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कविता, मुशायरे से सिनेमा और दर्शन तक…:काफ्का की किताब का हिंदी अनुवाद जारी,महिलाओं के सिनेमा और बुद्ध के दर्शन पर हुई चर्चा,दूसरे दिन 12 रचनाकारों ने बांधा समां

वाणी साहित्य उत्सव के दूसरे दिन शुक्रवार को साहित्य, कविता, सिनेमा, अनुवाद और दर्शन से जुड़े विभिन्न विषयों पर विचारों का आदान-प्रदान हुआ। दिनभर चले सत्रों में देश के प्रतिष्ठित साहित्यकारों, लेखकों, कवियों, अनुवादकों और फिल्म निर्माताओं ने अपनी बात रखी। कहीं कविता और मुशायरे की महफिल सजी तो कहीं स्त्री-अनुभव, आध्यात्मिकता और समकालीन साहित्य के विभिन्न पहलुओं पर चर्चा हुई। दिन की शुरुआत ‘वाणी कविता कुंभ और मुशायरा : ओपन माइक’ से हुई। इसके लिए 600 प्रतिभागियों में से चुने गए 12 रचनाकारों ने अपनी कविताएं और शायरी सुनाई। इस मंच पर युवा और नए रचनाकारों को अपनी प्रतिभा दिखाने का अवसर मिला। प्रस्तुतियों में तीन पीढ़ियों की काव्य-संवेदनाएं भी देखने को मिलीं। काफ्का की ‘द ट्रायल’ का हिंदी अनुवाद जारी उत्सव के प्रमुख आकर्षणों में लेखिका और अनुवादक गरिमा श्रीवास्तव द्वारा फ्रांज काफ्का की चर्चित कृति ‘द ट्रायल’ के हिंदी अनुवाद का लोकार्पण रहा। इस दौरान वक्ताओं ने काफ्का की साहित्यिक शैली, जटिल कथानक और दार्शनिक विचारों को हिंदी पाठकों तक पहुंचाने के महत्व पर चर्चा की। बच्चों के लिए आयोजित ‘बच्चों का मौजघर’ कहानी कार्यशाला में वाणी त्रिपाठी टिक्कू ने कहानी कहने की कला, कल्पनाशीलता और रचनात्मक अभिव्यक्ति के बारे में बताया। कार्यशाला में बच्चों के साथ बड़ों ने भी हिस्सा लिया। सिनेमा में महिलाओं की भूमिका पर चर्चा ‘द रिवोल्यूशनरीज : विमेन क्रिएटिंग विमेन, स्टोरीज अनटोल्ड’ सत्र में फिल्म निर्माता मोनिशा आडवाणी और मधु भोजवानी ने सिनेमा में महिलाओं के बदलते प्रतिनिधित्व पर विचार रखे। उन्होंने कहा कि महिलाएं अब सिर्फ फिल्मों की कहानियों का हिस्सा नहीं हैं, बल्कि वे अपनी कहानियां खुद गढ़ने और उन्हें पर्दे पर प्रस्तुत करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। इस दौरान लेखक पंकज दुबे की आगामी पुस्तक ‘ये हसल हसीन है’ के कवर का लोकार्पण भी किया गया। वहीं ‘गुलमेंहदी की झाड़ियां : सम्मोहक सरोवर में तरुण भटनागर की कहानियां’ सत्र में लेखक तरुण भटनागर के कथा-संसार और उनकी लेखन शैली पर चर्चा हुई। ‘रामेश्वर राय : माट सा ब की कक्षा’ सत्र में रामेश्वर राय ने अपनी साहित्यिक यात्रा और अनुभव साझा किए। बुद्ध के दर्शन और आध्यात्मिकता पर मंथन ‘बुद्ध : आध्यात्मिक घटना या दुर्घटना?’ विषय पर आयोजित संवाद में बुद्ध के जीवन, दर्शन और आध्यात्मिक चिंतन के विभिन्न पहलुओं पर चर्चा हुई। इसके अलावा भगवानदास मोरवाल की नई पुस्तक ‘मानुस हों तो’ का लोकार्पण किया गया। दिन का एक अन्य आकर्षण ‘शीन काफ निजाम की छाया में मुशायरा’ रहा। यह मुशायरा रघुपति सहाय फिराक गोरखपुरी और राहत इंदौरी को समर्पित था। इसमें उर्दू शायरी की परंपरा, सौंदर्यबोध और आज के दौर में उसकी प्रासंगिकता पर चर्चा के साथ शायरों ने अपनी रचनाएं प्रस्तुत कीं। इसी क्रम में पुस्तक ‘इश्क के सात पड़ाव’ का भी लोकार्पण हुआ। साहित्य को समाज की चेतना से जोड़ना उद्देश्य वाणी प्रकाशन समूह की सीईओ अदिति माहेश्वरी ने कहा कि उत्सव का उद्देश्य केवल साहित्यिक कृतियों का उत्सव मनाना नहीं, बल्कि विचार, संवेदना और संवाद के लिए ऐसा साझा मंच तैयार करना है, जहां अलग-अलग पीढ़ियों, भाषाओं और अभिव्यक्तियों को एक-दूसरे से जुड़ने का अवसर मिले। दूसरे दिन के सत्रों ने साहित्य और समाज के बीच संवाद को आगे बढ़ाया है। वाणी प्रकाशन समूह के मैनेजिंग डायरेक्टर अरुण माहेश्वरी ने कहा कि साहित्य केवल पढ़ने की वस्तु नहीं, बल्कि समाज की चेतना को दिशा देने वाली शक्ति है। कविता, अनुवाद, सिनेमा, दर्शन और नए विमर्शों को एक मंच पर लाना आज की बौद्धिक और सांस्कृतिक जरूरत है।

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