वालियर तक जाती थीं डॉ. माहेश्वरी के अनुसार नरवर के आसपास मगरौनी, करई और सीहोर क्षेत्र में लोह अयस्क की उपलब्धता के कारण मुगल काल से लेकर सिंधिया शासनकाल तक यहां तोप निर्माण की परंपरा रही। उनके मुताबिक नरवर में बनी तोपें जयपुर और बाद में ग्वालियर तक भेजी जाती थीं। यानी किले में मौजूद तोपें केवल युद्ध के पुराने हथियार नहीं, बल्कि नरवर की स्थानीय धातु तकनीक, सैन्य इतिहास और तत्कालीन कारीगरी की विरासत हैं। डॉ. माहेश्वरी के अनुसार नरवर में तोप और गोले बनाने में इस्तेमाल होने वाला लोहा उच्च गुणवत्ता का था। अपेक्षाकृत कम तापमान पर क्रिस्टलाइज होकर कठोर होने के कारण इससे बनी तोपों की मारक क्षमता और रेंज अधिक मानी जाती थी। ऐसे में एक-एक तोप की चोरी महज धातु की चोरी नहीं, बल्कि ऐतिहासिक विरासत के नुकसान का मामला है। 2012 में अलग-अलग जगहों से तोपें कचहरी में लाई गई थीं डॉ. माहेश्वरी के अनुसार वर्ष 2012 में पुरातत्व विभाग के कमिश्नर से चर्चा के बाद किले में अलग-अलग स्थानों पर रखी ऐतिहासिक तोपों को एक जगह सुरक्षित करने की योजना बनाई गई। इसके बाद तोपों को कचहरी महल परिसर में लाकर प्रदर्शित किया गया। कचहरी को किले के अन्य हिस्सों की तुलना में अपेक्षाकृत सुरक्षित माना गया था। लेकिन प्रवेश द्वारों पर मजबूत किवाड़ और पर्याप्त सुरक्षा व्यवस्था पूरी तरह लागू नहीं हो सकी। डॉ. माहेश्वरी के अनुसार यदि उस समय किवाड़ और नियमित सुरक्षा व्यवस्था हो जाती तो ऐतिहासिक तोपों को चोरी से बचाया जा सकता था। 15 जुलाई की चोरी से पहले 5 जुलाई को हुआ था ट्रायल पुलिस जांच में सामने आए घटनाक्रम के अनुसार चोरी से पहले 5 जुलाई को तोप को उसके स्टैंड से नीचे गिराने का ट्रायल किया गया था। भारी वजन के कारण उस दिन इसे ले जाना संभव नहीं हुआ। इसके बाद 15-16 जुलाई की रात दोबारा तैयारी के साथ वारदात को अंजाम दिया गया। स्थानीय जानकार बसर अली के अनुसार 4 जुलाई की रात भी तोप ले जाने का प्रयास किया गया था। यानी चोरी से पहले रेकी और तैयारी की आशंका है। 4 जुलाई के प्रयास और पुलिस जांच में सामने आए 5 जुलाई के ट्रायल—इन दोनों तारीखों की भूमिका अब जांच में महत्वपूर्ण हो जाती है। 15 जुलाई की रात 25-30 लोग और भारी वाहन पहुंचे बसर अली के अनुसार करीब 25 लोग तीन वाहनों से किले में पहुंचे थे। वहीं पुलिस जांच में करीब 30 लोगों के क्रेन-ट्रक के साथ पहुंचने की बात सामने आई है। भारी तोप को नीचे उतारने के लिए रस्सियों, बड़े लोहे के पाइप और महुए की लकड़ी से बनाए गए सांचे का इस्तेमाल किया गया। सांचे में नट-बोल्ट लगाए गए थे, ताकि तोप को नियंत्रित तरीके से नीचे लाया जा सके। बसर अली के अनुसार तोप को नीचे खींचते समय आवाज दबाने के लिए रजाई और गद्दों का इस्तेमाल किया गया। इसके बाद तोप को वाहन में रखकर किले से बाहर ले जाया गया। यदि जांच में यह जानकारी सही साबित होती है तो यह वारदात अचानक की गई चोरी नहीं, बल्कि