रंगमंच से फिल्मों तक अपनी पहचान बनाने वाले शहर के वरिष्ठ कलाकार संजय मेहता इन दिनों फिल्म धुरंधर: द रिवेंज को लेकर चर्चा में हैं। फिल्म और समकालीन मुद्दों पर बातचीत के दौरान उन्होंने वैश्विक युद्ध, फिल्मों पर लगने वाले प्रोपेगेंडा के आरोप और सांस्कृतिक संस्थाओं की कार्यप्रणाली पर खुलकर अपनी राय रखी। मेहता ने कहा कि आज का दौर तकनीकी रूप से जितना विकसित है, उतना ही संवेदनशील भी है, ऐसे में युद्ध जैसी स्थितियां पूरी मानवता के लिए खतरा हैं। फिल्मों पर लगने वाले प्रोपेगेंडा के आरोपों पर उन्होंने कहा कि कई बार सच्चाई को भी प्रोपेगेंडा करार दे दिया जाता है। “जब हम सच्चाई दिखाने की कोशिश करते हैं तो लोग उसे प्रोपेगेंडा कह देते हैं। बहुत सी बातें ऐसी होती हैं जो पब्लिक डोमेन में नहीं होतीं, लेकिन जब वे सामने आती हैं तो लोगों को लगता है कि यह किसी एजेंडे के तहत किया जा रहा है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि कई मामलों में नए पहलू सामने आते हैं, जो पहले लोगों को पता नहीं होते। मीडिया से छूटे सवाल, फिल्मों ने उठाए मेहता ने कहा कि कई बार ऐसी जानकारियां पहले से मौजूद होती हैं, लेकिन वे आम जनता तक नहीं पहुंच पातीं। जांच एजेंसियों का काम हर चीज को सार्वजनिक करना नहीं होता, वे अदालत में केस पेश करती हैं। लेकिन मीडिया का काम है कि वह इन मुद्दों को सामने लाए। अगर कहीं यह नहीं हो पाता और कोई फिल्मकार उस जिम्मेदारी को निभाता है, तो उसे सीधे प्रोपेगेंडा कहना सही नहीं है। फिल्म और रंगमंच दोनों में सक्रिय, नए प्रोजेक्ट पर काम जारी मेहता ने बताया कि धुरंधर: द रिवेंज के बाद वह एक नई फिल्म की तैयारी में हैं, जिसकी शूटिंग मई के आसपास राजस्थान में हो सकती है। अभी फिल्म का टाइटल सामने नहीं आया है, लेकिन काम जारी है। इसके अलावा मेरा एक बच्चों का नाटक ‘पेड़ की कथा’ प्रकाशित हो चुका है, जिसका जल्द विमोचन किया जाएगा। कूल-ऑफ फैसलों में पारदर्शिता जरूरी सांस्कृतिक संस्थाओं में चल रहे विवादों पर मेहता ने नाराजगी जताते हुए कहा कि अगर किसी संस्था या कलाकार को ‘कूल-ऑफ’ में डालना है, तो इसकी पहले से जानकारी दी जानी चाहिए और प्रक्रिया पूरी तरह स्पष्ट होनी चाहिए। उनके मुताबिक अभी जो फैसले लिए जा रहे हैं, उनमें न पारदर्शिता है और न ही संवाद की गुंजाइश। उन्होंने कहा कि पहले इंटरव्यू होते थे, विशेषज्ञों की कमेटी बैठती थी और कलाकारों को अपना पक्ष रखने का मौका मिलता था, जिससे निर्णय संतुलित और स्पष्ट होते थे। उन्होंने कहा कि आज सबसे बड़ी चिंता संवाद का खत्म होना है। पहले आमने-सामने बातचीत होती थी, सवाल-जवाब होते थे और निर्णय समझ में आते थे, लेकिन अब बिना किसी बातचीत के सीधे रिजेक्ट या ‘कूल-ऑफ’ कर दिया जाता है, जो सही नहीं है। बता दें कि हाल ही में देश भर की नाट्य संस्थाओं को रजिट्रेशन और अनुदान को को लेकर कई संस्थाओं को अनुदान लिस्ट से बाहर किया गया है। युद्ध में जीत किसी की नहीं, हार इंसानियत की होती है इन दिनों मिडिल ईस्ट में तनाव को लेकर संजय मेहता ने कहा कि किसी भी युद्ध में अंततः नुकसान इंसान का ही होता है। युद्ध कोई भी हो, उसमें मनुष्यता का नाश होता है। मरता इंसान ही है। बच्चे मरते हैं, युवा मरते हैं। हम आज चांद तक पहुंच गए हैं, एआई जैसी तकनीक हमारे पास है, लेकिन इसके बावजूद भी हमें युद्ध की जरूरत पड़ रही है तो यह हमारे पूरे विकास पर सवाल खड़ा करता है। उन्होंने कहा कि युद्ध के बाद होने वाली तबाही को भरने में वर्षों लग जाते हैं और अगर कभी परमाणु युद्ध की स्थिति बनी तो उसके परिणामों की कल्पना भी संभव नहीं है। अहंकार की लड़ाई, जो सिर्फ विनाश की ओर ले जाती है युद्ध की वजहों पर मेहता ने साफ कहा कि इसकी जड़ में अहंकार है। “यह कहीं न कहीं अहंकार की लड़ाई है और अहंकार कभी जीतता नहीं है। वह हमेशा विनाश की ओर ले जाता है। इसलिए लोगों को इस पर गंभीरता से सोचने की जरूरत है। धुरंधर में अब्दुल भुट्टावी का कैरेक्टर फिल्म में अपने कैरेक्टर के बारे में सजय ने बताया इसमें जो कैरेक्टर मैं कर रहा हूं, वो अब्दुल भुट्टावी का कैरेक्टर है। 26/11 में जो मुंबई में ताज होटल और दूसरी जगहों पर हमले हुए थे, उनमें जो जिम्मेदार आदमी था, वह अब्दुल भुट्टावी था। फिल्म बहुत सारी चीजों को रिवील करती है। खासतौर पर पार्लियामेंट अटैक, 26/11 और उसके अलावा पाकिस्तान किस तरह से हिंदुस्तान के खिलाफ साजिशें करता है, उनके आतंकवादी संगठन कैसे काम करते हैं, उनकी प्लानिंग किस तरह की होती है, पैसा कहां से आता है और हथियार कहां से आते हैं, इन सब बातों को यह फिल्म सामने लाती है। एक तरह से इसे जासूसी फिल्म भी कह सकते हैं, क्योंकि रणवीर सिंह का जो कैरेक्टर है, वह भारत का जासूस है और पाकिस्तान में घुसा हुआ है।
