सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को कैंसर रोधी दवाओं पर 30% ट्रेड मार्जिन तय करने के केंद्र के जवाब को अपर्याप्त बताया। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने पूछा कि जब कैंसर दवाओं की कीमत सीमित की जा सकती है, तो दूसरी दवाओं की कीमत पर रोक क्यों नहीं लगाई जा सकती। केंद्र ने कहा कि इस फैसले से मरीजों को हर साल करीब 2,500 करोड़ रुपए की बचत होगी। कोर्ट ने दवाओं की कीमत तय करने के तरीके पर जानकारी देने के लिए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता को 27 अक्टूबर तक का समय दिया। बेंच ने कहा कि केंद्र का जवाब ‘खुश होने लायक नहीं’ है। कोर्ट ने कहा कि इसमें मरीजों के फायदे के लिए वास्तव में कुछ भी नहीं है। सुनवाई के दौरान बेंच ने बताया कि बाजार में एक सलाइन ड्रिप 270 रुपए में बेची जा रही है। इसकी असली कीमत 11 रुपए है। केंद्र की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता और एडिशनल सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी पेश हुए। तुषार मेहता ने कहा कि सरकार ने कैंसर दवाओं पर ट्रेड मार्जिन MRP का 30% तय करने का महत्वपूर्ण फैसला लिया है। उन्होंने कहा कि इससे मरीजों को सालाना करीब 2,500 करोड़ रुपए की बचत होने की उम्मीद है। जस्टिस नाथ ने कहा कि कोर्ट यह समझने में असमर्थ है कि अगर सरकार कैंसर दवाओं की कीमत सीमित कर सकती है, तो सभी दवाओं को इस व्यवस्था में क्यों नहीं ला सकती। बेंच ने कहा, “हम मानते हैं कि परिवहन, कच्चे माल, रिसर्च एंड डेवलपमेंट और दूसरी लागत होती हैं। लेकिन ये सभी MRP में शामिल होती हैं।” कोर्ट ने पूछा, “उन्हें असली लागत से 400 गुना ज्यादा कीमत पर बेचने की अनुमति देने का क्या तर्क है? आप ऐसा कैसे होने दे सकते हैं?” भाटी ने कहा कि भारत में दवाओं की कीमत दुनिया में सबसे कम है। उन्होंने कहा कि इसी वजह से इलाज के लिए बड़ी संख्या में लोग भारत आते हैं। जस्टिस मेहता ने कहा कि भारत में बने कार्डियक स्टेंट की कीमत करीब 5,000 रुपए है। अस्पताल इसे 25,000 रुपए से ज्यादा में बेचते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि सामान्य एंटीबायोटिक एजीथ्रोमाइसिन 70 रुपए से ज्यादा में बेची जाती है। इसकी असली कीमत करीब 28 रुपए है। तुषार मेहता ने कहा कि दवाओं की कीमत एक सीमा से ज्यादा नियंत्रित नहीं की जा सकती। उन्होंने कहा कि ज्यादा मार्जिन मिलने से दवाएं दूर-दराज के इलाकों तक पहुंचती हैं। जस्टिस मेहता ने कहा, “अगर DPCO से मंजूर दवाएं ग्राहकों तक नहीं पहुंचतीं, तो मरीजों तक उन्हें पहुंचाना सरकार की जिम्मेदारी है।” उन्होंने कहा, “असल विवाद यह है कि DPCO की नियंत्रित सूची में कौन-सी दवाएं होनी चाहिए और कौन-सी नहीं।” बेंच ने तुषार मेहता को दवाओं की कीमत सीमित करने की प्रक्रिया तैयार करने का समय दिया। कोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई 27 अक्टूबर को तय की। बेंच ने कहा, “हम सरकार को मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं। इसके अलावा कुछ नहीं। आपको जो करना है, 27 