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‘मां के साथ रहना है, पिता का प्यार भी चाहिए’:बैतूल में माता-पिता के विवाद के बीच कोर्ट पहुंचे दो मासूम, संरक्षण और पढ़ाई की सुरक्षा मांगी

एक तरफ पति-पत्नी के बीच चल रहा वैवाहिक विवाद और दूसरी तरफ उसी विवाद के बीच अपना बचपन लेकर खड़े दो बच्चे। बैतूल के आमला में 14 और 11 साल के दो बच्चों ने अपने पारिवारिक जीवन, पढ़ाई और भविष्य को लेकर न्यायालय का दरवाजा खटखटाया है। बच्चों की ओर से कहा गया है कि माता-पिता के बीच जो भी विवाद है, उसमें उनका कोई दोष नहीं है। बच्चों की ओर से अधिवक्ता शिवम उपाध्याय ने न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी, आमला के न्यायालय में आवेदन पेश किया है। इसमें बच्चों के पारिवारिक जीवन, पढ़ाई और भविष्य को ध्यान में रखते हुए उचित संरक्षण और आदेश की मांग की गई है। बच्चों की इच्छा- मां के साथ रहना चाहते हैं आवेदन में बच्चों की ओर से कहा गया है कि वे मां और पिता दोनों का प्यार चाहते हैं। उनकी इच्छा है कि मां उनके साथ रहें और उनके पारिवारिक जीवन में किसी तीसरे व्यक्ति का हस्तक्षेप न हो। बच्चों की ओर से यह भी कहा गया है कि माता-पिता के बीच चल रहे विवाद का असर उनकी पढ़ाई, मानसिक शांति और भविष्य पर नहीं पड़ना चाहिए। उनका कहना है कि विवाद चाहे माता-पिता के बीच हो, उसका खामियाजा उन्हें नहीं भुगतना चाहिए। लंबे समय से चल रहा है वैवाहिक विवाद न्यायालय में पेश दस्तावेजों के अनुसार, बच्चों के माता-पिता के बीच लंबे समय से वैवाहिक विवाद चल रहा है। इससे जुड़ी अलग-अलग न्यायिक कार्यवाहियां भी लंबित हैं। दस्तावेजों में वर्ष 2018 की पारिवारिक विवाद से संबंधित न्यायिक कार्यवाही का भी उल्लेख है। मामले में पिता की ओर से भी पत्नी के साथ रहने से संबंधित वैवाहिक कार्यवाही किए जाने का उल्लेख है। वहीं, बच्चों की ओर से अपने पारिवारिक जीवन को लेकर न्यायालय के समक्ष अपनी इच्छा रखी गई है। दोनों पक्षों की ओर से किए गए दावे और लगाए गए आरोप संबंधित न्यायालयों में विचाराधीन हैं। इन पर अंतिम निर्णय साक्ष्यों और न्यायिक प्रक्रिया के आधार पर होना है। कानून में बच्चे की राय पर भी विचार का प्रावधान मामले में अधिवक्ताओं की ओर से संरक्षक एवं प्रतिपाल्य अधिनियम, 1890 की धारा 17(3) का उल्लेख किया गया है। इसके तहत यदि नाबालिग अपनी इच्छा के संबंध में समझदारीपूर्ण राय बनाने की स्थिति में है, तो न्यायालय उसकी इच्छा पर विचार कर सकता है। हालांकि बच्चे की इच्छा अपने आप में अंतिम निर्णय नहीं होती। न्यायालय बच्चे के कल्याण, परिस्थितियों और अन्य संबंधित पहलुओं को ध्यान में रखकर फैसला करता है। 28 सितंबर के आदेश का भी दस्तावेज में उल्लेख दस्तावेज के अंतिम हिस्से में 28 सितंबर 2026 की तारीख दर्ज है। इसमें बच्चों के पारिवारिक जीवन, शिक्षा और हितों को ध्यान में रखते हुए न्यायालय से उचित संरक्षण और आदेश दिए जाने की मांग का उल्लेख है। इस पूरे मामले में बच्चों की ओर से रखी गई बात का केंद्र उनके माता-पिता के रिश्ते का फैसला नहीं, बल्कि उनका अपना जीवन है। वे मां के साथ रहना चाहते हैं, पिता का स्नेह भी चाहते हैं और ऐसा माहौल चाहते हैं, जिसमें उनकी पढ़ाई और बचपन प्रभावित न हो। माता-पिता के बीच चल रहे विवाद में बच्चों का पक्ष अब न्यायालय के सामने है। आगे न्यायालय दस्तावेजों, परिस्थितियों और बच्चों के हित को ध्यान में रखते हुए मामले पर निर्णय करेगा।

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