परंपरागत फसलों के बीच जब कोई किसान नई राह चुनता है तो खेती का गणित बदल जाता है। मंदसौर जिले के कुचड़ौद क्षेत्र के प्रगतिशील किसान बनवारी वैष्णव ने औषधीय फसलों की खेती अपनाकर यही कर दिखाया। करीब 5 बीघा जमीन में केमोमाइल (ग्रीन टी में उपयोगी फूल) और ईरानी अकरकरा जैसी फसलें लेकर वे कम लागत में बेहतर मुनाफा कमा रहे हैं। खास बात यह है कि ये फसलें न सिर्फ बाजार में मांग वाली हैं, बल्कि इन पर रोग भी कम लगते हैं, जिससे दवा का खर्च लगभग शून्य हो जाता है। ठंडे प्रदेशों का बीज मंगवाकर खेत को ही नया वातावरण दिया। लगातार दी जा रही हल्की सिंचाई से केमोमाइल और ईरानी अकरकरा का बेहतरीन उत्पादन होने लगा। डेढ़ क्विंटल सूखे फूल का उत्पादन किसान ने बताया कि उन्होंने केमोमाइल की खेती शिमला क्षेत्र से मंगाए बीज से शुरू की। डेढ़ बीघा में करीब 30 हजार रुपए लागत आई और लगभग डेढ़ क्विंटल सूखे फूल का उत्पादन मिला। बाजार में इसका भाव 600 से 800 रुपए प्रति किलो तक रहता है। वहीं इसके अवशेष से 10 से 12 क्विंटल तक पाला (तेल हेतु कच्चा माल) भी निकलता है, जिससे अतिरिक्त आय होती है। यह फसल 4 से 5 महीने में तैयार हो जाती है और ठंडे मौसम में बेहतर उत्पादन देती है। एक बीघा में 20 हजार पौधे, लागत सीमित इसके साथ ही किसान ईरानी अकरकरा की खेती भी कर रहे हैं। एक बीघा में करीब 20 हजार पौधे लगते हैं, जिनकी लागत सीमित है। उत्पादन लगभग 3 क्विंटल तक मिलता है और भाव 700 से 1300 रुपए प्रति किलो तक रहता है। इस फसल में यूरिया का उपयोग नहीं किया जाता, जिससे गुणवत्ता बनी रहती है। सिंचाई भी जरूरत अनुसार ही करनी होती है। किसान खुद नर्सरी तैयार कर अन्य किसानों को एक रुपए प्रति पौधे के हिसाब से पौधे उपलब्ध करा रहे हैं। उनका मानना है कि गेहूं कटाई के बाद यह फसल किसानों के लिए बेहतर विकल्प बन सकती है। कम लागत, कम जोखिम और अधिक मुनाफा ही औषधीय खेती की सबसे बड़ी खासियत है। बनवारी एक प्रगतिशील किसान होने के साथ ही एक शिक्षक भी हैं। स्कूलों में पढ़ाने के अलावा जो किसान उनके खेत पर सीखने आते हैं वह उन्हें औषधिय फसलों की जानकारी भी देते हैं।
