“तुम्हारी फाइलों में गांव का मौसम गुलाबी है,
मगर ये आंकड़े झूठे हैं, ये दावा किताबी है…” प्रख्यात जनकवि अदम गोंडवी की ये पंक्तियां आज मध्य प्रदेश में स्वच्छ भारत मिशन (ग्रामीण) की जमीनी हकीकत पर हूबहू सटीक बैठ रही हैं। सरकारी रिकॉर्ड और पोर्टल की रंगीन फाइलों में मध्य प्रदेश के 50 हजार 915 गांव पूरी तरह खुले में शौचमुक्त (ओडीएफ प्लस) घोषित होकर ‘आदर्श’ बन चुके हैं। लेकिन जमीनी सच कोसों दूर है। हकीकत यह है कि नब्बे फीसदी से अधिक पंचायतों ने एक भी स्वच्छता मानक पूरा किए खुद प्रमाण-पत्र जारी कर ओडीएफ प्लस का तमगा दे दिया। अफसरों ने भी बिना जांच-पड़ताल दफ्तरों में बैठकर ‘फर्स्ट वेरिफिकेशन’ में हां लिखकर इन फर्जी दावों पर मुहर लगा दी। स्वच्छ भारत मिशन ग्रामीण के आधिकारिक एमआईएस पोर्टल के अनुसार, प्रदेश के 55 जिलों की 22,708 ग्राम पंचायतों में आने वाले 51,043 गांवों में से 50,915 गांव ओडीएफ प्लस स्वघोषित हो चुके हैं। इनमें 50,851 गांवों को ‘ओडीएफ प्लस मॉडल’ की सर्वोच्च श्रेणी में दिखाया गया है। 40,114 गांवों का प्रथम सत्यापन भी पूरा दर्ज है। कागजों में मप्र शौचमुक्त और स्वच्छ हो चुका है लेकिन गांवों में प्रवेश करते ही सड़ांध मारते कचरे के ढेर, सड़कों पर बहता बदबूदार पानी और खुले में शौच जाते ग्रामीण करते हैं। एक-दूसरे पर टाला जिम्मा जब करोड़ों के बजट और कागजी आंकड़ों के इस फर्जीवाड़े पर भोपाल स्थित राज्य स्वच्छ भारत मिशन के जिम्मेदार अधिकारियों से जवाब मांगा गया, तो वे सवालों से बचते दिखे: नीरजा उपाध्याय (उपायुक्त, एसबीएम) : “यह मामला उपायुक्त दीपक राय के कार्यक्षेत्र में आता है, वही इस पर विस्तार से बता पाएंगे।’ दीपक राय (उपायुक्त, एसबीएम) : मुझे विभाग में आए अभी 20 दिन ही हुए हैं। पिछले तीन वर्षों से ओडीएफ प्लस का पूरा कार्य नीरजा उपाध्याय मैडम और प्रज्ञा मैडम देख रही थीं। पूरी व्यवस्था उन्हीं के नियंत्रण में थी।’
