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मजदूर पिता की बेटी चांदनी बनीं एमपी टॉपर:500 में से 494 अंक हासिल किया, इंटरव्यू में बताई सफलता की कहानी

संघर्ष और जुनून जब साथ मिल जाएं, तो अभाव भी सफलता की राह नहीं रोक पाते। भोपाल की चांदनी विश्वकर्मा ने इस बात को सच कर दिखाया है। सीमित संसाधनों और आर्थिक तंगी के बावजूद चांदनी ने 12वीं बोर्ड परीक्षा में वाणिज्य संकाय में प्रदेश में टॉप कर इतिहास रच दिया। उन्होंने 500 में से 494 अंक हासिल कर न सिर्फ अपने परिवार बल्कि पूरे भोपाल का नाम रोशन किया है। मंत्रालय के सामने भीमनगर की रहने वाली चांदनी का जीवन संघर्षों से भरा रहा है। दो कमरों के छोटे से घर में रहने वाली चांदनी के पिता रामभुवन विश्वकर्मा मजदूरी करते हैं, जबकि उनकी मां बिमला स्कूल में मध्यान्ह भोजन का काम करने के साथ घरों में खाना बनाकर परिवार चलाती हैं। घर की आर्थिक स्थिति इतनी कमजोर थी कि पढ़ाई के लिए जरूरी सुविधाएं तक उपलब्ध नहीं थीं, न स्टडी टेबल था, न ही नेटवर्क की नियमित उपलब्धता। सवाल- जब आप तैयारी कर रही थीं, तो क्या लगा था कि ऐसा परिणाम आएगा? चांदनी: स्टार्टिंग से ही मैंने तय कर लिया था कि करना है। पहले दिन से ही मेहनत शुरू कर दी थी। एग्जाम के समय कुछ सवालों को लेकर थोड़ा डाउट था, लेकिन जब पूरा कैलकुलेशन किया तो भरोसा हो गया कि सब सही होगा। सवाल- तैयारी के दौरान आपको किसका सबसे ज्यादा सहयोग मिला? चांदनी: मुझे मेरे पेरेंट्स और टीचर्स का बहुत सपोर्ट मिला। जब मैं डिमोटिवेट होती थी, तो मम्मी मुझे पॉजिटिव रखती थीं और आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करती थीं। सवाल- आपकी दिनचर्या कैसी थी, खासकर जब स्कूल दूर था? चांदनी: मैं रोज ऑटो और बस से करीब 45 मिनट का सफर करके स्कूल जाती थी। फिर कोचिंग जाती थी और घर आकर पढ़ाई करती थी। जब घर पर कोई नहीं होता था, तब मैं ज्यादा फोकस के साथ पढ़ाई करती थी। सवाल- किताबों के लिए भी करना पड़ा संघर्ष? चांदनी: कई बार पैसों की कमी के कारण उन्हें किताबें खरीदने से पहले कई बार सोचना पड़ता था। ऐसे में वह दूसरों से किताबें लेकर पढ़ाई करती थीं, ताकि घर पर अतिरिक्त बोझ न पड़े।
“कई बार मन में आया कि पढ़ाई छोड़कर काम करने लगूं, लेकिन मैंने हिम्मत नहीं हारी और पढ़ाई जारी रखी।” सवाल- घर की परिस्थितियों ने पढ़ाई को कैसे प्रभावित किया? चांदनी: घर छोटा है, लेकिन मैंने उसी में रहकर सब मैनेज करना सीखा। मम्मी-पापा काम पर चले जाते थे, तो उस समय मैं अपनी पढ़ाई पर पूरा ध्यान देती थी। पढ़ाई के दौरान एक समय ऐसा भी आया जब उनके पिता के हाथ में चोट लग गई और घर की आर्थिक स्थिति और खराब हो गई। उस समय पढ़ाई छोड़ने का विचार आया, लेकिन परिवार और शिक्षकों के सहयोग से उन्होंने हार नहीं मानी। कोचिंग संचालकों ने भी फीस को लेकर सहयोग किया, जिससे उनकी पढ़ाई जारी रह सकी। सवाल- आगे का आपका लक्ष्य क्या है? चांदनी: मैं आगे चलकर लेफ्टिनेंट बनना चाहती हूं और देश की सेवा करना चाहती हूं। मां बोलीं- आर्थिक दिक्कतों का पता नहीं चलने दिया चांदनी की मां बिमला ने कहा कि सैलरी कम होने के कारण कई बार आर्थिक दिक्कतें आईं, लेकिन हमने कभी चांदनी को इसका एहसास नहीं होने दिया। हम दोनों मिलकर सब मैनेज करते थे ताकि उसकी पढ़ाई जारी रहे। आंखों में आंसू लेकर चांदनी की मां ने कहा, हम दोनों मिलकर सब मैनेज करते थे ताकि बेटी की पढ़ाई में कोई रुकावट न आए। आज उनकी मेहनत सफल हो गई है।
जब उनके पापा के हाथ में चोट लगी थी, तब लगा कि अब पढ़ाई मुश्किल हो जाएगी। लेकिन कोचिंग वालों ने भी सहयोग किया और हमने किसी तरह पढ़ाई जारी रखी। पिता ने कहा- खुश हूं कि बेटी ने कुछ बड़ा किया
चांदनी के पिता रामभुवन ने कहा कि मैं बहुत खुश हूं। इतनी परेशानी के बाद भी मेरी बेटी ने यह मुकाम हासिल किया। मेरा सपना था कि मेरी बेटी कुछ बड़ा करे और उसने वह कर दिखाया। मोहल्ले के लोगों ने हमेशा साथ दिया। किसी ने ताना नहीं मारा, सभी ने समर्थन किया।

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