Homeमध्यप्रदेशआंख बंद होते ही दिमाग में चलने लगता है रीप्ले:दस में से...

आंख बंद होते ही दिमाग में चलने लगता है रीप्ले:दस में से 4 लोग परेशान, हर रात बढ़ता मानसिक दबाव, नींद और सेहत पर असर

रात में बिस्तर पर जाते ही अगर दिनभर की बातें बार-बार दिमाग में घूमने लगती हैं, तो यह सिर्फ सोचने की आदत नहीं, बल्कि एक गहरी मानसिक प्रक्रिया है। मनोचिकित्सकों के अनुसार इन दिनों ओपीडी में आने वाले 10 में से 4 मरीज इस समस्या से जूझ रहे हैं। खासतौर पर लाइट बंद होते ही दिमाग ‘रीप्ले मोड’ में चला जाता है। किस व्यक्ति से कौन सी बात गलत कह दी, किसने क्या सोचा होगा, ऐसे सवाल बार-बार उभरते हैं। यह समस्या सिर्फ नींद ही नहीं बिगाड़ती, बल्कि धीरे धीरे मानसिक स्वास्थ्य और आत्मविश्वास पर भी असर डालने लगती है। क्या है ‘रीप्ले’ का खेल जो नहीं रुकती सोच मनोचिकित्सक डॉ. सत्यकांत त्रिवेदी बताते हैं कि यह सामान्य ओवरथिंकिंग नहीं, बल्कि दिमाग की एक बायोलॉजिकल प्रक्रिया है। दिनभर के अनुभवों को समझने और उनका मतलब निकालने के लिए दिमाग रात में सक्रिय हो जाता है। जब आसपास शांति होती है और बाहरी गतिविधियां कम हो जाती हैं, तब दिमाग अंदर की ओर फोकस करने लगता है। यही वजह है कि दिन में छोटी लगने वाली बातें रात में बड़ी लगने लगती हैं।

डॉ. त्रिवेदी के अनुसार, पहले ऐसे दो से तीन केस ही सामने आते थे। लेकिन, अब यह समस्या लगातार बढ़ रही है। बीते एक साल की बात करें तो ओपीडी में 30 से 40 प्रतिशत मामले इसी समस्या के साथ आ रहे हैं। कई लोगों में यह रात में नींद ना आने की समस्या और फिर पूरा दिन सुस्ती की समस्या का रूप में परेशान करती है। डॉ. त्रिवेदी के अनुसार, दिनभर हमारा दिमाग काम, मोबाइल, बातचीत और शोर में उलझा रहता है। लेकिन जैसे ही रात होती है, यह बाहरी इनपुट कम हो जाता है। इस समय दिमाग का एक हिस्सा, जिसे “डिफॉल्ट मोड नेटवर्क” कहा जाता है, ज्यादा सक्रिय हो जाता है। यह हिस्सा आत्मचिंतन और यादों से जुड़ा होता है। ऐसे में दिमाग हाल की बातचीत और भावनात्मक घटनाओं को बार-बार दोहराने लगता है। सोशल टेंशन को खतरे की तरह लेता है दिमाग किसी बातचीत में छोटी सी गलती या अजीब सा पल हमें मामूली लग सकता है, लेकिन दिमाग इसे खतरे की तरह ले सकता है। मानव विकास के दौरान सामाजिक स्वीकृति जरूरी थी। इसलिए आज भी दिमाग सामाजिक असहजता को तनाव के रूप में लेता है। इस दौरान शरीर में कोर्टिसोल (स्ट्रेस हार्मोन) बढ़ जाता है, जिससे दिमाग शांत होने के बजाय और ज्यादा सक्रिय हो जाता है। रात के समय दिमाग दिनभर की यादों को व्यवस्थित करता है। खासतौर पर भावनात्मक घटनाओं को ज्यादा प्राथमिकता मिलती है। लेकिन जब दिमाग गहरी नींद में जाने के बजाय एक्टिव सोच में फंसा रहता है, तो यह प्रक्रिया थका देने वाली बन जाती है। इससे नींद पूरी नहीं होती और अगला दिन भी प्रभावित होता है। दिमाग सिर्फ याद नहीं करता, एडिट भी करता है यह ‘रीप्ले’ सिर्फ याद करने तक सीमित नहीं रहता। दिमाग इसमें “क्या होता अगर…” जैसे सीन भी जोड़ता है। इसे मानसिक समय यात्रा (Mental Time Travel) कहा जाता है। इस प्रक्रिया में दिमाग पुराने अनुभवों के आधार पर भविष्य की तैयारी करता है। लेकिन इसका साइड इफेक्ट यह होता है कि इंसान बार-बार उसी सोच में फंस जाता है। जब सोच बन जाती है लूप कभी-कभार किसी बात को याद करना सामान्य है, लेकिन जब यही प्रक्रिया बार-बार होने लगे तो यह लूप बन जाती है। यह लूप तीन चीजों से चलता है। इसमें अनिश्चितता, खुद पर शक और अधूरी बात का एहसास शामिल हैं। दिमाग तब तक घूमता रहता है, जब तक उसे कोई जवाब नहीं मिल जाता, भले ही असल में कोई जवाब हो ही न। मनोचिकित्सक डॉ. त्रिवेदी के अनुसार, लगातार ऐसा होने से चिंता बढ़ सकती है, आत्मविश्वास कम हो सकता है और व्यक्ति खुद को लेकर ज्यादा नेगेटिव सोचने लगता है। धीरे-धीरे दिमाग हर बातचीत को तनाव से जोड़ने लगता है, जिससे सामान्य स्थितियां भी भारी लगने लगती हैं। ये खबर भी पढ़ें… मानसिक स्वास्थ्य की इमरजेंसी बन रही चुनौती वो बस तनाव में है, थोड़ा वक्त दो ठीक हो जाएगा। लेकिन, कई बार यही थोड़ा वक्त जिंदगी और मौत के बीच की दूरी बन जाता है। भोपाल की गांधी मेडिकल कॉलेज की मानसिक रोग विभाग की एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. रुचि सोनी कहती हैं कि मानसिक स्वास्थ्य संकट समय नहीं देखता। हमें ऐसी प्रणाली चाहिए जहां रात 2 बजे भी कोई मदद पा सके।पूरी खबर पढ़ें

Stay Connected
16,985FansLike
2,458FollowersFollow
61,453SubscribersSubscribe
Must Read
Related News

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here