मध्य प्रदेश में घर-घर साफ पानी पहुंचाने के लिए अमृत 2.0 योजना के तहत 622 वाटर ट्रीटमेंट प्लांट बनाए जा रहे हैं। दैनिक भास्कर के इन्वेस्टिगेशन में इन प्लांट्स में SCADA सिस्टम के लिए अप्रूव्ड ब्रांड की जगह सस्ते लोकल सेंसर और उपकरण लगाए जाने का मामला सामने आया है। SCADA (सुपरवाइजरी कंट्रोल एंड डाटा एक्वीजिशन) सिस्टम वाटर ट्रीटमेंट प्लांट में पानी की गुणवत्ता और सप्लाई की ऑटोमैटिक निगरानी करता है। नियमों के मुताबिक इसमें सरकार से अप्रूव्ड कंपनियों के उपकरण लगाए जाने हैं, लेकिन पड़ताल में कुछ प्लांट्स में लोकल उपकरण मिले। इन पर महंगी ब्रांडेड कंपनियों के स्टीकर भी लगाए गए थे। आरोप है कि कंसल्टेंट और इंजीनियर्स ने इन उपकरणों को पास किया। इससे सरकारी राशि के दुरुपयोग के साथ पेयजल की गुणवत्ता प्रभावित होने का जोखिम पैदा हुआ है। पढ़िए रिपोर्ट ऐसे सामने आया कथित ‘स्टीकर घोटाला’ नगरीय प्रशासन विभाग ने अमृत 2.0 के तहत प्रदेश में 622 जलप्रदाय प्रोजेक्ट मंजूर किए हैं। इनमें से 416 के टेंडर 2025 में जारी हुए। प्रत्येक प्रोजेक्ट की कुल लागत का करीब 5% SCADA सिस्टम पर खर्च होता है। क्षमता के अनुसार एक वाटर ट्रीटमेंट प्लांट में SCADA की लागत करीब ₹50 से 80 लाख होती है। ठेकेदारों ने सिविल और वाटर सप्लाई का काम शुरू किया, लेकिन SCADA लगाने के लिए विशेषज्ञ एजेंसी की जरूरत थी। इसी दौरान ‘आर्बिट’ के एजेंटों ने ठेकेदारों से संपर्क किया और बाजार दर से कम कीमत पर SCADA सिस्टम लगाने की पेशकश की।एक दर्जन से अधिक ठेकेदारों ने SCADA का काम आर्बिट को सौंप दिया। इसके बाद इन प्रोजेक्ट्स में लगाए गए उपकरणों की गुणवत्ता और ब्रांडिंग पर सवाल उठे। पड़ताल में कुछ जगह अप्रूव्ड ब्रांड की जगह लोकल उपकरण और उन पर दूसरे ब्रांड के स्टीकर लगे मिले। ब्रांडेड बनाम लोकल: कीमत में कितना अंतर पड़ताल में कुछ प्लांट्स में अप्रूव्ड ब्रांड की जगह कम कीमत वाले लोकल उपकरण और उन पर दूसरे ब्रांड के स्टीकर लगे मिले। एक्सपर्ट के मुताबिक, ₹100 करोड़ के प्रोजेक्ट में करीब ₹5 करोड़ का SCADA काम होता है। जर्मनी या स्विट्जरलैंड के इंडस्ट्रियल सेंसर की कीमत करीब ₹1 से 3 लाख होती है और एक प्रोजेक्ट में करीब 50 सेंसर लगाए जाते हैं। ऐसे में महंगे अप्रूव्ड सेंसर की जगह सस्ते उपकरण लगाने पर प्रति प्रोजेक्ट लागत में बड़ा अंतर आ सकता है। ग्राउंड रिपोर्ट: 7 जिलों के 10 प्लांट्स की पड़ताल दैनिक भास्कर की टीम ने 7 जिलों के 10 वाटर ट्रीटमेंट प्लांट्स की मौके पर पड़ताल की। इनमें से 3 प्लांट्स में उपकरणों और उनकी ब्रांडिंग को लेकर गड़बड़ी मिली। मौके पर क्या मिला: अप्रैल 2025 में शुरू हुआ काम अधूरा था और प्लांट बंद मिला। पाइप के फ्लो मीटर वॉल्व पर कोई ब्रांड नहीं था, जबकि नियमानुसार यह ‘SBEM’ का होना था। अंदर ‘Siemens’ की जगह ‘Holisys’ का PLC लगा मिला। प्लांट में पानी भी नहीं था। सब इंजीनियर का पक्ष: सुनील बघेल ने कहा कि जांच के लिए प्रोजेक्ट मॉनिटरिंग कंसल्टेंट (PDMC) नियुक्त हैं। काम अभी अधूरा है और अमानक