मप्र में कटाई से पहले पेड़ों की न सिर्फ गलत तरीके से नाप हो रही है, बल्कि क्षतिपूर्ति पौधरोपण के नियमों में भी भारी विसंगति है। हैरानी की बात तो यह है कि पूरे प्रदेश में इसे लेकर किसी एक नियम का पालन नहीं किया जा रहा है। हर शहर, हर नगर निगम ने अपने हिसाब से क्षतिपूर्ति पौधरोपण के नियम बना रखे हैं। गौरतलब है कि मप्र में शहरी पेड़ों की सुरक्षा के लिए लागू मप्र वृक्षों का परिरक्षण (नगरीय क्षेत्र) अधिनियम, 2001 के तहत ग्राउंड लेवल पर करीब 30 सेंटीमीटर व्यास वाले वृक्ष को पेड़ माना जाता है और उसी की क्षतिपूर्ति का प्रावधान है। लेकिन यह क्षतिपूर्ति किस तरह होगी, इसे लेकर स्पष्ट गाइडलाइन नहीं है। पांच बड़े शहरों भोपाल, इंदौर, ग्वालियर, जबलपुर और उज्जैन में अलग प्रक्रियाएं होने से शहरी हरियाली के संरक्षण पर सवाल खड़े हो रहे हैं।एक अनुमान के मुताबिक भोपाल में ही हरियाली घटते-घटते करीब 10% के आसपास रह गई है। इंदौर, ग्वालियर, जबलपुर, उज्जैन में शहर-स्तर के हरियाली के आंकड़े अव्यवस्थित हैं। पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि पूरे प्रदेश में क्षतिपूर्ति का वैज्ञानिक मानक और रोपण के बाद निगरानी की ठोस व्यवस्था लागू नहीं होगी, तब तक विकास के नाम पर पेड़ों की कटाई वैध बनती रहेगी। मौजूदा व्यवस्था में नियमों का यह बिखराव हरियाली के साथ संगठित खिलवाड़ को बढ़ावा दे रहा है। खामी यह भी: 2001 के एक्ट में क्षतिपूर्ति को लेकर स्पष्ट गाइडलाइन नहीं भोपाल: एक पेड़ के बदले 10 भोपाल में पहले डीबीएच (डायमीटर एट ब्रेस्ट हाइट) के आधार पर पेड़ तय होते थे और एक पेड़ के बदले चार पेड़ लगाने का नियम था। अब गोलाई को मोटाई मानने और 30 सेमी से कम पर क्षतिपूर्ति न होने जैसे बदलाव सामने आए हैं। एक पेड़ के बदले 10 पेड़ों के बराबर शुल्क करीब ₹14,500 तक लिया जा रहा है। बावजूद इसके शहर की हरियाली घटकर लगभग 10% के आसपास पहुंचने के अनुमान चिंता बढ़ा रहे हैं। उज्जैन लंबाई-मोटाई से शुल्क, न्यूनतम 500 रुपए उज्जैन में पेड़ की लंबाई और मोटाई के आधार पर शुल्क तय होता है, जो न्यूनतम करीब ₹500 से शुरू होता है। इसके साथ नर्सरी में 10 पौधे जमा कराने की शर्त लागू बताई जाती है। शहर में हरियाली का अद्यतन नगर-स्तर डेटा उपलब्ध नहीं है, हालांकि पुराने अध्ययनों से संकेत मिलता है कि क्षेत्र में हरित आवरण सीमित हो रहा है। जबलपुर प्रति पेड़ 2000 रु. या नर्सरी में 20 पौधे जमा जबलपुर में कई मामलों में निरीक्षण के आधार पर पेड़ की मोटाई का अनुमान लगाया जाता है कि वह 30 सेमी के आसपास है या नहीं। क्षतिपूर्ति के तौर पर प्रति पेड़ लगभग ₹2000 जमा कराने और नर्सरी में करीब 20 पौधे जमा कराने की व्यवस्था बताई जाती है। लेकिन इसकी मॉनिटरिंग की कोई पुख्ता व्यवस्था दिखाई नहीं देती। ग्वालियर एक पेड़ के बदले 5 पेड़ लगाने का एफिडेविट ग्वालियर में जमीन से करीब एक फीट ऊपर पेड़ की गोलाई नापकर उसे पेड़ माना जाता है। क्षतिपूर्ति के लिए पांच पेड़ लगाने का एफिडेविट या करीब ₹500 रुपए प्रति पेड़ के हिसाब से 2500 रुपए जमा कराने का विकल्प दिया जाता है। विशेषज्ञों का कहना है कि इतनी कम राशि शहरी पेड़ों के वास्तविक पर्यावरणीय मूल्य को नहीं दर्शाती। इंदौर मोटाई के हिसाब से शुल्क न्यूनतम 13,500 रुपए इंदौर में वन विभाग की परिभाषा के अनुसार पेड़ तय होता है और क्षतिपूर्ति राशि उसकी मोटाई के हिसाब से लगती है। न्यूनतम शुल्क लगभग ₹13 हजार 500 बताया जाता है। यहां ट्रांसलोकेशन भी नियमों में शामिल है, जिसका अलग शुल्क है। शहर में हरित क्षेत्र पर दबाव बढ़ने की शिकायतें लगातार सामने आती रही हैं। भास्कर एक्सपर्ट – डॉ. सुदेश वाघमारे पेड़ों का एक समान वैज्ञानिक क्षतिपूर्ति मॉडल लागू करने की जरूरत आम आदमी को सुविधा के नाम पर शहर सरकार को ऐसे काम भी सौंप दिए गए, जिसके लिए उनके पास न तो विशेषज्ञ अफसर हैं और न स्टाफ। एक ही राज्य में अलग-अलग मानक होंगे तो पेड़ों की सुरक्षा कमजोर होगी। पेड़ों की एक समान परिभाषा, वैज्ञानिक क्षतिपूर्ति मॉडल, रोपण के बाद कम से कम पांच साल तक अनिवार्य निगरानी और शहर-स्तर पर सार्वजनिक ग्रीन-कवर डेटा सिस्टम लागू किया जाए,तभी शहरी विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बन सकेगा। -डॉ. सुदेश वाघमारे, वन एवं पर्यावरण के विशेषज्ञ
