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इंदौर में बुजुर्गों की अनदेखी पड़ी भारी:बेटे के परिवार को मकान खाली करने का आदेश, रिश्तों में दरार के बीच प्रशासन बना सहारा

इंदौर के एक बुजुर्ग दंपती को लंबे समय से पारिवारिक प्रताड़ना झेलने के बाद प्रशासनिक राहत मिली है। सोमवार को कलेक्टोरेट में आयोजित वृद्धजन विशेष जनसुनवाई में एसडीएम कोर्ट ने भरण-पोषण अधिनियम के तहत महत्वपूर्ण आदेश जारी करते हुए छोटे बेटे के परिवार को मकान का हिस्सा खाली कर दंपती को कब्जा सौंपने के निर्देश दिए हैं। यह कार्रवाई एक हफ्त में पूरी करनी होगी। यह मामला वरिष्ठ नागरिकों के अधिकारों की रक्षा और उन्हें त्वरित न्याय दिलाने की दिशा में सराहनीय पहल है। मामला शिवाजी नगर निवासी हीरालाल कश्यप और धर्मा देवी कश्यप का है। उनके तीन मंजिला मकान में बुजुर्ग दंपती ग्राउण्ड फ्लोर पर रहते हैं, जबकि पहली और दूसरी मंजिल पर उनके दोनों बेटों का परिवार निवास करता है। दंपती की शिकायत थी कि दोनों बेटे और बहुएं उनका ध्यान नहीं रखते, जबकि छोटी बहू के व्यवहार से वे विशेष रूप से परेशान थे। उन्होंने आरोप लगाया कि छोटी बहू उनके रिश्तेदारों और बेटियों के आने-जाने पर आपत्ति जताती थी और अक्सर विवाद करती थी। उन्हें मकान खाली करने को कहते थे तो नहीं किया। धर्मा देवी कश्यप ने बताया कि पारिवारिक तनाव के कारण वे लंबे समय से मानसिक रूप से परेशान थीं। उन्होंने कहा कि रिश्तेदारों और बेटियों के घर आने पर विवाद की स्थिति बन जाती थी, जिससे परिवार में लगातार तनाव बना रहता था। करीब तीन माह पहले दंपती ने माता-पिता एवं वरिष्ठ नागरिक भरण-पोषण अधिनियम के तहत आवेदन प्रस्तुत किया था। मामले की सुनवाई के बाद सोमवार को विशेष जनसुनवाई शिविर में एसडीएम घनश्याम धनगर ने छोटे बेटे के परिवार को मकान खाली कर कब्जा सौंपने का आदेश पारित किया। दंपती के एडवोकेट अमित मंडलोई ने बताया कि कश्यप दंपती जूनी इंदौर एसडीएम कार्यालय में आवेदन प्रस्तुत कर अपने बेटों और पुत्रवधुओं से प्रताड़ना की शिकायत की थी। सुनवाई के बाद प्रशासन ने दंपती के पक्ष में आदेश जारी करते हुए संपत्ति का कब्जा उन्हें सौंपने का आदेश दिया है। खास बात यह कि आदेश में स्पष्ट लिखा है कि अगर निर्धारित अवधि में बेटा-बहू मकान खाली नहीं करते हैं तो तहसीलदार पुलिस बल के साथ मकान खाली कराकर कश्यप दंपती को कब्जा सौंपे। एडवोकेट ने बताया कि कानून के माध्यम से किसी असहाय माता-पिता को उनका हक और सम्मान वापस दिलाना समाज के लिए सबसे बड़ी सेवा है। अक्सर इस उम्र में बुजुर्ग कानूनी बारीकियों को समझने या अदालतों के चक्कर काटने में असमर्थ होते हैं। ऐसे उनके पक्ष में खड़े होना और उन्हें न्याय दिलाना वास्तव में सुकून देता है ।

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