मध्य प्रदेश में करीब नौ साल बाद छात्रसंघ चुनाव की तैयारियां तेज हो गई हैं। हाईकोर्ट के निर्देश के बाद राज्य सरकार ने 2026-27 के अकादमिक कैलेंडर में सितंबर में प्रदेश के सभी कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में छात्रसंघ चुनाव कराने का प्रावधान किया है। हालांकि, चुनाव प्रत्यक्ष होंगे या अप्रत्यक्ष, इसका फैसला अभी नहीं हुआ है। चुनाव से पहले कांग्रेस ने संगठनात्मक तैयारी शुरू कर दी है। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी के निर्देश पर पार्टी ने प्रदेश को 13 क्षेत्रों में बांटकर छात्रसंघ चुनाव के लिए प्रभारियों की नियुक्ति की है। इन्हें छात्र संगठनों से समन्वय करने और एनएसयूआई समर्थित उम्मीदवारों की तैयारी कराने की जिम्मेदारी दी गई है। कांग्रेस ने 13 क्षेत्रों में बांटी जिम्मेदारी 21 अगस्त को जारी सूची के अनुसार भोपाल की जिम्मेदारी प्रकाश चौकसे, इंदौर की अमन बजाज और ग्वालियर की हेवरन कसाना को दी गई है। रीवा, सतना, सीधी, सिंगरौली, मऊगंज और मैहर का प्रभार मंजुल त्रिपाठी को मिला है। सागर, दमोह, पन्ना, छतरपुर, निवाड़ी और टीकमगढ़ में अक्षय दुबे प्रभारी होंगे। शहडोल, उमरिया और अनूपपुर की जिम्मेदारी अजय यादव को दी गई है। जबलपुर संभाग के जबलपुर, कटनी, नरसिंहपुर, सिवनी, छिंदवाड़ा, बालाघाट, मंडला और डिंडोरी में विजय रजक प्रभारी बनाए गए हैं। नर्मदापुरम, हरदा और बैतूल में मयूर जायसवाल, भिंड, मुरैना और श्योपुर में सचिन द्विवेदी तथा रायसेन, राजगढ़, सीहोर और विदिशा में अर्पित उपाध्याय को जिम्मेदारी मिली है। शिवपुरी, गुना, अशोकनगर और दतिया का प्रभार सौरभ यादव संभालेंगे। धार, झाबुआ, अलीराजपुर, खरगोन, बड़वानी, खंडवा और बुरहानपुर में दीपक डुंडीर तथा उज्जैन, देवास, आगर-मालवा, शाजापुर, रतलाम, मंदसौर और नीमच में डॉ. विजय बोडाना प्रभारी होंगे। कांग्रेस ने सभी प्रभारियों से पार्टी समर्थित छात्रों को चुनाव में सहयोग देने और जीत के लिए सक्रियता से काम करने को कहा है। प्रत्यक्ष चुनाव को लेकर सियासत सितंबर में चुनाव कराने का प्रावधान होने के बावजूद चुनाव प्रणाली पर तस्वीर साफ नहीं है। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल ने कहा है कि चुनाव किस व्यवस्था से होंगे, इसका फैसला छात्र संगठनों से चर्चा के बाद किया जाएगा। कांग्रेस और एनएसयूआई प्रत्यक्ष चुनाव की मांग कर रहे हैं। एनएसयूआई का कहना है कि हर विद्यार्थी को सीधे अपने छात्रसंघ पदाधिकारी चुनने का अधिकार मिलना चाहिए। संगठन ने प्रत्यक्ष चुनाव नहीं होने पर प्रदेशव्यापी आंदोलन की चेतावनी भी दी है। हाईकोर्ट के आदेश के बाद खुला रास्ता छात्रसंघ चुनाव बहाल कराने की कानूनी प्रक्रिया जबलपुर निवासी छात्र नेता अदनान अंसारी की जनहित याचिका से शुरू हुई थी। याचिका में कहा गया था कि प्रदेश के शासकीय कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में 2017 के बाद चुनाव नहीं हुए, जबकि छात्रों से छात्रसंघ चुनाव के नाम पर शुल्क लिया जाता रहा। इसमें सुप्रीम कोर्ट द्वारा अनुमोदित लिंगदोह समिति की सिफारिशों के पालन की मांग भी की गई थी। 