दोषी सौतेले पिता की फांसी अब उम्रकैद में बदली, सुप्रीम कोर्ट ने कहा- सामाजिक बंदिशों, डर और बेसहारा होने से शिकायत नहीं करना गवाही पर संदेह का आधार नहीं, धार के 8 साल पुराने केस में दोषसिद्धि बरकरार
6 साल की बेटी के साथ सौतेले पिता के बार-बार यौन उत्पीड़न और हत्या की मां एकमात्र प्रत्यक्षदर्शी थी, लेकिन वह महीनों तक किसी से कुछ नहीं बोली। फांसी की सजा पाए सौतेले पिता ने सुप्रीम कोर्ट में इसी चुप्पी को उसकी गवाही पर संदेह का आधार बनाया। कोर्ट ने यह दलील खारिज करते हुए कहा कि हिंसा झेल रही महिला की चुप्पी असामान्य नहीं है। भारतीय समाज में डर, सामाजिक बंदिशों और बेसहारा होने के कारण महिला का चुप रहना आम प्रतिक्रिया है। सिर्फ इस आधार पर उसकी गवाही पर संदेह नहीं किया जा सकता।मामला 2018 में मप्र के धार जिले के मनावर का है। धार जिला कोर्ट ने आरोपी को दोषी ठहराते हुए मौत की सजा सुनाई थी। इंदौर हाई कोर्ट ने 2019 में फैसला बरकरार रखा। इसके खिलाफ दोषी सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस विजय बिश्नोई की पीठ ने दोषसिद्धि बरकरार रखी, लेकिन मौत की सजा को बिना किसी छूट के शेष स्वाभाविक जीवन तक आजीवन कारावास में बदल दिया। कोर्ट ने कहा कि डर, सामाजिक बंदिशों और बेसहारा होने से पैदा हुई चुप्पी को झूठ का प्रमाण नहीं माना जा सकता। अपराधी जिस डर और दबाव से महिला को चुप रखता है, बाद में उसी चुप्पी को उसकी गवाही झूठी साबित करने के लिए इस्तेमाल नहीं कर सकता। पहला पति खो चुकी थी, आरोपी के घर में ‘बंदी’ जैसी स्थिति
बचाव पक्ष की दलील थी कि बच्ची की मां घटना की एकमात्र प्रत्यक्षदर्शी थी, फिर भी उसने महीनों तक न पुलिस को बताया और न परिवार से शिकायत की। इसलिए बाद में दी गई उसकी गवाही भरोसेमंद नहीं मानी जानी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने महिला की परिस्थितियों को अहम माना। वह अपना पहला पति खो चुकी थी और बेसहारा थी। कोर्ट के मुताबिक आरोपी के घर में उसकी स्थिति एक ‘बंदी’ जैसी थी। उस पर कड़ा नियंत्रण और बंदिशें थीं। पीठ ने कहा कि ऐसे माहौल में एक असहाय महिला के लिए घर का खुला दरवाजा भी आजादी का रास्ता नहीं होता। हिंसा झेलने वाली हर 4 में से 3 महिलाएं मदद नहीं मांग पातीं
सुप्रीम कोर्ट ने फैसले में राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस-5) के आंकड़ों का उल्लेख किया।
हर 100 विवाहित महिलाओं में करीब 29 ने हिंसा झेली…
18 से 49 साल की 29.3% विवाहित महिलाओं ने पति के हाथों शारीरिक या यौन हिंसा का सामना किया।
इन महिलाओं में करीब 75% ने न किसी से मदद मांगी न इसके बारे में किसी को बताया।
इसलिए किसी महिला की चुप्पी को उसकी गवाही पर संदेह का आधार नहीं बनाया जा सकता।