पहले से की गई रेकी और तैयारी का परिणाम साबित हो सकती है। किले में CCTV नहीं, फिर इतनी बड़ी वारदात कैसे हुई? नरवर किले की सुरक्षा व्यवस्था पर सबसे बड़ा सवाल यह भी है कि जिस परिसर से 3.5 टन की ऐतिहासिक तोप चोरी हुई, वहां घटनास्थल पर CCTV निगरानी नहीं थी। इतने बड़े ऐतिहासिक परिसर में रात के समय सुरक्षा और निगरानी की व्यवस्था कितनी प्रभावी है, यह सवाल अब और गंभीर हो गया है। किले का परकोटा करीब 13.4 किलोमीटर लंबा है। इतने बड़े क्षेत्र की निगरानी चुनौतीपूर्ण है, लेकिन कचहरी परिसर और ऐतिहासिक धरोहरों वाले स्थानों पर अतिरिक्त सुरक्षा की जरूरत साफ दिखाई देती है। राजस्थान तक पहुंची जांच, पांचना बांध वाला एंगल भी सामने चोरी के बाद पुलिस की जांच राजस्थान तक पहुंची। संदिग्धों से पूछताछ और वाहन जब्ती के साथ संभावित ठिकानों पर तलाश की गई। जांच में यह एंगल भी सामने आया कि चोरी हुई तोप का इस्तेमाल राजस्थान के पांचना बांध को नुकसान पहुंचाने के लिए किया जाना था। इस दिशा में राजस्थान और मध्यप्रदेश पुलिस की जांच की बात सामने आई है। हालांकि, इसे फिलहाल जांच का एंगल और पुलिस की आशंका माना जाना चाहिए। जब तक पुलिस की अंतिम जांच या आधिकारिक रिपोर्ट सामने नहीं आती, इसे स्थापित तथ्य नहीं कहा जा सकता। जांच में अंतरराष्ट्रीय एंटीक तस्करी गिरोह से तार जुड़े होने की आशंका भी जताई गई है। यदि यह एंगल सही साबित होता है तो नरवर की ऐतिहासिक तोपों की सुरक्षा का मामला स्थानीय चोरी से आगे बढ़कर पुरातात्विक धरोहरों की तस्करी के नेटवर्क तक पहुंच सकता है। 2011 में चोरी हुई तोप बरामद, 15 साल से थाने में नरवर थाने में रखी ऐतिहासिक तोप इस पूरे मामले की दूसरी बड़ी कड़ी है। वर्ष 2011 में किले से एक तोप चोरी हुई थी। FIR के बाद पुलिस ने इसे बरामद कर लिया। लेकिन करीब 15 साल बाद भी यह तोप किले में वापस नहीं पहुंची है। बसर अली उस समय हुई चोरी और बरामदगी के घटनाक्रम के प्रत्यक्षदर्शी रहे हैं। उनके अनुसार उनकी टीम ने तोप की तलाश की थी और बाद में इसे पुलिस के माध्यम से नरवर थाने में रखवाया गया। इस तोप पर ‘सवाई जयसिंह’ अंकित होने की जानकारी सामने आई है। डॉ. माहेश्वरी के अनुसार जब वे नगर पालिका अध्यक्ष थे, तब उन्होंने पुरातत्व विभाग को पत्र लिखकर बरामद तोप को वापस किले में लाकर प्रदर्शित करने का अनुरोध किया था। उनके अनुसार पुलिस की ओर से कहा गया था कि कानूनन सुपुर्दगी के लिए पुरातत्व विभाग को पहल करनी होगी। लेकिन उनके मुताबिक विभाग की ओर से प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई। नतीजा यह है कि ऐतिहासिक तोप किले के संग्रह में नहीं, थाने के परिसर में खड़ी है। 