“मैं कुएं के पास पहुंचा तो ऐसा लगा जैसे वहां कभी कुआं था ही नहीं। मैं मां… मां… और प्रियंका… प्रियंका… चिल्लाता रहा, लेकिन कहीं से कोई आवाज नहीं आई। करीब 6 घंटे तक खुदाई चलती रही। हर बार मशीन मिट्टी हटाती तो उम्मीद जागती कि शायद मां और पत्नी जिंदा मिल जाएं, लेकिन शाम होते-होते उम्मीद टूट गई। पहले मां, फिर पत्नी का शव मलबे में दबा मिला।” राजगढ़ जिले के खिलचीपुर क्षेत्र के बामनगांव निवासी कांग्रेस नेता और जनपद सदस्य मुकेश दांगी जब यह कहते हैं तो उनकी आंखें भर आती हैं। 17 जून की सुबह उनके खेत में जो कुछ हुआ, उसने एक पल में पूरे परिवार की दुनिया बदल दी। खेत में बना नया कुआं अचानक धंस गया और उसकी चपेट में आकर उनकी मां रूपा बाई दांगी (52) और पत्नी प्रियंका उर्फ पिंकी दांगी (30) की मौत हो गई। हादसे के तीन दिन बाद भी बामनगांव में सन्नाटा पसरा है। गांव की गलियों में लोग बस इसी घटना की चर्चा कर रहे हैं। हर कोई यही कहता है कि मां जैसी सास और बेटी जैसी बहू एक साथ चली गईं। पढ़िए रिपोर्ट… देखिए हादसे के बाद की तस्वीरें मुझे क्या पता था कि मां से हुई वह बातचीत आखिरी होगी… भास्कर टीम सबसे पहले मुकेश दांगी के घर पहुंची। घर के हॉल में रिश्तेदार बैठे थे। पूरा माहौल गमगीन था। मुकेश दो साल के बेटे मितांश को पास में बैठाकर मोबाइल पर उसकी मां की तस्वीरें दिखा रहे थे। मितांश कभी मोबाइल स्क्रीन देखता तो कभी दरवाजे की ओर। शायद उसे अब भी लग रहा था कि उसकी मां कहीं गई है और थोड़ी देर में लौट आएगी। जब भास्कर ने मुकेश से घटना के बारे में पूछा तो मां और पत्नी का जिक्र आते ही उनकी आवाज भर्रा गई। आंसू छलक पड़े। कुछ पल खामोश रहे। फिर धीमे स्वर में बोले- मुझे क्या पता था कि घर से निकलते समय मां से हुई बात आखिरी बातचीत होगी। मुकेश के घर की तस्वीरें कुछ देर पहले ही अंकल का बेटा कुएं में उतरा था मुकेश बताते हैं कि खेत में पहले से एक पुराना कुआं था, जिसे पक्का बनाने का काम करीब 15 दिनों से चल रहा था। कुएं को मजबूत करने के लिए करीब 5 क्विंटल सरिया, 100 बोरी सीमेंट, रेत और गिट्टी का उपयोग किया गया था। मंगलवार तक निर्माण कार्य लगभग पूरा हो चुका था। रात में पुराने कुएं से नए कुएं तक एक नाली खुदवाई गई थी, जिसमें पाइप डालकर ऊपर से मिट्टी भर दी गई। योजना थी कि संतरों की सिंचाई के लिए नए कुएं में पानी भरा जाए। मुकेश कहते हैं- बुधवार सुबह करीब 9 बजे मैं खेत पहुंच गया था। मजदूर और कारीगर भी आ चुके थे। घर से निकलते समय मम्मी से कहा- जब आप आना तो मजदूरों व कारीगरों के लिए भी खाना लेती आना। खेत पर पहुंचकर मैं, दो चचेरे भाई, तीन मजदूर और कारीगर काम में जुट गए। करीब 11 बजे मां रूपा बाई और पत्नी प्रियंका खाना लेकर पहुंचीं। मां मेरे लिए कपड़े में आम लपेटकर लाई थी मुकेश बताते हैं- मां दो टिफिन लाई थी। एक मेरे और मजदूरों के लिए, दूसरा अपने और प्रियंका के लिए। मां के आने के बाद अंकल का बेटा कुएं में उतरा। उसने मोटर नीचे रखी। मैंने भी मोटर की पाइप इधर से उधर की। हम तराई का काम कर रहे थे। मां ने मुझसे कहा- मैं देखती हूं। तुम लोग जाकर खाना खा लो। हम अपने लिए भी खाना लेकर आए हैं। उसे अलग रख देना। मुकेश कहते हैं- इसके बाद मां ने मुझे संतरे के बगीचे के पास पानी की टंकी बनाने की सलाह दी। कुएं के आसपास बिखरी गिट्टी को वह समेटने लगीं। प्रियंका भी उनके साथ काम में जुट गई। मैं, कारीगर और मजदूर संतरे के बगीचे को पार कर करीब 300 मीटर दूर खेजड़ी के पेड़ के नीचे जाकर बैठ गए। पहले हमने खाना खाया। फिर निर्माण कार्य का हिसाब-किताब करने लगे। कपड़े में बंधा आम वैसे ही