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बोरवेल में भागीरथ की मौत: 22 घंटे, 8 नाकाम कोशिशें:मैन पावर में जीते, लेकिन ऑपरेशन ‘जुगाड़’ क्यों पड़ा भारी?

उज्जैन के बड़नगर के पास गांव झालरिया में 200 फीट गहरे बोरवेल में 2 साल का मासूम भागीरथ करीब 22 घंटे से फंसा रहा। अब तक 8 से ज्यादा कोशिशें हो चुकी हैं, लेकिन उसे बाहर नहीं निकाला जा सका। कलेक्टर, एसपी समेत एसडीआरएफ और एनडीआरएफ की टीमें गुरुवार रात से ही मौके पर डटी हैं। इमरजेंसी हालात में भरोसा जगाने वाली यही टीमें जब नाकाम दिखती हैं, तो सवाल और गहरे हो जाते हैं कि आखिर चूक कहां है? क्यों आधुनिक तकनीक के अभाव में ऑपरेशन ‘जुगाड़’ के भरोसे चलता रहा? भारी भरकम अमले के बाद भी बच्चे को सलामत अब तक बाहर क्यों नहीं निकाला जा सका? ऐसे ही कई और सवाल और उनके जवाब इस रिपोर्ट में… सवाल- 1: बोरवेल में से बच्चों को निकालने के तरीके क्या हैं? जवाब: सबसे ज्यादा दो तरीके प्रचलित हैं।
पहला- बोरवेल में रेस्क्यू रॉड: इसमें आगे की तरफ हूक लगा होता है, जिसे बोरवेल में नीचे उतारा जाता है। हूक बच्चे के कपड़ों में फंसाकर उसे ऊपर खींचने की कोशिश की जाती है। इसके अलग-अलग तरीके होते हैं। कभी सीधे खींचना, तो कभी साइड से रॉड डालकर उसे नीचे जाकर खोल देना, जो सीट की तरह बन जाती है। बच्चा उस पर टिक जाता है और उसे बाहर निकाला जाता है। दूसरा- समानांतर गड्ढा (पैरेलल पिट) तकनीक: बोरवेल के समानांतर एक गड्ढा खोदा जाता है। बच्चे की जिस गहराई पर स्थिति होती है, उससे करीब एक फीट नीचे तक खुदाई की जाती है। इसके बाद साइड से ड्रिलिंग कर बच्चे तक पहुंचा जाता है और सुरक्षित बाहर निकाला जाता है। चुनौती- सबसे बड़ी चुनौती समय की होती है। देरी बच्चे की जान पर भारी पड़ सकती है। अगर बोरवेल में पानी हो और बच्चा उस स्तर तक पहुंच जाए तो खतरा कई गुना बढ़ जाता है। ऐसे रेस्क्यू ऑपरेशन में तकनीकी चुनौतियों के साथ-साथ ‘जुगाड़ तकनीक’ भी कई बार समस्या को और गंभीर बना देती है। सवाल- 2: क्या बच्चे को निकालने में सही तकनीक अपनाई गई? जवाब: शुरुआत में नहीं। रात 9 बजे उज्जैन और इंदौर एसडीआरएफ ने रेस्क्यू रॉड और अंडरवाटर कैमरे से ऑपरेशन शुरू किया, लेकिन दोनों की क्षमता 50-55 फीट तक ही थी। तब बच्चा 35 फीट पर था, पर असफल प्रयासों में 70 फीट तक खिसक गया। उपकरण नाकाम रहे तो प्लास्टिक जॉइंट पाइप और प्राइवेट कैमरा मंगवाया गया। एसडीआरएफ कैमरे की क्वालिटी और पाइप दोनों कमजोर पड़े। जुगाड़ समय पर पहुंचे, पर उनसे बच्चे तक पहुंचना और उसे सुरक्षित बाहर निकालना बेहद चुनौतीपूर्ण साबित हुआ। सवाल- 3: क्या बच्चे को निकालने के बेहतर उपकरण नहीं थे? जवाब: बच्चे को बाहर खींचने के बेहतर उपकरण नहीं थे। कैमरे से पता चला कि उसके हाथ में कड़ा है, इसलिए हूक वाली रॉड डालकर कड़े में फंसाने की कोशिश की गई। हूक या तो फंसा नहीं या फंसकर निकल गया। कभी हुक का आकार बदला गया, कभी एक रॉड में कई हूक जोड़े गए, फिर भी सफलता नहीं मिली। बाद में बेहतर उपकरणों का इस्तेमाल किया गया। सवाल- 4: राॅड को बोरवेल में डालने के दौरान स्थिरता के लिए क्या किया? जवाब: रॉड को बोरवेल में डालते समय स्टेबिलिटी की कमी साफ दिखी। उज्जैन और इंदौर एसडीआरएफ ने रेस्क्यू शुरू तो किया, लेकिन न जमीन समतल की और न रॉड को स्थिर रखने के लिए स्टैंड लगाया। 