मध्य प्रदेश के स्कूलों में शिक्षकों की कमी के साथ बुनियादी सुविधाओं का भी अभाव है। प्रदेश के 1 लाख 22 हजार में से साढे 67 हजार स्कूलों में इंटरनेट, 98 हजार में स्मार्ट क्लाक नहीं है। नीति आयोग की मई-2026 की स्कूल एजुकेशन सिस्टम इन इंडिया रिपोर्ट के मुताबिक 14 हजार 900 स्कूलों में अब भी काम करने वाली बिजली की कमी है तो 49 हजार 800 स्कूलों ने अब तक कंप्यूटर के दर्शन नहीं किए है। प्रदेश में 10वीं के बाद 100 में करीब 17 बच्चे स्कूल छोड़ रहे हैं। राज्य में कुल 52,019 शिक्षक पद खाली हैं और 7,217 स्कूल ऐसे हैं जहां पूरी पढ़ाई सिर्फ एक शिक्षक के भरोसे चल रही है। नीति आयोग ने ये रिपोर्ट 6 मई 2026 को जारी की है जो कि यूडाइस प्लस 2024-25 और परख 2024 के आंकड़ों पर आधारित है। स्कूलों में इंटरनेट के मामले में एमपी 25वां स्थान मध्यप्रदेश के मात्र 45.7% में इंटरनेट की व्यवस्था है। 54.3 % स्कूल में इंटरनेट नहीं है। अगर आकड़ों की बात करे तो नीति आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक मध्यप्रदेश में कुल 1 लाख 22 हजार 120 स्कूल है जिसमें से 67 हजार 532 स्कूलों में इंटरनेट नहीं है। स्कूलों में इंटरनेट की सुविधा के मामले में एमपी देश के 24 राज्यों से पीछे है और राष्ट्रीय औसत 63.5% से करीब 18 प्रतिशत अंक नीचे है। बिहार-असम, एमपी से आगे स्कूलों में इंटरनेट सुविधा के मामले में मध्यप्रदेश ने 10 साल में 3.8% से बढ़कर 45.7% तक का सफर तय किया है, लेकिन बिहार असम और ओडिशा तीन ऐसे राज्य हैं जो 2014-15 में एमपी से पीछे थे और आज काफी आगे निकल चुके हैं। स्मार्ट क्लास रूम सुविधा में एमपी का 28वां स्थान स्मार्ट क्लास रूम की सुविधा के मामले में एमपी देश के 20 राज्यों और 8 केंद्रशासित प्रदेशों से पीछे है। प्रदेश के सरकारी और निजी स्कूलों में 2024-25 में सिर्फ 19.6% स्कूलों में ही फंक्शनल स्मार्ट क्लासरूम हैं, जबकि देश का औसत 30.6% से भी 11 प्रतिशत कम है।आकंड़ों की बात करे तो प्रदेश के 98 हजार 184 निजी और सरकारी स्कूलों में स्मार्ट क्लास रूम नहीं है। तमिलनाडू ने की एमपी से तेज प्रगति 2021-22 में एमपी में 5.2% स्कूलों में स्मार्ट क्लासरूम थे जो 2024-25 में बढ़कर 19.6% हो गए है, लेकिन कई ऐसे राज्य हैं जो 2021-22 में एमपी से पीछे थे और आज काफी आगे निकल चुके हैं। स्कूलों में बिजली सुविधा में एमपी 18वें नंबर पर स्कूलों में बिजली सुविधा के मामले में मध्यप्रदेश देश के 17 राज्यों से पीछे है और बड़े राज्यों में उसका 18वां स्थान है। प्रदेश के सरकारी और निजी स्कूलों में 2024-25 में 87.8% स्कूलों में फंक्शनल बिजली है, जबकि राष्ट्रीय औसत 91.9% है। यानी एमपी अब भी देश के औसत से 4.1 प्रतिशत अंक पीछे है। आंकड़ों की बात करें तो प्रदेश के करीब 1.22 लाख स्कूलों में से लगभग 14,900 स्कूलों में अब भी काम करने वाली बिजली नहीं है। कई राज्यों ने की एमपी से तेज प्रगति 2014-15 में मध्यप्रदेश में सिर्फ 26.3% स्कूलों में बिजली थी, जो 2024-25 में बढ़कर 87.8% हो गई है। यानी 10 साल में प्रदेश ने लंबी छलांग लगाई, लेकिन कई ऐसे राज्य हैं जो 2014-15 में एमपी से पीछे थे और आज आगे निकल चुके हैं। स्कूलों में कंप्यूटर सुविधा में एमपी 18वें नंबर पर स्कूलों में कंप्यूटर सुविधा के मामले में मध्यप्रदेश देश के 17 