15 जुलाई 2026 को सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने सरकार से 2026-27 का अकादमिक कैलेंडर पेश करने और उसमें छात्रसंघ चुनाव व छात्रसंघ गठन की प्रक्रिया स्पष्ट करने को कहा था। इसके बाद 3 अगस्त को सरकार ने कैलेंडर पेश किया, जिसमें सितंबर 2026 में चुनाव कराने का प्रावधान किया गया था। कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश विवेक रूसिया और न्यायमूर्ति प्रदीप मित्तल की खंडपीठ ने कैलेंडर को रिकॉर्ड पर लेते हुए प्रदेश के सभी कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में चुनाव कराने के निर्देश के साथ याचिका का निराकरण कर दिया। चुनाव के दौरान जरूरत होने पर कॉलेज प्राचार्य या विश्वविद्यालय कुलपति स्थानीय प्रशासन और पुलिस से सुरक्षा मांग सकेंगे। लिंगदोह समिति के नियमों के तहत होंगे चुनाव सुप्रीम कोर्ट ने छात्रसंघ चुनावों में राजनीतिक हस्तक्षेप, हिंसा और धनबल की शिकायतों के बीच 12 दिसंबर 2005 को पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त जेएम लिंगदोह की अध्यक्षता में समिति गठित की थी। 22 सितंबर 2006 को सुप्रीम कोर्ट ने समिति की सिफारिशों को स्वीकार करते हुए देशभर में छात्रसंघ चुनाव इन्हीं मानकों के अनुसार कराने के निर्देश दिए थे। इन सिफारिशों में उम्मीदवारों की उम्र, उपस्थिति, चुनाव खर्च, आपराधिक पृष्ठभूमि और राजनीतिक हस्तक्षेप जैसे मुद्दों के लिए नियम तय किए गए हैं। चुनाव के लिए प्रत्यक्ष, अप्रत्यक्ष और मिश्रित मॉडल की व्यवस्था भी रखी गई थी। 2003 में बंद हुए थे प्रत्यक्ष चुनाव मध्य प्रदेश में 2003 में तत्कालीन भाजपा सरकार ने प्रत्यक्ष छात्रसंघ चुनाव बंद कर दिए थे। इसके बाद कुछ समय तक कक्षा प्रतिनिधियों के जरिए अप्रत्यक्ष चुनाव कराए गए। 2006 में उज्जैन के माधव कॉलेज में प्रोफेसर एचएस सभरवाल की हत्या के बाद छात्रसंघ चुनाव पूरी तरह रोक दिए गए। 2017 में सरकार ने करीब नौ साल बाद चुनाव दोबारा शुरू किए। उस समय कक्षा प्रतिनिधियों के चुनाव के साथ कॉलेज स्तर पर अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, सचिव और संयुक्त सचिव जैसे पदों के लिए प्रक्रिया अपनाई गई थी। विश्वविद्यालय स्तर पर निर्वाचित छात्र प्रतिनिधियों के जरिए परिषद का गठन किया गया था। यानी यह व्यवस्था पूरी तरह प्रत्यक्ष नहीं थी। 2017 के बाद कोरोना समेत विभिन्न कारणों से चुनाव नहीं हो सके। अब हाईकोर्ट के निर्देश के बाद करीब नौ साल बाद फिर छात्रसंघ चुनाव का रास्ता खुला है। सितंबर में चुनाव की तैयारी शुरू होने के साथ ही प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष प्रणाली का मुद्दा कैंपस राजनीति में सबसे बड़ा विवाद बनता नजर आ रहा है।
