शहर में मेट्रो, फ्लाईओवर्स, सड़कों सहित अन्य प्रोजेक्ट्स में धड़ल्ले से पेड़ काटे या ट्रांसप्लांट किए जा रहे हैं। हद यह है कि नगर निगम ने इस साल 405 पेड़ों को ट्रांसप्लांट करने की अनुमति दी लेकिन उसके पास यह रिकॉर्ड ही नहीं है कि वाकई में कितने ट्रांसप्लांट हुए और कितने जिंदा है। सारा काम अनुमान पर चल रहा है। यही वजह है कि इंदौर में हरियाली का प्रतिशत 14 से भी कम हो गया है। एक्सपर्ट बताते हैं कि एक कारण मध्य प्रदेश में पेड़ों के ट्रांसप्लांट को लेकर कोई नीति और एसओपी नहीं होना है। निगम ने वर्ष 2025-26 में 765 पेड़ हटाने की अनुमति दी है जिनमें 405 पेड़ ट्रांसप्लांट होंगे। बदले में 1340 पौधे लगाने की शर्त भी रखी गई है। शहर में इंदौर विकास प्राधिकरण और एनएचएआई भी पेड़ों का ट्रांसप्लांट कर रहे हैं। इनका डेटा भी निगम के पास नहीं है। उधर, वन विभाग ने भी 1631 पेड़ों की अनुमति जारी की है। इनमें 1521 पेड़ ट्रांसप्लांट होंगे। इस तरह कुल 1926 पेड़ों को ट्रांसप्लांट किया जा रहा है। निगम के पास ट्री ट्रांसप्लांट मशीन नहीं नीति पर काम कर रहे
हरियाली बचाने के लिए नीति बनाने पर काम शुरू कर दिया है। ट्री ट्रांसप्लांट मशीन के लिए हम पीपीपी मॉडल पर जा रहे हैं। जल्द ही टेंडर निकालेंगे।
– राजेंद्र राठौर, एमआईसी सदस्य सांवेर रोड पर सबसे ज्यादा 173 पेड़ प्रभावित सांवेर रोड पर 173 पेड़ प्रभावित हुए हैं। इनमें से 106 का ट्रांसप्लांट किया गया। एमआर-10 से एमआर-12 लिंक रोड में 111, निपानिया-रिंग रोड में 104, मालवीय नगर में 96 और जम-जम चौराहा रोड पर 91 पेड़ हटाए जा रहे हैं। हाई कोर्ट ने की थी सख्त टिप्पणी 20 नवंबर 2025 को मप्र हाईकोर्ट ने भोपाल में पेड़ों की कटाई-ट्रांसप्लांटेशन को लेकर संज्ञान लिया था। कोर्ट ने सुनवाई के दौरान कहा था कि बिना शाखाओं वाले तनों को कहीं और गाड़ देने से वे जीवित नहीं रह सकते। यह ‘ट्रांसप्लांटेशन’ नहीं, बल्कि सीधी कटाई है। भास्कर एक्सपर्ट – एके खराटे, सेवानिवृत्त संयुक्त वन मंडल अधिकारी पूरी प्रक्रिया में कम से कम 10 दिन लगते हैं पेड़ों का ट्रांसप्लांट कोई आसान प्रक्रिया नहीं है। इस प्रक्रिया में कम से कम 10 दिन लगते हैं। सबसे पहले जिस पेड़ का ट्रांसप्लांट करना है, उसके चारों ओर गोलाकार नाली बनाते हैं। खोदते समय इस बात का ध्यान रखना पड़ता है कि आसपास की बड़ी जड़ क्षतिग्रस्त न हो जाए। इसके बाद उस पर विशेष दवा और पानी का स्प्रे किया जाता है। यह एक तरह से मिट्टी की दीवार बन जाती है। जब पेड़ को निकालते हैं तो मिट्टी सहित उठाकर उसे ट्रांसप्लांट किया जाता है। पेड़ की डी-ब्रांचिंग होती है, यानी बड़े पेड़ को 10 फीट से ऊपर से काटते-छांटते हैं। इससे पेड़ का वजन कम हो जाता है। – डॉ. ओपी जोशी, पर्यावरणविद् शहर में 70-80 प्रतिशत ट्रांसप्लांट फेल पेड़ों के ट्रांसप्लांट में सही तकनीक और विशेषज्ञता जरूरी है। उचित तकनीक के अभाव में शहर में 70 से 80 फीसदी ट्रांसप्लांट फेल हुआ है। ट्रांसप्लांट के लिए जरूरी है कि यह एक्सपर्ट की मदद से किया जाए। इसके लिए वन विभाग की मदद ली जा सकती है।
