जबलपुर में सरकारी राशि के गबन का एक बड़ा मामला सामने आया है। कृषि विभाग की जांच में खुलासा हुआ है कि रायसेन जिले की बेगमगंज सीड प्रोड्यूसर लिमिटेड कंपनी के डायरेक्टरों और कर्मचारियों ने फर्जी दस्तावेज, जाली बैंक खाते और नकली किसान सदस्य दिखाकर करीब 39.67 लाख रुपए की सरकारी राशि हड़प ली। यह पूरा गबन 2022-23 के बीच हुआ। दरअसल, सरकार अनाज खरीदी (उपार्जन) का काम कुछ समितियों और कंपनियों को देती है। इसके लिए कुछ नियम होते हैं। जैसे कंपनी के पास कम से कम 50 लाख रुपए की नकद राशि या क्रेडिट लिमिट होना जरूरी है और वास्तविक किसान सदस्य होना जरूरी है। आरोप है कि बेगमगंज सीड प्रोड्यूसर लिमिटेड के संचालकों ने इन नियमों को पूरा दिखाने के लिए फर्जी दस्तावेज तैयार किए। मामले में मंगलवार को कंपनी के 6 डायरेक्टर और 3 कर्मचारियों पर एफआईआर की गई है। अब जानिए घोटाला कैसे हुआ… 1. फर्जी बैंक खाता दिखाया
जांच में सामने आया कि बेगमगंज सीड प्रोड्यूसर लिमिटेड ने अपनी आर्थिक क्षमता दिखाने के लिए आईसीआईसीआई बैंक का एक खाता दस्तावेजों में प्रस्तुत किया था। लेकिन जब जांच दल ने बैंक से सत्यापन कराया तो पता चला कि जिस खाते को कंपनी का बताया गया था, वह वास्तव में कंपनी के नाम पर था ही नहीं। आरोप है कि कंपनी ने सरकारी योजनाओं का लाभ लेने और पात्रता साबित करने के लिए गलत बैंक जानकारी का उपयोग किया। 2. फर्जी किसान सदस्य बनाए
जांच के दौरान कंपनी द्वारा जमा की गई किसान सदस्यों की सूची की भी पड़ताल की गई। सूची में दर्ज कई किसानों के मोबाइल नंबरों पर अधिकारियों ने सीधे संपर्क किया। फोन पर ग्रामीणों ने बताया कि वे न तो कंपनी को जानते हैं और न ही उसके सदस्य हैं। इसके अलावा किसान सूची में कई सदस्यों के पते, शेयर राशि और अन्य जरूरी विवरण भी दर्ज नहीं मिले। जांच एजेंसियों का मानना है कि कंपनी ने कागजों में फर्जी या बिना जानकारी वाले किसानों को सदस्य दिखाकर संस्था को बड़ा और पात्र साबित किया और उसी आधार पर सरकारी लाभ और सब्सिडी हासिल की। 3.बिना प्रक्रिया अपनाए कर्मचारियों की नियुक्ति जांच में यह भी सामने आया कि कंपनी में प्रबंधक मनीष चौरसिया, लेखापाल कमलेश साहू और कंप्यूटर ऑपरेटर नीलेश विश्वकर्मा की नियुक्ति नियमों के अनुसार नहीं की गई। कंपनी के रिकॉर्ड में ऐसी कोई बैठक, एजेंडा या प्रस्ताव नहीं मिला, जिसमें इन नियुक्तियों को मंजूरी दी गई हो। नियुक्ति पत्रों पर तारीख तक दर्ज नहीं थी। इतना ही नहीं, अलग-अलग दस्तावेजों पर किए गए हस्ताक्षरों में भी अंतर पाया गया। जांच दल ने इन नियुक्ति दस्तावेजों को संदिग्ध, फर्जी और नियम विरुद्ध माना है। आरोप है कि इन कर्मचारियों की मदद से पूरे वित्तीय लेनदेन और दस्तावेजी प्रक्रिया को संचालित किया गया। 39.67 लाख रुपए की राशि का गबन मध्य प्रदेश राज्य सहकारी विपणन संघ मर्यादित, जबलपुर की रिपोर्ट में खुलासा हुआ कि कंपनी ने प्रासंगिक व्यय, हैंडलिंग और कमीशन के नाम पर 39 लाख 67 हजार 781 रुपए की सरकारी सब्सिडी और सहायता राशि प्राप्त की थी। जांच में यह राशि फर्जी दस्तावेजों के आधार पर प्राप्त करना पाया गया। शिकायत के बाद शुरू हुई जांच किसान मजदूर महासंघ के जिला अध्यक्ष राजेंद्र सिंह ठाकुर ने पूरे मामले की शिकायत प्रशासन से की थी। इसके बाद कलेक्टर के निर्देश पर उच्च स्तरीय जांच कराई गई। जांच में सामने आया कि कंपनी के संचालकों और कर्मचारियों ने मिलकर फर्जी दस्तावेजों के आधार पर सरकारी योजनाओं का लाभ लिया और शासन को आर्थिक नुकसान पहुंचाया। मामले में किसान कल्याण और कृषि विकास विभाग के सहायक संचालक रवि कुमार आम्रवंशी ने पुलिस को शिकायत की। मामले में मंगलवार को पाटन थाना पुलिस ने 6 डायरेक्टर और 3 कर्मचारियों के खिलाफ अलग-अलग धाराओं में एफआईआर दर्ज की है। फोन किए तो सामने आ गया पूरा खेल जांच के दौरान 7 अप्रैल 2026 को कंपनी द्वारा जमा कराई गई किसान सूची में दिए गए मोबाइल नंबरों पर संपर्क किया गया। फोन उठाने वाले ग्रामीणों ने साफ कहा कि वे कंपनी को नहीं जानते और न ही उसके सदस्य हैं। इसके बाद अधिकारियों को फर्जी सदस्य बनाने की आशंका हुई। पुलिस ने दर्ज किया मामला गड़बड़ी की पुष्टि होने के बाद उप संचालक किसान कल्याण के निर्देश पर सहायक संचालक रवि कुमार आम्रवंशी ने पाटन थाने में शिकायत दर्ज कराई। पुलिस ने आरोपियों के खिलाफ धोखाधड़ी, जालसाजी और आपराधिक षड्यंत्र से संबंधित धाराओं में मामला दर्ज कर लिया है। 6 डायरेक्टर और 3 कर्मचारी नामजद पुलिस के अनुसार मामले में कंपनी के डायरेक्टर सचिन दुबे, रंजना पाण्डे, संदीप दुबे, अंशुल बर्मन, नेहा पाण्डे और उमा सिंह को आरोपी बनाया गया है। इनके अलावा कंपनी के प्रबंधक मनीष चौरसिया, लेखापाल कमलेश साहू और कंप्यूटर ऑपरेटर नीलेश विश्वकर्मा को भी नामजद किया गया है। आरोपियों की तलाश में दबिश पाटन थाना पुलिस अब मामले से जुड़े दस्तावेजों की जांच कर रही है। साथ ही नामजद आरोपियों की गिरफ्तारी के लिए विभिन्न स्थानों पर दबिश दी जा रही है। पुलिस आर्थिक अपराध के पूरे नेटवर्क और सरकारी राशि के उपयोग की भी जांच कर रही है।