उपकरण स्वीकार नहीं किए गए हैं। मौके पर क्या मिला: प्लांट का काम अधूरा था। जांच में ‘Siemens’ की जगह ‘Holisys’ का PLC और ‘SBEM’ की जगह लोकल कंपनी का प्रेशर ट्रांसमीटर लगा मिला। ठेकेदार का पक्ष: ओंकार प्रसाद बरया ने कहा कि PDMC निगरानी कर रही है और काम अभी पूरा नहीं हुआ है। मौके पर क्या मिला: प्रेशर ट्रांसमीटर पर ‘SBEM’ का स्टीकर लगा था। रिपोर्टर ने स्टीकर हटाया तो नीचे ‘ATC’ कंपनी का नाम मिला। PLC और pH-क्लोरीन सेंसर भी मानकों के अनुरूप नहीं मिले। ठेकेदार का पक्ष: उजास वीरानी ने कहा, “हमने SCADA के सेंसर लगाने का काम आर्बिट कंपनी को दिया था। उन्होंने जो गड़बड़ी की है, उसकी जानकारी अधिकारियों को दे दी है।” SBEM का जवाब: ‘हमने इस प्रोजेक्ट के लिए कोई उपकरण सप्लाई नहीं किया’ शहडोल की वीरानी इंजीनियरिंग को प्लांट में लगे सेंसरों की गुणवत्ता पर संदेह हुआ। कंपनी ने सेंसरों की फोटो और विवरण QAP में अप्रूव्ड कंपनी ‘SBEM’ को भेजे। जवाब में SBEM ने लिखित रूप से कहा, “हमने इस प्रोजेक्ट के लिए कोई उपकरण या तकनीक सप्लाई नहीं की है।” SBEM के इस जवाब के बाद प्लांट में लगे उसके नाम वाले स्टीकर की प्रामाणिकता पर सवाल खड़ा हुआ। रिपोर्ट के अनुसार, इस पत्राचार के बावजूद अधिकारियों की ओर से कार्रवाई नहीं की गई। ऑर्बिट कंपनी का तर्क- अच्छी गुणवत्ता के इक्वीपमेंट लगाए इस संबंध में ऑर्बिट कंपनी के मालिक विजय तिवारी से संपर्क किया गया। उन्होंने कहा कि अप्रूव्ड कंपनियां उपकरणों की आपूर्ति में देरी कर रही थीं। समय पर काम पूरा करने के लिए दूसरी कंपनियों के उपकरण लगाए गए। तिवारी ने दावा किया कि जिन कंपनियों के उपकरण लगाए गए हैं, उनके उत्पाद भी अच्छी गुणवत्ता के हैं। जब उनसे पूछा गया कि अप्रूव्ड ब्रांड की जगह दूसरे उपकरण लगाने के लिए अनुमति ली गई थी या नहीं, तो वे इसका कोई जवाब नहीं दे सके। SCADA क्या है और पेयजल की गुणवत्ता में इसकी क्या भूमिका है? जल निगम के रिटायर्ड PD आलोक जैन के मुताबिक, SCADA सिस्टम वाटर ट्रीटमेंट प्लांट की निगरानी व्यवस्था का प्रमुख हिस्सा है। इसके सेंसर 5 प्रमुख काम करते हैं। कानूनी विशेषज्ञ बोले- अमानक उपकरण पर कार्रवाई का प्रावधान रिपोर्ट के अनुसार, इसी कंपनी ने करीब दो साल पहले बैतूल में SCADA सिस्टम लगाया था। वहां मदरबोर्ड खराब होने और सेंसर काम नहीं करने की बात सामने आई है। अधिवक्ता आशुतोष महाजन के अनुसार, नगरीय प्रशासन और जल निगम के नियमों के तहत संबंधित सामग्री के लिए निर्धारित ISI और BIS मानकों का पालन जरूरी है। बिल और ब्लैकलिस्टिंग: अमानक उपकरण मिलने पर बिल रोकने या रिजेक्ट करने के साथ संबंधित फर्म को ब्लैकलिस्ट करने का प्रावधान बताया गया है। जुर्माना: परफॉर्मेंस बैंक गारंटी जब्त करने के साथ प्रोजेक्ट की कुल लागत का 5% जुर्माना लगाने का प्रावधान है। आपराधिक कार्रवाई: महाजन के अनुसार, यदि अमानक उपकरणों के कारण पानी की गुणवत्ता प्रभावित होती है और स्वास्थ्य को खतरा पैदा होता है, तो संबंधित कानूनों के तहत आपराधिक कार्रवाई की जा सकती है।
