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बांझपन से जूझती महिलाओं में तनाव डेढ़ गुना ज्यादा:शोध में 16% कामकाजी लोग डिप्रेशन में, ऐसे व्यक्ति की वर्क कैपिसिटी हो सकती है 50% तक कम

नौकरी की डेडलाइन, करियर की चिंता, रिश्तों में तनाव और संतान की इच्छा पूरी न होने का दर्द… इन सबके बीच मानसिक स्वास्थ्य प्रभावित हो रहा है। बाहर से सामान्य दिखने वाले लोग भी भीतर ही भीतर भावनात्मक दबाव से जूझ रहे हैं। भोपाल के हमीदिया अस्पताल में मानसिक रोगों के इलाज के लिए पहुंचने वाले मरीजों की संख्या पांच साल में दोगुने से ज्यादा हो गई है। गांधी मेडिकल कॉलेज की एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. रुचि सोनी के मुताबिक, मानसिक स्वास्थ्य पर काम, रिश्तों और जीवन की परिस्थितियों का असर पड़ता है। इसलिए उपलब्धियों के साथ यह पूछना भी जरूरी है कि व्यक्ति भीतर से कैसा महसूस कर रहा है। वर्ल्ड मेंटल हेल्थ डे पर दैनिक भास्कर ने एक्सपर्ट से बात की। पड़ताल में चौंकाने वाले आंकड़े सामने आए। पढ़िए रिपोर्ट… रोगियों की संख्या दोगुने से ज्यादा प्रदेश के सबसे बड़े सरकारी अस्पतालों में शामिल हमीदिया अस्पताल में मानसिक रोग से पीड़ितों की संख्या लगातार बढ़ी है। अस्पताल के आंकड़ों के अनुसार, 2021 में 8,589 मरीज आए। 2022 में यह संख्या 13,104 हो गई। 2025 में आंकड़ा 18,003 तक पहुंच गया। एक्सपर्ट कहते हैं- अस्पताल में मरीजों की संख्या बढ़ने से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि समाज में मानसिक रोग उसी अनुपात में बढ़े हैं। इसके पीछे जागरूकता, इलाज की उपलब्धता और अस्पताल तक पहुंच जैसे कारण भी हो सकते हैं। ऑफिस की डेडलाइन से नौकरी की असुरक्षा तक का दबाव ऑफिस में समय पर टास्क पूरा करने का दबाव, लंबे काम के घंटे, वरिष्ठों की अपेक्षाएं, सहकर्मियों से मतभेद और नौकरी की असुरक्षा मानसिक तनाव बढ़ा सकते हैं। इससे नींद प्रभावित होती है, चिड़चिड़ापन बढ़ता है और एकाग्रता घट सकती है। भोपाल के पंडित खुशीलाल आयुर्वेद कॉलेज के एक शोध में नौकरी और व्यवसाय समेत सात पेशों से जुड़े 16% लोगों में अवसाद पाया गया। पुरुषों और महिलाओं में यह अनुपात समान था। शोध में साइंस-इंजीनियरिंग, हेल्थ, टीचिंग, व्यवसाय-प्रशासन, सूचना-संचार और कानूनी, सामाजिक एवं सांस्कृतिक पेशों के लोग शामिल थे। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की रिपोर्ट के अनुसार- तनाव से व्यक्ति की कार्यक्षमता 50% तक कम हो सकती है। खराब वर्किंग कल्चर का असर केवल कर्मचारी पर नहीं पड़ता, बल्कि इससे संस्थान के कामकाज और उत्पादकता पर भी प्रभाव पड़ सकता है। घर का तनाव ऑफिस और ऑफिस की टेंशन घर तक पहुंच रही डॉ. रुचि सोनी के मुताबिक, मानसिक स्वास्थ्य पर काम और निजी जीवन का असर अलग-अलग नहीं होता। घर में संवाद की कमी, आपसी मतभेद, भावनात्मक उपेक्षा, अविश्वास और अकेलापन व्यक्ति को भीतर से परेशान कर सकते हैं। दूसरी ओर, ऑफिस का दबाव घर लौटने के बाद भी खत्म नहीं होता। काम की चिंता परिवार के साथ बिताए जाने वाले समय और रिश्तों की गुणवत्ता को प्रभावित कर सकती है। विशेषज्ञों के मुताबिक, मानसिक परेशानी को कमजोरी समझना ठीक नहीं है। यदि तनाव लंबे समय तक बना रहे, रोजमर्रा के काम प्रभावित होने लगें या व्यक्ति की नींद, व्यवहार और भावनात्मक स्थिति में लगातार बदलाव आएं, तो मनोवैज्ञानिक या मनोचिकित्सक से सलाह लेना उपयोगी हो सकता है। बांझपन की समस्या तो महिलाओं में डेढ़ गुना अधिक स्ट्रेस प्रजनन एवं स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. प्रिया भावे चित्तावर के अनुसार, वर्ष 2022 में बीएमजे ओपन जर्नल में प्रकाशित ‘दुनियाभर में महिलाओं में बांझपन की व्यापकता, जोखिम कारक और मानसिक प्रभाव’ शीर्षक वाले शोध में 32 अध्ययनों और 1,24,556 महिलाओं के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया था। इसमें बांझपन से जूझ रही महिलाओं में मनोवैज्ञानिक तनाव अन्य महिलाओं की तुलना में 1.63 गुना पाई गईं। महिलाओं का तनाव स्कोर पुरुषों से भी ज्यादा डॉ. चित्तावर बताती हैं कि एक अन्य व्यवस्थित समीक्षा और मेटा-विश्लेषण में 53 अध्ययनों के कुल 21,355 लोगों के आंकड़ों की समीक्षा की गई। इसमें 12,913 पुरुष और 8,442 महिलाएं शामिल थीं। शोध में महिलाओं का औसत बांझपन-संबंधी तनाव स्कोर पुरुषों से अधिक पाया गया। महिलाओं में परिवार और समाज का दबाव, मां बनने की इच्छा, दूसरों के सवाल और यौन संबंधों को लेकर चिंता तनाव बढ़ाने वाले संभावित कारण हो सकते हैं। वहीं पुरुषों में पिता बनने की अपेक्षा, प्रजनन क्षमता को लेकर चिंता, पुरुषत्व या यौन प्रदर्शन से जुड़ी सामाजिक धारणाएं तनाव पैदा कर सकती हैं। हालांकि, ये अनुभव हर व्यक्ति में एक जैसे नहीं होते और शोध इन कारणों के योगदान का अलग-अलग प्रतिशत नहीं बताता। ये खबर भी पढ़ें…
मानसिक स्वास्थ्य की इमरजेंसी बन रही चुनौती वो बस तनाव में है, थोड़ा वक्त दो ठीक हो जाएगा। लेकिन, कई बार यही थोड़ा वक्त जिंदगी और मौत के बीच की दूरी बन जाता है। भोपाल की गांधी मेडिकल कॉलेज की मानसिक रोग विभाग की एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. रुचि सोनी कहती हैं कि मानसिक स्वास्थ्य संकट समय नहीं देखता। हमें ऐसी प्रणाली चाहिए जहां रात 2 बजे भी कोई मदद पा सके।पूरी खबर पढ़ें

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