हर दिन जब सूरज डूबता है, तो विदिशा के गंजबासौदा से 28 किलोमीटर दूर, बड़वासा गांव के पास बसे भक्तिग्राम में अंधेरा उतरने पर कहीं कोई बल्ब नहीं जलता, बल्कि घर-घर दीये जल उठते हैं। कहीं लालटेन टिमटिमाती है। 12 मिट्टी-खपरैल के घरों में रहने वाले करीब 60 लोगों की इस दुनिया में न बिजली है, न किसी के पास अपना मोबाइल फोन। पूरे गांव में सिर्फ दो साधारण की-पैड फोन हैं और खास बात यह है कि इन्हें कोई ग्रामीण यानी न महिला, न बच्चा और न बुजुर्ग खुद इस्तेमाल करता है। बल्कि ये फोन सिर्फ इसलिए रखे गए हैं, ताकि बाहर के लोगों को कभी जरूरत पड़े तो वे गांव से संपर्क कर सके। गांव में कई डॉक्टर, इंजीनियर जैसे पढ़े-लिखे लोग शहरों की भागदौड़ भरी जिंदगी छोड़कर खुद यह जीवन चुनकर आए हैं।
भक्तिग्राम को लेकर मन में उठ रहे सवालों के जवाब बीमार पड़ने पर क्या करते हैं? गांव की जड़ी-बूटियों से ठीक न होने पर ही बाजार से आयुर्वेदिक या एलोपैथिक दवा ली जाती है। नजदीकी अस्पताल करीब 10 किमी दूर उदयपुर में है।
पैसों का इंतजाम कैसे होता है? भक्तिग्राम ट्रस्ट एक इस्कॉन मंदिर ट्रस्ट से जुड़ा है, और गांव में बाहर से दान देने का विकल्प भी है। पशुपालन का क्या इंतजाम है? गुजरात की पुरानी देसी नस्ल की करीब एक दर्जन गायें हैं। दूध बेचा नहीं जाता, सिर्फ जरूरत भर निकाला जाता है, बाकी बछड़ों के लिए छोड़ दिया जाता है। गांव कब बसा, कितना आत्मनिर्भर है? 2021 में स्थापना हुई। ग्रामीण खुद मानते हैं, 100 फीसदी आत्मनिर्भर बनने में अभी एक पूरी पीढ़ी लगेगी।
डॉक्टर ने दवा से, इंजीनियर ने मशीन से बनाई दूरी भक्तिग्राम में रहने वालों में सिर्फ आम ग्रामीण नहीं, डॉक्टर-इंजीनियर जैसे पढ़े-लिखे पेशेवर भी शामिल हैं। नर्मदापुरम के नर्मदादास पेशे से डॉक्टर हैं, तो उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले के रहने वाले राजकुमार यादव पहले ट्राइडेंट कंपनी में टेक्सटाइल टेक्नोलॉजी इंजीनियर थे। गांव में बसे ज्यादातर परिवार अलग-अलग राज्यों से आए हैं, और यहां आने से पहले आम शहरी लोगों जैसी भागदौड़ भरी, कमाऊ जिंदगी जी रहे थे। लेकिन भक्ति की राह पर चलते हुए इन्होंने अपनी डिग्री और करियर की सुविधाओं को पीछे छोड़ दिया। बिना बिजली-मोबाइल वाली जिंदगी को अपनी मर्जी से चुना।
3 साल की उम्र से धोती-कुर्ता, फर्राटे से श्लोक बोलते हैं बच्चे भक्तिग्राम में छोटे-छोटे बच्चे धोती-कुर्ता पहने, फर्राटे से संस्कृत के श्लोक बोलते नजर आते हैं। यही गांव में घुसते ही सबसे पहले दिखने वाली तस्वीर है। गांव में 12 साल से कम उम्र के करीब एक दर्जन बच्चे हैं, जिनमें से 7 साल की उम्र पार करते ही बच्चे गुरुकुल जाने लगते हैं। फिलहाल यहां 8 से 10 बच्चे पढ़ रहे हैं, जहां किताब-कॉपी से ज्यादा जोर सुनकर और दोहराकर याद करने की पुरानी परंपरा पर है। संस्कृत और वेद की शिक्षा के साथ हिंदी-अंग्रेजी जैसी बुनियादी पढ़ाई भी होती है, पर मुख्य फोकस धार्मिक शिक्षा पर ही रहता है। यहां की पढ़ाई की पहचान किसी सर्टिफिकेट से नहीं, बल्कि बच्चों के कंठस्थ श्लोकों से होती है।
महिलाएं आज भी हाथ से पीसती हैं मसाला भक्तिग्राम की रसोई में आज भी मिक्सर-ग्राइंडर या गैस चूल्हे की जगह नहीं है। महिलाएं लकड़ी और कंडों से जलते चूल्हे पर खाना बनाती हैं। मसाले सिल-बट्टे पर हाथ से पीसे जाते हैं, आटा हाथ की चक्की पर पीसा जाता है। खाने का तेल भी बाजार से नहीं आता। गांव में बैल से चलने वाले पारंपरिक कोल्हू-घानी में तेल निकाला जाता है। अनाज और सब्जियां भी गांव के खेतों में जैविक तरीके से ही उगाई जाती हैं, बिना किसी रासायनिक खाद या कीटनाशक के, यानी थाली में जो कुछ भी पहुंचता है, वह गांव के भीतर ही, गांव के हाथों बनता है।
जीवन में पहले से ज्यादा सुकून है भक्तिग्राम निवासी नर्मदादास ने बताया- गांव में बिजली और मोबाइल दोनों का इस्तेमाल नहीं होता। गांव में सिर्फ एक जगह बिजली है, वह भी दो की-पैड फोन चार्ज करने और निर्माण कार्य के लिए। बाकी हमारी पूरी जिंदगी बिना बिजली और बिना मोबाइल के चलती है। हम ये बताना चाहते हैं कि बिजली और मोबाइल के बिना भी जीवन पूरी तरह संभव है, बल्कि पहले से कहीं ज्यादा सुकून भरा है। अपनों के लिए भरपूर समय है।