8 इंच चौड़े बोरवेल में रॉड 70 फीट तक जाते-जाते अस्थिर हो गई। मुहाने पर जवान और ग्रामीण उसे संभालते रहे। बाद में हरदा एसडीआरएफ तीन पैरों वाला लोहे का स्टैंड लाई। इसे लगाने से पहले जमीन समतल की गई और लॉकिंग सिस्टम से रॉड को स्थिर रखा गया, जिससे बेहतर नियंत्रण मिला। सवाल- 5: रेस्क्यू टीम एक बार फेल हुई तो बैकअप प्लान क्या था? जवाब: शुरुआती रेस्क्यू ऑपरेशन में सबसे बड़ी कमी बेकअप प्लान की रही। शाम साढ़े चार बजे एसडीआरएफ और 5 बजे एनडीआरएफ ने काम शुरू किया, लेकिन पहले आठ घंटे तक सिर्फ एक ही रणनीति पर काम होता रहा-हूक के जरिए बच्चे को फंसाकर बाहर निकालने की कोशिश। जब यह तरीका बार-बार फेल हुआ, तब बैकअप प्लान की कमी साफ नजर आई। इसके उलट एसडीआरएफ हरदा और एनडीआरएफ भोपाल ने बाद में मल्टी-लेयर प्लानिंग अपनाई। सबसे पहले लोहे की रिंग को रस्सी से इस तरह बांधा गया कि खींचने पर वह बच्चे के हाथ में लॉक हो जाए। एक हाथ में सफलता मिलने के बाद रिस्क कम करने के लिए दूसरे हाथ को भी इसी तरह सुरक्षित किया गया। इसके साथ ही बैकअप के तौर पर सीटनुमा रॉड का विकल्प तैयार रखा गया, जो बच्चे के नीचे जाकर खुलती है। हालांकि 40-45 फीट तक लाने के बाद वजन बढ़ने से बच्चा अटक गया, लेकिन उसे वहीं स्टेबल कर आगे रिंग तकनीक से बाहर निकालने की कोशिश जारी रही। सवाल- 6: क्या एसडीआरएफ की टीम ऐसे मामलों के लिए ट्रेंड है? जवाब: ऐसी स्थिति से निपटने में स्थानीय एसडीआरएफ की तैयारी कमजोर नजर आई। उपकरण तो थे, लेकिन गहराई में रेस्क्यू के लिए कारगर नहीं रहे। जवान मेहनत कर रहे थे, पर स्पष्ट रणनीति और संसाधनों की समझ का अभाव दिखा। सवाल उठता है कि क्या बोरवेल रेस्क्यू की विशेष ट्रेनिंग दी गई है। एनडीआरएफ भोपाल और हरदा एसडीआरएफ बेहतर तैयारी के साथ पहुंचे, लेकिन देरी भारी पड़ी। हरदा के अधिकारी ने भी माना कि समय पर पहुंचते तो नतीजा बेहतर हो सकता था। सवाल- 7: क्यों प्राइवेट लोगों से मंगवाने पड़े इक्यूपमेंट? जवाब: एसडीआरएफ उज्जैन के पास पर्याप्त डेप्थ वाला कैमरा नहीं था। जो कैमरा था, उसमें स्टेबिलिटी की कमी रही और पानी के भीतर दृश्य धुंधले नजर आए। ऐसे में प्राइवेट एक्सपर्ट विजयसिंह सांखला को बुलाना पड़ा, जो बोरवेल में खराब मोटर निकालने के अनुभव के साथ बेहतर कैमरा इस्तेमाल करते हैं। शुरुआत में प्लास्टिक पाइप उपयोग में लिए गए, जो गहराई में अस्थिर साबित हुए। बाद में हरदा एसडीआरएफ लोहे के पतले पाइप और स्टैंड के साथ पहुंची, जिससे ऑपरेशन में मजबूती आई। सवाल- 8 : क्या कह रहे हैं जिम्मेदार अफसर? जवाब: एसडीआरएफ उज्जैन के कमांडेंट संतोष कुमार जाट ने बताया कि टीम मुस्तैदी से रेस्क्यू में जुटी है। एनडीआरएफ और हरदा एसडीआरएफ के आने से काम में तेजी आई है। कैमरे में विजिबिलिटी नहीं मिलने और रेस्क्यू रॉड की 50 फीट तक सीमित डेप्थ के कारण रणनीति बदली गई है। कलेक्टर रोशन कुमार सिंह के मुताबिक, बच्चा 40-45 फीट पर है और समानांतर खुदाई के साथ अन्य विकल्पों पर काम जारी है। एसपी प्रदीप शर्मा ने कहा कि एनडीआरएफ और एसडीआरएफ मिलकर कंबाइंड ऑपरेशन चला रहे हैं और जल्द बच्चे को सुरक्षित निकालने की उम्मीद है। ये खबर भी पढ़ें… बोरवेल में टूटी भागीरथ की सांसें;22 घंटे बाद निकला शव मध्य प्रदेश के उज्जैन जिले के बड़नगर में 2 साल के भागीरथ देवासी की 200 फीट गहरे बोरवेल में फंसने से मौत हो गई। करीब 22 घंटे के रेस्क्यू के बाद SDRF-NDRF टीम ने लोहे की छड़, रस्सी और मोटर निकालने वाली मशीन से शव बाहर निकाला। पढ़ें पूरी खबर…

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