भोपाल में टीईटी अनिवार्यता के आदेश के खिलाफ शिक्षकों का गुस्सा खुलकर सामने आया है। उनका कहना है कि 20 से 25 साल की सेवा देने के बाद उनसे दोबारा परीक्षा देने को कहना उनके अनुभव और सम्मान पर सवाल उठाने जैसा है। प्रदर्शन के दौरान कई शिक्षकों ने अपनी नाराजगी खुलकर जताई और सरकार से इस आदेश को तुरंत निरस्त करने की मांग की। आंदोलन अब और तेज होने के संकेत भी दिए हैं। प्रदर्शन कर रहीं शिक्षिका शीबा खान ने कहा कि सरकार का यह फैसला पूरी तरह से अव्यवहारिक है। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या किसी 26 साल के अनुभवी कलेक्टर से दोबारा परीक्षा देने को कहा जाएगा? इस आदेश से हजारों शिक्षकों की नौकरी पर खतरा मंडरा रहा है। यह फैसला एक तरह की तानाशाही शिक्षिका प्रियंका शर्मा ने भी इस फैसले पर कड़ी आपत्ति जताई। उन्होंने कहा कि नियुक्ति के समय जो नियम लागू थे, उनका पूरी तरह पालन किया था। अब नए नियमों को पुराने शिक्षकों पर लागू करना गलत है। उन्होंने कहा कि जिन शिक्षकों की रिटायरमेंट में कुछ ही साल बचे हैं। जल्द निर्णय नहीं लिया तो उग्र आंदोलन होगा प्रदर्शन में शामिल शिक्षिका संगीता कुशवाहा ने सरकार से इस पूरे मामले में पुनर्विचार की मांग की। उन्होंने कहा कि सरकार को सुप्रीम कोर्ट में रिव्यू पिटीशन दाखिल करनी चाहिए। 18 अप्रैल को परिवार सहित प्रदर्शन करेंगे अध्यापक-शिक्षक संयुक्त मोर्चा के पदाधिकारी उपेंद्र कौशल ने बताया कि 8 अप्रैल को हुए जिला स्तरीय प्रदर्शन के बाद DPI भोपाल के संचालक केके द्विवेदी को ज्ञापन सौंप दिया गया है और फिलहाल आंदोलन समाप्त कर दिया है। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि 11 अप्रैल तक मध्य प्रदेश सरकार टीईटी परीक्षा को लेकर सुप्रीम कोर्ट में रिव्यू पिटीशन दाखिल नहीं करती है, तो दोबारा आंदोलन शुरू किया जाएगा। उन्होंने आगे कहा कि यदि 8 और 11 अप्रैल के मौके निकल जाने के बाद भी मांगें नहीं मानी गईं, तो 18 अप्रैल को प्रदेशभर के शिक्षक भोपाल में एकत्र होकर परिवार सहित प्रदर्शन करेंगे। इसके बाद जब तक मांगें पूरी नहीं होंगी, तब तक शिक्षक राजधानी में डटे रहेंगे। प्रदर्शन के दौरान शिक्षकों ने नाराजगी जताते हुए कहा कि जिस तरह उनकी योग्यता की जांच के नाम पर दोबारा परीक्षा कराई जा रही है, उसी तरह हर कलेक्टर और प्रशासनिक अधिकारी के लिए भी हर 5 साल में यूपीएससी जैसी परीक्षा अनिवार्य की जानी चाहिए। DPI भोपाल ने जारी किया था यह आदेश हाल ही में लोक शिक्षण संचालनालय (DPI) भोपाल द्वारा जारी आदेश के अनुसार, जिन शिक्षकों की सेवानिवृत्ति में पांच वर्ष से अधिक समय बचा है, उन्हें अनिवार्य रूप से टीईटी परीक्षा पास करनी होगी। आदेश में स्पष्ट किया है कि संबंधित शिक्षकों को दो वर्ष के भीतर परीक्षा उत्तीर्ण करनी होगी, अन्यथा उनकी सेवा समाप्त की जा सकती है। स्कूल शिक्षा विभाग का कहना है कि यह निर्णय सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के आधार पर लिया है, लेकिन इस आदेश से शिक्षकों में व्यापक असंतोष देखने को मिल रहा है। शिक्षकों का तर्क- पुराने नियमों पर नई शर्त गलत शिक्षक संगठनों का कहना है कि आरटीई एक्ट 2009 में लागू हुआ और टीईटी 2011 से अनिवार्य किया गया, जबकि हजारों शिक्षक इससे पहले नियुक्त हो चुके थे। ऐसे में अब उन पर टीईटी लागू करना गलत है। शिक्षकों का आरोप है कि यह “रेट्रोस्पेक्टिव” निर्णय है, यानी पुराने मामलों पर नए नियम लागू किए जा रहे हैं, जो न केवल अन्यायपूर्ण है बल्कि कानूनी रूप से भी कमजोर है। 1.5 लाख शिक्षक प्रभावित, 70 हजार सीधे दायरे में शिक्षक संगठनों के अनुसार इस आदेश से प्रदेश के करीब 1.5 लाख शिक्षक प्रभावित हो सकते हैं। इनमें लगभग 70 हजार शिक्षक ऐसे हैं, जिनकी नियुक्ति 2011 से पहले हुई थी। इन शिक्षकों का कहना है कि उनकी नियुक्ति के समय टीईटी की कोई अनिवार्यता नहीं थी, ऐसे में अब इस आधार पर उनकी योग्यता तय करना और नौकरी पर संकट खड़ा करना अनुचित है। संयुक्त लड़ाई की तैयारी उपेंद्र कौशल ने बताया कि 29 मार्च को सभी शिक्षक संगठनों की संयुक्त बैठक बुलाई गई थी, जिसमें एकजुट होकर आगे की रणनीति बनाने का निर्णय लिया गया। इस बैठक में टीईटी के अलावा “शिक्षक एप से अटेंडेंस” और “सेवा वृद्धि” जैसे मुद्दे भी उठाए गए। संगठनों ने स्पष्ट किया है कि अब सभी शिक्षक एक मंच पर आकर अपनी लड़ाई लड़ेंगे और जरूरत पड़ने पर आंदोलन को और तेज किया जाएगा। बैठक में शासकीय शिक्षक संगठन, प्रांतीय शिक्षक संघ, राज्य शिक्षक संघ, आजाद अध्यापक शिक्षक संघ और गुरूजी अध्यापक शिक्षक संघ के जिलाध्यक्षों सहित कई शिक्षक नेता मौजूद रहे। इनमें राकेश पटेल, उपेंद्र कौशल, राकेश पाण्डेय, गिरीश द्विवेदी, दर्शन ओढ़, जितेंद्र शाक्य, राजेश साहू, नीलेश आर्य, द्वारका पटेल, राजेंद्र गुप्ता, नितेश नागर, आनंद वाणी और महिला प्रतिनिधि शामिल थीं। 11 अप्रैल को ब्लॉक स्तर पर आंदोलन 11 अप्रैल को ब्लॉक स्तर पर आंदोलन करते हुए सभी स्थानीय विधायक, मंत्री और सांसदों को ज्ञापन दिए जाएंगे। इस दौरान टीईटी आदेश को निरस्त करने और शिक्षकों के हितों की रक्षा के लिए सरकार से सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका दाखिल करने की मांग प्रमुख रहेगी।
