जिसे जन्म लेते ही मिट्टी में दबा दिया था, वह छह घंटे बाद जिंदा निकली। डॉक्टर ने भी बाद में उसे मृत बता दिया, लेकिन पिता उसे लेकर दरगाह पहुंच गए। वहां उसके ऊपर गुलाब का फूल गिरा और पिता ने कहा- अब यह धन्वंतरी नहीं, गुलाब है। यही बच्ची आगे चलकर पद्मश्री गुलाबो सपेरा बनी। बैतूल में दैनिक भास्कर से खास बातचीत में गुलाबो ने अपने जीवन से जुड़े कई ऐसे प्रसंग बताए, जो आमतौर पर सामने नहीं आए हैं। उन्होंने बताया कि सांपों की चाल और बीन की धुन देखकर उन्होंने नृत्य सीखा, अमेरिका जाने से एक दिन पहले पिता को खोया, फिर अंतरराष्ट्रीय मंच पर कालबेलिया को पहचान दिलाई। भारत लौटने पर जिस समाज ने कभी उनके परिवार का बहिष्कार किया था, उसी के सामने उन्होंने बेटियों को दफनाने की प्रथा खत्म करने की शर्त रखी। आज गुलाबो सिर्फ मंच पर नृत्य नहीं करतीं। पद्मश्री फेस्टिवल के जरिए नई पीढ़ी के लोक कलाकारों को मंच देती हैं और कलाकारों के अधिकारों के लिए भी आवाज उठाती हैं। आज वे लोक कलाकारों की नई पीढ़ी के लिए पद्मश्री फेस्टिवल आयोजित करती हैं। जन्म के बाद मिट्टी में दबाया, मां ने प्रथा के खिलाफ जाकर बचाया गुलाबो का मूल नाम धन्वंतरी है। उनका जन्म 9 नवंबर 1973 को अजमेर के कोटड़ा ढाणी की कालबेलिया बस्ती में धनतेरस के दिन हुआ था। उस समय उनके समाज में बेटी पैदा होने पर उसे जिंदा दफनाने की प्रथा थी। जन्म के बाद उन्हें भी मिट्टी में दबा दिया गया। करीब छह घंटे बाद उनकी मां अपनी बहन यानी गुलाबो की मौसी के साथ वहां पहुंचीं और बच्ची को मिट्टी से बाहर निकाल लिया। समाज को जब इसका पता चला तो परिवार पर दबाव बनाया गया। बहिष्कार की धमकी दी गई। परिवार को कहा गया कि लड़की बड़ी होकर बदनामी का कारण बनेगी। लेकिन मां ने बेटी को बचाने का फैसला नहीं बदला। धार्मिक प्रवृत्ति वाले पिता भी उनके साथ खड़े रहे। गुलाबो के मुताबिक, पिता कहते थे- “बेटियां नहीं होंगी तो वंश आगे कैसे बढ़ेगा।” डॉक्टर ने मृत बताया, दरगाह में गुलाब गिरा तो बदल गया नाम बचपन में गुलाबो गंभीर रूप से बीमार पड़ गईं। हालत बिगड़ने पर अजमेर के डॉक्टर ने उन्हें मृत घोषित कर दिया और परिजनों से बच्ची को घर ले जाने के लिए कहा। पिता उन्हें गोद में लेकर अजमेर की ख्वाजा गरीब नवाज की दरगाह पहुंचे। गुलाबो के मुताबिक, वहां प्रार्थना के दौरान करीब डेढ़ घंटे बाद एक गुलाब का फूल उनके ऊपर गिरा। इसके बाद उनके हाथ-पैर में हरकत होने लगी। पिता ने कहा- “जिसे लेकर आया था वह धन्वंतरी थी, जिसे अब लेकर जा रहा हूं वह गुलाब है।” इसके बाद धन्वंतरी के साथ गुलाब नाम जुड़ गया और आगे चलकर वे गुलाबो सपेरा के नाम से पहचानी गईं। भास्कर से बातचीत में गुलाबो ने इस पूरे प्रसंग को विस्तार से बताया छह महीने की उम्र से सांपों के साथ, उन्हीं से सीखी नृत्य की लय गुलाबो के नृत्य का कोई औपचारिक प्रशिक्षण नहीं हुआ। उनके पिता सांपों को नचाने और बीन-डफली बजाने का काम करते थे। महज छह महीने की उम्र से वे पिता के साथ जाने लगीं। सांपों को बीन की धुन पर झूमते देखकर वे उनकी हरकतों को गौर से देखती थीं। सांप की गर्दन की मटकन, शरीर का घुमाव और झूमने की गति को उन्होंने अपने नृत्य में उतारा। वे कहती हैं- “सांप ही मेरे असली गुरु रहे हैं।” यही शैली आगे चलकर उनके कालबेलिया नृत्य की पहचान बनी। तीन साल की उम्र में नाचीं, परिवार को समाज से बाहर किया तीन साल की उम्र में गुलाबो ने पुष्कर मेले में छिपकर नृत्य करना शुरू किया। समाज ने इसे परंपरा के खिलाफ माना और परिवार को समाज तथा पुष्कर से बाहर कर दिया गया। इसके बाद परिवार जयपुर आकर बस गया। गुलाबो ने ‘गुलाबी एंड पार्टी’ के साथ कार्यक्रम शुरू किए। धीरे-धीरे उनके नृत्य को बड़े मंच मिलने लगे। अमेरिका जाने से एक दिन पहले पिता की मौत 1985 में गुलाबो को अमेरिका में प्रस्तुति का मौका मिला। लेकिन विदेश जाने से ठीक एक दिन पहले उनके पिता का निधन हो गया। मां ने उन्हें अमेरिका जाने से मना किया। पिता की मौत के बाद परिवार के लिए यह कठिन समय था, लेकिन गुलाबो ने प्रस्तुति के लिए अमेरिका जाने का फैसला किया। अमेरिका में उनके कालबेलिया नृत्य को पहचान मिली। मीडिया में उनकी प्रस्तुतियों की चर्चा हुई। उन्हें अमेरिका में बसने और नागरिकता लेने का प्रस्ताव भी मिला, लेकिन उन्होंने भारत लौटने का फैसला किया। जिस समाज ने बेटी नहीं माना, उसी ने एयरपोर्ट पर स्वागत किया अमेरिका से लौटने के बाद दिल्ली एयरपोर्ट पर उनके स्वागत के लिए समाज के लोग भी पहुंचे। यही वह समाज था, जिसने कभी उनके परिवार के बहिष्कार की धमकी दी थी। समाज के पंचों ने गुलाबो को वापस अपनाने की बात कही। गुलाबो ने इसके लिए शर्त रखी कि बेटियों को जिंदा दफनाने की प्रथा बंद करनी होगी। गुलाबो के मुताबिक, समाज ने उनकी बात मानी और इस प्रथा को खत्म करने की दिशा में बदलाव आया। कुएं से पानी नहीं भरने दिया, आज समाज की बेटियां नौकरी कर रहीं गुलाबो बताती हैं कि उनके परिवार को गांव के कुएं से पानी भरने तक नहीं दिया जाता था। छुआछूत का सामना करना पड़ा। आज वे अपने समाज में बदलाव देख रही हैं। बच्चे पढ़ रहे हैं और लड़कियां नौकरियां कर रही हैं। कलाकारों के अधिकारों के लिए भी उन्होंने आवाज उठाई। जयपुर की सड़कों पर करीब 15 किलोमीटर तक नाचते हुए विरोध प्रदर्शन किया। उनका कहना है कि लोक कलाकारों को मंच के साथ सम्मान और अधिकार भी मिलना चाहिए। फिल्मों से बिग बॉस तक, लेकिन कालबेलिया पहचान कायम गुलाबो ‘बंटवारा’ और ‘फासले’ जैसी फिल्मों में काम कर चुकी हैं। वे ‘बिग बॉस’ में भी नजर आईं। इसके बावजूद उनकी पहचान कालबेलिया नृत्य और पारंपरिक वेशभूषा से ही बनी रही। गुलाबो का कहना है कि सम्मान मिलने के बाद घर बैठ जाना उनका उद्देश्य नहीं है। नई पीढ़ी के लोक कलाकारों को मंच और प्रोत्साहन देने के लिए वे हर साल ‘पद्मश्री फेस्टिवल’ आयोजित करती हैं। उनके मुताबिक, लोक कला तभी आगे बढ़ेगी, जब पुराने कलाकार नई पीढ़ी को मंच देंगे और उन्हें अपनी कला दिखाने का अवसर मिलेगा।
