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पूर्व राजदूत दीपक बोले- पाकिस्तान डोनाल्ड ट्रंप का पालतू:भोपाल में बोले- ईरान के साथ कोई खुलकर नहीं; खाड़ी देशों पर हमला उसकी बड़ी भूल

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की कार्यशैली, पाकिस्तान की तथाकथित मध्यस्थता और भारत की विदेश नीति को लेकर पूर्व राजदूत दीपक वोहरा ने तीखा और अलग नजरिया रखा। उनका कहना है कि आज अमेरिका पहले से ज्यादा आइसोलेटेड दिख रहा है। वहीं ईरान के साथ भी कोई देश खुलकर खड़ा नहीं है। खाड़ी देशों पर हमला करना ईरान की बड़ी रणनीतिक गलती रही। पाकिस्तान को उन्होंने “दमहीन” बताते हुए उसकी मध्यस्थता के दावे खारिज किए, जबकि भारत की रणनीति को “स्ट्रेटेजिक साइलेंस” और परिपक्व डिप्लोमेसी का उदाहरण बताया। बता दें कि दीपका वोहरा शौर्य गाथा और शौर्य अलंकरण कार्य्रकम में भाग लेने के लिए भोपाल पहुंचे हैं। अमेरिका आज पहले से ज्यादा आइसोलेटेड दीपक वोहरा ने कहा कि अमेरिका और ईरान के बीच चल रहे तनाव में दोनों पक्षों की बातों में विरोधाभास साफ नजर आता है। एक ओर ईरान कहता है कि उसे कोई नुकसान नहीं हुआ, वहीं दूसरी ओर 200 बिलियन डॉलर मुआवजे की मांग करता है। उनके मुताबिक “अगर नुकसान नहीं हुआ तो मुआवजा क्यों?” उन्होंने कहा कि अमेरिका आज पहले से ज्यादा आइसोलेटेड नजर आ रहा है, जबकि ईरान के साथ भी कोई देश खुलकर खड़ा नहीं है। खाड़ी देशों पर हमला करना ईरान की बड़ी रणनीतिक गलती रही। चाणक्य का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि युद्ध में उतरने से पहले अपनी और विरोधी की ताकत का आकलन जरूरी है, लेकिन ईरान यह जानते हुए भी भिड़ गया कि उसे नुकसान उठाना पड़ेगा। संयुक्त राष्ट्र को “बेकार की संस्था” गाजा पट्टी के हालात पर उन्होंने संयुक्त राष्ट्र को “बेकार की संस्था” बताया और कहा कि वहां भारी तबाही हुई है, जिसकी भरपाई में दशकों लगेंगे। उन्होंने कहा कि जंग में सबसे पहले सच्चाई मरती है और हर देश अपने हिसाब से प्रोपेगेंडा करता है। जो नुकसान हुआ है, उसे छिपाया जाता है और वही दिखाया जाता है जहां कुछ नहीं हुआ, उन्होंने कहा। ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर उन्होंने कहा कि यह दशकों की तैयारी का नतीजा है और उसका तर्क यह है कि नॉर्थ कोरिया पर हमला इसलिए नहीं होता क्योंकि उसके पास परमाणु हथियार हैं। हमास और हिज्बुल्ला स्कूल और अस्पतालों में रखते हैं हथियार उन्होंने कहा कि हमास और हिज्बुल्ला जैसे संगठन स्कूल और अस्पतालों में हथियार रखते हैं, जिससे युद्ध में निर्णय लेना बेहद कठिन हो जाता है। “अगर अस्पताल के नीचे हथियार हैं तो क्या करेंगे, यह सबसे कठिन सवाल है,” उन्होंने कहा। सीजफायर में पाकिस्तान की कोई भूमिका नहीं पाकिस्तान के सीजफायर कराने के दावे को खारिज करते हुए दीपक वोहरा ने कहा कि यह फैसला अमेरिका और ईरान के बीच हुआ, पाकिस्तान की इसमें कोई भूमिका नहीं थी। उन्होंने कहा कि “सीजफायर तब हुआ जब पिटाई हो रही थी।” 1971 के युद्ध का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि असली लीडरशिप वही होती है जब आप खुद तय करें कि कब युद्ध खत्म करना है। कारगिल का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि उस समय पाकिस्तान का नेतृत्व अमेरिका के पास मदद के लिए गया था। उन्होंने साफ कहा कि पाकिस्तान के पास ऐसी कोई क्षमता नहीं है कि वह बड़े देशों के बीच मध्यस्थता कर सके। भारत की डिप्लोमेसी: जवाब नहीं, संदेश ज्यादा ताकतवर
