बुंदेलखंड की प्राचीन शस्त्र कला ‘अखाड़ा’ को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाने वाले 83 वर्षीय भगवानदास रायकवार ‘दाऊ’ का भोपाल एम्स (AIIMS) में निधन हो गया है। वे पिछले कई दिनों से गंभीर रूप से बीमार थे और वेंटिलेटर पर उनका इलाज चल रहा था। बेटे ने निधन की पुष्टि की है। भगवानदास रायकवार की तबीयत खराब होने पर उन्हें 17 मार्च को सागर के निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया था। यहां हालत में सुधार न होने पर उन्हें 7 अप्रैल को भोपाल एम्स लाया गया। एम्स में वे वेंटिलेटर पर थे और यहीं इलाज के दौरान उनका निधन हो गया। उनके बेटे राजकुमार रायकवार ने इसकी जानकारी दी। विधायक शैलेंद्र जैन समेत कई जनप्रतिनिधियों ने उनके निधन पर शोक व्यक्त किया है। अखाड़े के लिए 1998 में छोड़ दी थी बैंक की नौकरी भगवानदास रैकवार ने महज 16 साल की उम्र से अखाड़ा सीखना शुरू कर दिया था। वे सागर में एक सरकारी बैंक में नौकरी करते थे। अखाड़ा प्रशिक्षण के लिए उन्हें अक्सर कई राज्यों में जाना पड़ता था। बैंक की नौकरी के कारण वे अखाड़े को पूरा समय नहीं दे पा रहे थे। इसलिए समय की कमी को देखते हुए उन्होंने 1998 में बैंक से इस्तीफा दे दिया। इसके बाद उन्होंने अपना पूरा जीवन अखाड़ा कला को समर्पित कर दिया। जनवरी 2026 में मिला था पद्मश्री, बेटियों को सिखाए गुर इसी साल जनवरी 2026 में भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री पुरस्कार देने की घोषणा की थी। यह सम्मान उन्हें भारतीय पारंपरिक मार्शल आर्ट के संरक्षण, संवर्धन और प्रशिक्षण में अमूल्य योगदान के लिए दिया गया। भगवानदास रैकवार ने देशभर में घूमकर बेटियों को आत्मरक्षा का प्रशिक्षण दिया और उन्हें सशक्त बनाया। उन्होंने रूस, हिमाचल प्रदेश, हैदराबाद, जयपुर, लखनऊ, नागपुर और मुंबई सहित कई स्थानों पर प्रशिक्षण शिविर लगाए थे। ‘बंदिश’ शैली के थे उस्ताद, लट्ठ से बांध देते थे बेटे राजकुमार रैकवार ने बताया कि पिता के शिष्य पूरे देश में फैले हुए हैं। उन्होंने लोगों को बुंदेली शैली में शस्त्र युद्ध सिखाया। उनकी एक खास शैली ‘बंदिश’ थी। इस शैली के जरिए वे किसी भी व्यक्ति को लट्ठ से रस्सी या तार की तरह बांध देते थे। वह व्यक्ति तब तक नहीं छूट पाता था, जब तक वे खुद उसे न खोलें। जबरन कोशिश करने पर शरीर को नुकसान होता था। उन्होंने सीमित संसाधनों में जीवन भर बुंदेली मार्शल आर्ट को जीवित रखा।