राज्यों से पीछे है और बड़े राज्यों में उसका 18वां स्थान है। नीति आयोग 2026 की रिपोर्ट के मुताबिक प्रदेश के सरकारी और निजी स्कूलों में 2024-25 में सिर्फ 59.2% स्कूलों में ही फंक्शनल कंप्यूटर हैं, जबकि राष्ट्रीय औसत 64.7% है। यानी एमपी देश के औसत से 5.5 प्रतिशत अंक पीछे है। आंकड़ों की बात करें तो प्रदेश के करीब 1.22 लाख स्कूलों में से लगभग 72,300 स्कूलों में कंप्यूटर हैं, जबकि करीब 49,800 स्कूलों में अब भी कंप्यूटर सुविधा नहीं है। 2014-15 में मध्यप्रदेश के सिर्फ 14.6% स्कूलों में कंप्यूटर थे, जो 2024-25 में बढ़कर 59.2% हो गए हैं। यानी 10 साल में प्रदेश ने 44.6 प्रतिशत अंक की बढ़त दर्ज की, लेकिन ऐसे राज्य हैं जो उस समय एमपी से पीछे थे और आज काफी आगे निकल चुके हैं। स्कूलों में टॉयलेट सुविधा में भी एमपी 17वें नंबर पर स्कूलों में टॉयलेट सुविधा के मामले में मध्यप्रदेश देश के 16 राज्यों से पीछे है और बड़े राज्यों में उसका 17वां स्थान है। नीति आयोग 2026 की रिपोर्ट के मुताबिक प्रदेश के स्कूलों में लड़कों के लिए सिर्फ 87.2% और लड़कियों के लिए 88.6% स्कूलों में ही फंक्शनल टॉयलेट हैं, जबकि राष्ट्रीय औसत क्रमशः 92.4% और 94% है। यानी एमपी दोनों मामलों में देश के औसत से करीब 5 प्रतिशत अंक पीछे है। आंकड़ों की बात करें तो प्रदेश के करीब 1.22 लाख स्कूलों में से लगभग 15,600 स्कूलों में लड़कों के टॉयलेट नहीं हैं, जबकि करीब 13,900 स्कूलों में लड़कियों के टॉयलेट की सुविधा नहीं है। बिहार झारखंड एमपी से आगे ने की एमपी से तेज प्रगति 10 साल पहले 2014-15 में मध्यप्रदेश के 78% स्कूलों में लड़कों के और 78.7% स्कूलों में लड़कियों के टॉयलेट थे, जो 2024-25 में बढ़कर 87.2% और 88.6% हो गए हैं। सुधार जरूर हुआ, लेकिन कई ऐसे राज्य हैं जो 2014-15 एमपी से पीछे थे और आज काफी आगे निकल चुके हैं। बच्चों के ड्रापआउट के मामले में एमपी आगे नीति आयोग 2026 की रिपोर्ट के मुताबिक कक्षा 1 से 5 तक मध्यप्रदेश ने बड़ा सुधार किया है और यहां ड्रॉपआउट 0% हो गया है, यानी 10 साल पहले 10.14% था यानी अब पहली कक्षा से पाचंवी कक्षा तक कोई भी बच्चा पढ़ाई नहीं छोडता है। कक्षा 6 से 8 आते-आते तस्वीर बदल जाती है। इस स्तर पर प्रदेश में 6.3% बच्चे स्कूल छोड़ रहे हैं, यानी हर 100 में करीब 6 बच्चे पढ़ाई बीच में छोड़ रहे हैं। इस मामले में एमपी देश में चौथे नंबर पर है, यानी सिर्फ 3 राज्यों में एमपी से ज्यादा ड्रॉपआउट है। वहीं कक्षा 9-10 में स्थिति और चिंताजनक है। यहां प्रदेश का ड्रॉपआउट 16.8% है, यानी हर 100 में करीब 17 बच्चे स्कूल छोड़ रहे हैं। इस मामले में एमपी देश में आठवें नंबर पर है, यानी सिर्फ 7 राज्यों में हालत एमपी से खराब है। 7 हजार से ज्यादा स्कूल सिर्फ एक शिक्षक के भरोसे रिपोर्ट बताती है कि राज्य में कुल 52,019 शिक्षक पद खाली हैं। इनमें सबसे ज्यादा 47,122 पद प्राथमिक स्कूलों में खाली हैं, जबकि माध्यमिक में 2,877 और उच्च माध्यमिक में 2,020 पद रिक्त हैं। राज्य के 7,217 स्कूल ऐसे हैं जहां पूरी पढ़ाई सिर्फ एक शिक्षक के भरोसे चल रही है। यानी एक ही शिक्षक को कई कक्षाएं और कई विषय संभालने पड़ रहे हैं। प्राथमिक स्तर पर एक शिक्षक पर औसतन 16 बच्चे, उच्च प्राथमिक और माध्यमिक में 14 बच्चे, जबकि उच्च माध्यमिक में 15 बच्चे हैं।
