एमपी के टाइगर रिजर्व और वन्य जीव अभ्यारण्य में जाने वालों की शराबखोरी और वहां किए जाने वाले मांसाहार के हालातों पर कंट्रोल के लिए उत्तराखंड, महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश की फॉरेस्ट पॉलिसी लागू करने की मांग उठी है। इन राज्यों ने वन्य जीव और मानव संघर्ष रोकने के लिए राज्य सरकार से वन विश्राम गृहों, निरीक्षण बंगलों और अतिथि गृहों में शराब और मांसाहार प्रतिबंधित करने का निर्णय ले रखा है। जिसे एमपी में भी लागू करने के लिए कहा जा रहा है। इससे नैतिक वन्यजीव पर्यटन और संरक्षण में मध्य प्रदेश की स्थिति और मजबूत होने की बात कही गई है। संवेदनशील क्षेत्रों को “मनोरंजन स्थलों” के रूप में देखा जाता है वाइल्ड लाइफ एक्टिविस्ट अजय दुबे ने मुख्य सचिव अनुराग जैन, प्रमुख सचिव वन विभाग तथा पीसीसीएफ एंड हॉफ को लिखे पत्र में कहा है कि प्रदेश के विश्वप्रसिद्ध वन क्षेत्र के इको सिस्टम की पवित्रता और प्रशासनिक अनुशासन को बनाए रखने के लिए नीतिगत सुधार जरूरी है। दुबे ने लिखा है कि मध्य प्रदेश वन्यजीव संरक्षण में अग्रणी है, लेकिन वन विश्राम गृहों (एफआरएच) में शराब और मांसाहारी भोजन पर राज्यव्यापी एक समान प्रतिबंध नहीं है। इसके चलते अक्सर इन संवेदनशील क्षेत्रों को संरक्षण केंद्रों के बजाय “मनोरंजन स्थलों” के रूप में देखा जाता है। इन राज्यों का दिया उदाहरण आरटीआई एक्टिविस्ट दुबे ने सरकार को भेजे सुधार प्रस्ताव में कहा है कि कई राज्यों ने पहले ही यह स्वीकार कर लिया है कि ऐसे प्रतिबंध “वन की पवित्रता” के लिए आवश्यक हैं। एमपी के लिए यह क्यों जरूरी दुबे ने एमपी के लिए इसकी आवश्यकता बताते हुए कहा है कि इससे पारिस्थितिक प्रभाव, पर्यटन अनुशानस और क्षेत्र के कर्मचारियों का संरक्षण होगा। इसको लेकर दुबे ने तर्क भी दिए हैं। दुबे ने सीएस जैन, पीएस फॉरेस्ट संदीप यादव और वन बल प्रमुख से आग्रह किया है कि उत्तराखंड और महाराष्ट्र के मॉडल के समान एक औपचारिक अधिसूचना जारी करे, जिसमें संरक्षित क्षेत्रों के भीतर स्थित सभी वन विश्राम गृहों, निरीक्षण बंगलों और अतिथि गृहों में शराब और मांसाहारी भोजन के सेवन और परोसने पर प्रतिबंध लगाया जाए। यह कदम नैतिक वन्यजीव पर्यटन और संरक्षण में वैश्विक स्तर पर अग्रणी के रूप में मध्य प्रदेश की स्थिति को मजबूत करेगा। पारिस्थितिक प्रभाव बचा हुआ मांस और हड्डियों का कचरा मानव-आवासीय विश्राम गृहों की ओर सफाई करने वाले और मांसाहारी जानवरों को आकर्षित कर सकता है, जिससे मानव-पशु संघर्ष का खतरा बढ़ जाता है। पर्यटन अनुशासन शराब के सेवन से अक्सर देर रात शोर और अभद्र व्यवहार होता है, जो संरक्षित क्षेत्रों की शांति से संबंधित वन्यजीव संरक्षण अधिनियम के मानदंडों का सीधा उल्लंघन है। क्षेत्र कर्मचारियों का संरक्षण उत्तराखंड परिपत्र में उल्लेख किया गया है कि स्थानीय वन कर्मचारियों (गार्ड और चौकीदारों) पर अक्सर प्रभावशाली मेहमानों द्वारा इन निषिद्ध वस्तुओं को उपलब्ध कराने के लिए दबाव डाला जाता है। एक औपचारिक सरकारी आदेश कर्मचारियों को ऐसे दबाव से बचाता है।