उन्होंने भारत की विदेश नीति को परिपक्व बताते हुए कहा कि हर बयान का जवाब देना जरूरी नहीं होता। “डिप्लोमेसी में जो नहीं कहते, वही ज्यादा महत्वपूर्ण होता है,” उन्होंने कहा। उनके मुताबिक भारत की रणनीति यह है कि बिना शोर किए सही समय पर सही कदम उठाया जाए।
ट्रंप की शैली और पाकिस्तान पर टिप्पणी: “पालतू जैसा व्यवहार” डोनाल्ड ट्रंप की कार्यशैली पर टिप्पणी करते हुए दीपक वोहरा ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में उनका रवैया आक्रामक और सीधा है। उन्होंने पाकिस्तान पर तीखा हमला करते हुए कहा कि अमेरिका उसे “पालतू” की तरह देखता है। अमेरिका कहता है कूदो, तो वो पूछता है कितनी ऊंचाई तक,” उन्होंने कहा। ईरान-इजराइल विवाद और भारत का रुख ईरान और इजराइल के बीच विवाद पर उन्होंने कहा कि ईरान खुद अपनी स्थिति कमजोर कर रहा है। अगर आप कहते हैं कि हिज्बुल्ला को मत छेड़ो, तो आप मान रहे हैं कि वो आपके लोग हैं, उन्होंने कहा। भारत की विदेश नीति पर उन्होंने स्पष्ट किया कि भारत मध्यस्थता में विश्वास नहीं करता। “दोनों लड़ रहे हैं, लड़ने दो, हमें क्यों बीच में पड़ना है,”। महाभारत-रामायण से विदेश नीति की सीख महाभारत और रामायण के उदाहरण देते हुए कहा कि सही और गलत का फैसला हमेशा आसान नहीं होता। भीष्म पितामह और जटायु के उदाहरण से उन्होंने बताया कि असली हीरो वही है जो सही समय पर सही निर्णय ले। बालाकोट के बाद भारत की नीति का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि अब भारत जरूरत पड़ने पर सख्त कदम उठाने से नहीं हिचकता। जंग की जीत का असली मतलब
दीपक वोहरा ने कहा कि युद्ध में जीत का मतलब तभी होता है जब विरोधी सरेंडर करे या उसकी जमीन पर कब्जा हो। 1971 के युद्ध का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि 90 हजार सैनिकों के समर्पण के कारण भारत जीता। उन्होंने स्पष्ट किया कि कोई जंग अपने देश के लिए मरकर नहीं, बल्कि दुश्मन को हराकर जीती जाती है। कारगिल युद्ध के संदर्भ में उन्होंने पाकिस्तान के फैसलों को रणनीतिक गलती बताया।
जाने दीपक वोहरा को
दीपक वोहरा भारत के वरिष्ठ कूटनीतिज्ञों में गिने जाते हैं, जिन्होंने भारतीय विदेश सेवा (IFS) में लंबा अनुभव हासिल किया है। वे कई देशों में भारत के राजदूत रह चुके हैं, जिनमें सूडान जैसे संवेदनशील देशों में उनकी अहम तैनाती रही। अंतरराष्ट्रीय संबंधों, युद्ध, कूटनीति और वैश्विक राजनीति पर उनकी गहरी पकड़ मानी जाती है। वोहरा अपनी बेबाक और स्पष्ट राय के लिए जाने जाते हैं, जिसमें वे जमीनी अनुभव के साथ जटिल वैश्विक मुद्दों को सरल भाषा में समझाते हैं। इसके अलावा वे शिक्षण और रणनीतिक मामलों से जुड़े संस्थानों में भी सक्रिय रहे हैं और विदेश नीति पर लगातार अपने विचार रखते रहे हैं।

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