रखा मिला, टिफिन की दाल सूख गई थी भास्कर की टीम उस खेजड़ी के पेड़ के नीचे पहुंची, जहां मुकेश ने कारीगरों और मजदूरों के साथ बैठकर खाना खाया था। वहीं मां और पत्नी के लिए टिफिन में रखा खाना भी जस का तस रखा हुआ था। मुकेश के लिए कपड़े में बांधकर जो आम रूपा बाई लाई थीं, वह भी उसी तरह बंधा हुआ पड़ा मिला। मुकेश ने सोचा था कि मां बाद में आम के साथ रोटी खा लेंगी, लेकिन वह आम वैसे ही रखा रह गया। टिफिन भी उसी तरह बंधे हुए थे। जब भास्कर टीम ने टिफिन खोले तो एक में रोटियां, दूसरे में गिलकी की सब्जी और तीसरे में दाल मिली। तीन दिन से रखा होने के कारण दाल अब सूख चुकी थी। आंटी बोलीं- न तेरी मम्मी है, न बहू और न कुआं मुकेश बताते हैं- मैं खाना खाकर पेड़ के नीचे बैठा हिसाब-किताब कर रहा था, तभी आंटी सुमित्रा बाई आईं। पूछा- भाभी रूपा बाई और बहू प्रियंका कहां हैं? मैंने कहा- दोनों कुएं के पास हैं। आंटी उनकी मदद करने वहां गईं, लेकिन कुछ देर बाद दौड़ते हुए आईं। घबराकर बोलीं- वहां न कुआं दिख रहा, न तेरी मम्मी और न बहू। मुकेश बताते हैं कि आंटी ने कहा- मेरी आंखें खराब तो नहीं हो गईं, तू चलकर देख। मैं दौड़कर मौके पर पहुंचा। वहां देखा कि कुआं पूरी तरह समतल हो चुका था। मैं मां… मां… और प्रियंका… प्रियंका… चिल्लाता रहा मुकेश बोले- जब मैं वहां पहुंचा तो ऐसा लगा जैसे वहां कभी कुआं था ही नहीं। मैं मां… मां… और प्रियंका… प्रियंका… चिल्लाता रहा। कहीं से कोई आवाज नहीं आई। कुछ ही देर में गांव के लोग मौके पर जुटने लगे। कोई ट्रैक्टर लेकर पहुंचा तो कोई जेसीबी बुलाने दौड़ा। देखते ही देखते हजारों ग्रामीण खेत पर इकट्ठा हो गए। प्रशासन, पुलिस और राजस्व विभाग की टीमें भी वहां पहुंच गईं। करीब 6 घंटे तक लगातार खुदाई चलती रही। हर बार मशीन मिट्टी हटाती तो परिवार की उम्मीद जागती कि शायद दोनों जिंदा मिल जाएं, लेकिन शाम होते-होते सारी उम्मीदें टूट गईं। पहले करीब 12 फीट नीचे रूपा का शव खड़ी अवस्था में मिला। इसके बाद 20 फीट की गहराई में प्रियंका का शव लेटी अवस्था में मिला। ग्रामीणों का अनुमान है कि प्रियंका कुएं के ज्यादा करीब रही होंगी। जैसे ही कुआं धंसा, वह उसमें समाने लगीं, उन्हें बचाने रूपा बढ़ी होंगी, लेकिन वह भी मलबे में दब गईं। मां-बेटी जैसा था सास-बहू का रिश्ता गांव की सरपंच पूनम दांगी बताती हैं- रूपा बाई और प्रियंका के बीच सास-बहू से बढ़कर मां-बेटी जैसा रिश्ता था। दोनों घर और खेत का अधिकांश काम मिलकर करती थीं। जिस कुएं पर हादसा हुआ, वह एक दिन पहले ही तैयार हुआ था। हादसे के वक्त दोनों महिलाएं उसके आसपास सफाई कर रही थीं। तीन बच्चों के सिर से उठ गया मां का साया मुकेश और प्रियंका की शादी 2013 में हुई थी। उनकी 11 साल की बेटी सपना, 4 साल की शारदा और 2 साल का बेटा मितांश है। इस हादसे ने बच्चों से उनकी मां छीन ली, जबकि मुकेश ने एक ही दिन में मां और जीवनसाथी दोनों को खो दिया। बामनगांव में आज भी लोग उस धंसे हुए कुएं को देखकर ठिठक जाते हैं, क्योंकि वहां सिर्फ मिट्टी नहीं धंसी, एक परिवार की खुशियां भी उसी मलबे के नीचे दब गईं। ………………………. यह खबर भी पढ़ें राजगढ़ में कुआं धंसा, कांग्रेस नेता की मां-पत्नी दबीं: 6 घंटे चले रेस्क्यू के बाद मलबे से निकाले शव मध्य प्रदेश के राजगढ़ जिले के खिलचीपुर क्षेत्र के बामन गांव में बुधवार दोपहर कुआं धंस गया। हादसे में कांग्रेस नेता और जनपद सदस्य मुकेश कोट (डांगी) की 60 वर्षीय मां रूपा बाई और 30 वर्षीय पत्नी पिंकी बाई मिट्टी के मलबे में दब गईं। करीब 7 घंटे रेस्क्यू ऑपरेशन के बाद शव मलबे से बाहर निकाले गए। पढ़ें पूरी खबर