2007 की चोरी हुई तोप का राज वर्ष 2007 में नरवर किले से एक ऐतिहासिक तोप चोरी होने की घटना सामने आई थी। इसी साल राजस्थान के करौली क्षेत्र के गावड़ मीणा गांव में एक तोप चलाने के प्रयास में फटने की घटना हुई थी। स्थानीय स्तर पर वर्षों से चर्चा है कि राजस्थान में फटी तोप कहीं नरवर किले से चोरी हुई तोप तो नहीं थी। हालांकि, इस दावे की पुष्टि करने वाला कोई आधिकारिक दस्तावेज, पुलिस रिकॉर्ड या फोरेंसिक रिपोर्ट सामने नहीं आई है। खजाने की तलाश में किले में खोदी गई 20 फीट गहरी सुरंग नरवर किले की सुरक्षा का संकट सिर्फ तोप चोरी तक सीमित नहीं है। भास्कर की ग्राउंड पड़ताल में मां पसर देवी मंदिर के पीछे करीब 100 मीटर की दूरी पर सुरंग खोदे जाने की जानकारी सामने आई। बसर अली के अनुसार अप्रैल में मामला सामने आने से पहले करीब 20 दिनों तक रात-दिन खुदाई चलती रही। उनके अनुसार सुरंग खोदने के लिए गैंती, फावड़े और कटर सहित कई उपकरणों का इस्तेमाल किया गया। अंदर ऑक्सीजन की कमी होने पर गैस सिलेंडर के इस्तेमाल की बात भी सामने आई। उनके मुताबिक सुरंग करीब 20 फीट तक गहरी हो गई थी और उसमें एक व्यक्ति के प्रवेश करने लायक रास्ता बन गया था। मामला सामने आने के बाद पुलिस ने मौके पर पहुंचकर सुरंग बंद कराई। पसर देवी मंदिर से जुड़ी है खजाने की किंवदंती पसर देवी मंदिर नरवर किले में आस्था का बड़ा केंद्र है। यहां नवरात्रि के दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। स्थानीय लोगों के बीच यह मान्यता भी प्रचलित है कि मंदिर के नीचे खजाना दबा हुआ है। यह भी कहा जाता है कि मंदिर के नीचे किसी गड्ढे में सिक्का डालने पर नीचे से खन-खन की आवाज सुनाई देती है। हालांकि, खजाना होने की इस बात की कोई वैज्ञानिक या आधिकारिक पुष्टि नहीं है। यही किंवदंती कथित तौर पर कुछ लोगों को किले में अवैध खुदाई के लिए आकर्षित करती रही है। टिकट लेते हैं, लेकिन रात की निगरानी कौन करता है? डॉ. माहेश्वरी के अनुसार पुरातत्व विभाग किले में आने वाले पर्यटकों से टिकट और प्रवेश शुल्क लेता है, लेकिन सुरक्षा व्यवस्था पर्याप्त मजबूत नहीं है। उनके अनुसार किले में नियमित केयरटेकर, रात की निगरानी और संवेदनशील स्थानों पर सुरक्षा जरूरी है। एक तरफ 3.5 टन की ऐतिहासिक तोप को किले से बाहर ले जाया जाता है, दूसरी तरफ कथित खजाने के लिए सुरंग खोद दी जाती है। ऐसे में सुरक्षा व्यवस्था की प्रभावशीलता पर सवाल उठना स्वाभाविक है। आरोपियों को डिटेक्ट कर लिया है-एएसपी शिवपुरी के एडिशनल एसपी आर. डी. प्रजापति ने बताया कि नरवर के किले में सुरंग की खुदाई की सूचना मिली थी, जिस पर पुलिस ने तस्दीक की है। उसे पुलिस ने जांच में लिया है। ये किदवंती है कि पसर देवी माता मंदिर पर मूर्ति के नीचे खजाना है, इस लिए लोगों ने उसे संभवतः खोदा होगा। इस बात की तस्दीक की जा रही है। वहीं तोप चोरी मामले में आरोपियों को डिटेक्ट कर लिया हैं। दो आरोपी गिरफ्तार कर लिए गए हैं और गाड़ी जब्त हो गई है। बाकी आरोपियों के संबंध में और संपत्ति के संबंध में लगातार विवेचना जारी है। टीम राजस्थान में लगातार प्रयास कर रही है और जैसे ही उसमें सफलता मिलती है तो सूचित किया जाएगा।