अक्टूबर तक करिए।” केंद्र ने हलफनामे में कीमत तय करने की व्यवस्था बताई केंद्र ने 551 पन्नों के विस्तृत हलफनामे में कहा कि नेशनल लिस्ट ऑफ एसेंशियल मेडिसिन्स (NLEM) स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय तैयार और प्रकाशित करता है। हलफनामे के मुताबिक, NLEM को 2011, 2015 और हाल में 2022 में प्रकाशित किया गया था। केंद्र ने कहा कि NLEM स्टैंडिंग नेशनल कमेटी ऑन मेडिसिन्स तैयार करती है। इसमें सभी संबंधित पक्ष और विशेषज्ञ शामिल होते हैं। कमेटी विश्व स्वास्थ्य संगठन की एसेंशियल मेडिसिन्स लिस्ट, नेशनल हेल्थ प्रोग्राम में इस्तेमाल होने वाली दवाओं, इंडियन फार्माकोपिया और नेशनल फॉर्म्युलरी पर विचार करती है। केंद्र के अनुसार, NLEM 2022 में 388 दवाएं और 900 से ज्यादा फॉर्म्युलेशन शामिल हैं। DPCO वाली दवाओं की कीमत कैसे तय होती है केंद्र ने बताया कि DPCO, 2013 की शेड्यूल-I में शामिल दवाओं की सीलिंग कीमत बाजार के आंकड़ों के आधार पर तय होती है। इसके लिए उन सभी ब्रांडेड और जेनेरिक दवाओं की कीमत का साधारण औसत लिया जाता है, जिनकी बाजार हिस्सेदारी कुल बाजार कारोबार में 1% या उससे ज्यादा होती है। यह बाजार हिस्सेदारी उस दवा के मूविंग एनुअल टर्नओवर के आधार पर तय की जाती है। साधारण औसत में 16% मार्जिन जोड़ा जाता है। केंद्र ने कहा कि इस तरह तय सीलिंग कीमत ही MRP बन जाती है। बाजार में दवा इससे ज्यादा कीमत पर नहीं बेची जा सकती। हालांकि, निर्माता इस सीलिंग कीमत के भीतर थोक विक्रेता और खुदरा विक्रेता को उचित मार्जिन दे सकता है। केंद्र ने बताया कि अब तक 935 फॉर्म्युलेशन की सीलिंग कीमत तय की जा चुकी है। नॉन-शेड्यूल्ड दवाओं पर केंद्र का जवाब केंद्र ने कहा कि नॉन-शेड्यूल्ड दवाओं की शुरुआती कीमत तय करने की आजादी निर्माता के पास होती है। निर्माता शुरुआती कीमत तय करते समय बाजार में मौजूद प्रतिस्पर्धा को ध्यान में रखता है। केंद्र ने कहा कि इस क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा के कारण आमतौर पर निर्माता मनमाने तरीके से कीमत तय नहीं कर सकता। केंद्र ने कहा कि NPPA सभी नॉन-शेड्यूल्ड फॉर्म्युलेशन की MRP पर नजर रखता है। इसका मकसद यह सुनिश्चित करना है कि कोई निर्माता किसी नॉन-शेड्यूल्ड दवा की MRP पिछले 12 महीनों में लागू MRP से 10% से ज्यादा न बढ़ाए। 29 सितंबर को भी कोर्ट ने जताई थी चिंता 29 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट ने अस्पतालों की ओर से कैंसर दवाओं पर दस गुना तक बढ़ाए गए मार्जिन पर चिंता जताई थी। कोर्ट ने इसे ‘कत्लेआम’ बताया था। कोर्ट ने सभी दवाओं पर एक समान 16% मार्जिन तय करने की बात कही थी। उसने अस्पतालों की ओर से मरीजों को अपने केमिस्ट से दवा खरीदने के लिए मजबूर करने के मामले पर भी केंद्र से ध्यान देने को कहा था। कोर्ट ने कहा था कि इस व्यवस्था का नुकसान आम आदमी को उठाना पड़ता है। सुप्रीम कोर्ट दवाओं की कीमत, जेनेरिक दवाओं की पर्ची और मेडिकल डिवाइस पर DPCO, 2013 के तहत नियंत्रण से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई कर रहा है।
