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चिंतामन गणेश की भगवान राम ने की थी पूजा:7 करोड़ के आभूषण से खजराना में श्रृंगार, ये हैं MP के मंदिरों की मान्यताएं

गणेश चतुर्थी पर घरों से लेकर मंदिरों तक गणपति बप्पा विराज रहे हैं। 10 दिवसीय गणेश महोत्सव को लेकर मध्य प्रदेश के प्रमुख गणेश मंदिरों में विशेष श्रृंगार, आरती और भोग की तैयारियां हैं। श्रद्धालुओं के लिए दर्शन व्यवस्था भी बदली गई है। कहीं बैरिकेडिंग और अलग प्रवेश-निकास मार्ग बनाए गए हैं तो कहीं लाइन में लगकर दर्शन होंगे। इंदौर के खजराना गणेश में हीरे की आंखें हैं और भगवान को करीब 7 करोड़ रुपए के स्वर्ण आभूषण धारण कराए गए हैं। वहीं, बड़ा गणपति की 25 फीट ऊंची प्रतिमा है। सीहोर में मनोकामना के लिए उल्टा स्वास्तिक बनाने की मान्यता है। ग्वालियर में रिद्धि-सिद्धि के साथ गणेश जी एक ही पत्थर में विराजमान हैं, जबकि रतलाम में 11 फीट से अधिक ऊंची खड़ी प्रतिमा है। जबलपुर में घोड़े पर सवार गणेश के कल्कि स्वरूप के दर्शन होते हैं और नर्मदापुरम के बाचापानी में दाहिनी सूंड वाली प्रतिमा है। उज्जैन के चिंतामण गणेश में एक साथ तीन स्वरूपों के दर्शन होते हैं। मान्यता है कि वनवास के दौरान भगवान राम, लक्ष्मण और माता सीता यहां आए थे और भगवान गणेश का प्रथम पूजन किया था। अभिषेक के लिए जल उपलब्ध नहीं होने पर लक्ष्मण जी ने यहां बाण चलाया था, जिससे जमीन से जलधारा निकली। बाद में यहां बावड़ी बनी, जिसे बाणगंगा और लक्ष्मण बावड़ी के नाम से जाना जाता है। दैनिक भास्कर बता रहा है प्रदेश के प्रमुख गणेश मंदिरों में दर्शन-आरती का समय और उनसे जुड़ी खास मान्यताएं। पढ़िए… पूजन-दर्शन व्यवस्था : गणेश उत्सव के दौरान प्रतिदिन विशेष श्रृंगार होगा। सुबह-शाम विशेष आरती होगी। श्रद्धालु लाइन में लगकर दर्शन कर सकेंगे। मंदिर के बाहर बैरिकेड्स लगाए गए हैं। मंदिर की खासियत : गणेशोत्सव के दौरान यहां 10 दिवसीय मेला लगता है। सालभर हर बुधवार को MP समेत देशभर से बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। मान्यता है कि मंदिर के पीछे उल्टा स्वास्तिक बनाने से मनोकामना पूरी होती है। कामना पूरी होने पर यहां सीधा स्वास्तिक बनाना होता है। मंदिर का इतिहास : यह सिद्ध गणेश मंदिर है। मान्यता है कि सिद्ध गणेश मंदिर होने के कारण शहर को सिद्धपुर कहा जाने लगा था। धीरे-धीरे इसका नाम सिद्धपुर से सीहोर हो गया। पूजन-दर्शन व्यवस्था: सुबह 4 बजे मंदिर के पट खुलते हैं। मंगल आरती के बाद पंचामृत अभिषेक और विशेष श्रृंगार किया जाता है। सुबह 7 बजे श्रृंगार आरती के बाद श्रद्धालुओं के लिए दर्शन शुरू होते हैं। रात करीब 9 बजे शयन आरती होती है। मंदिर की खासियत: एक ही पाषाण पर चिंतामण गणेश, इच्छामन गणेश और सिद्धिविनायक के तीन स्वरूप विराजित हैं। मान्यता है कि मनोकामना के लिए यहां उल्टा स्वास्तिक बनाया जाता है और मनोकामना पूरी होने पर सीधा स्वास्तिक बनाने की परंपरा है। लक्ष्मण बावड़ी के पास स्थित दक्षिणमुखी गणेश मंदिर में बच्चों को मोबाइल और ऑनलाइन गेम की आदत से दूर करने के लिए विशेष संकल्प दिलाया जाता है मंदिर का इतिहास: मंदिर से जुड़ी मान्यता त्रेता युग से है। भगवान राम, लक्ष्मण और माता सीता ने यहां भगवान गणेश का प्रथम पूजन किया था। मंदिर का वर्तमान स्वरूप करीब 250 वर्ष पुराना माना जाता है। देवी अहिल्याबाई होलकर के समय मंदिर का जीर्णोद्धार हुआ था। पूजन-दर्शन व्यवस्था : गणेश चतुर्थी पर चांदी के वर्क से श्रृंगार (चौला) किया जाएगा। 3 दिन बाद चोला बदला जाएगा। इसके बाद प्रतिदिन नया श्रृंगार होगा। 10 दिन तक हजारों श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचेंगे। गणेश चतुर्थी पर सुबह 6.30 बजे मंगला आरती, दोपहर 12 बजे जन्मोत्सव की महाआरती और शाम 7 बजे महाआरती होगी। मंदिर की खासियत : यहां सवा 11 फीट ऊंची गणेश जी की खड़ी मूर्ति है। मंदिर संचालन समिति का दावा है कि पूरे भारत में खड़े गणेश जी की ऐसी एकमात्र मूर्ति रतलाम में है। मान्यता है कि यहां मांगी गई मनोकामना पूरी होती है। मंदिर परिसर में श्रीराम दरबार, भोलेनाथ और हनुमान जी के मंदिर भी हैं। मंदिर का इतिहास : करीब 370 साल पहले यहां प्रतिमा स्थापित की गई थी। जोधपुर से आकर राजा रतनसिंह ने रतलाम राज्य की स्थापना की थी। उन्होंने कसारा समाज को मंदिर की देखभाल की जिम्मेदारी सौंपी थी। तब से आज तक रतलाम के कसारा समाजजन मंदिर की देखरेख करते हैं। मंदिर के सामने पानी के 3 कुंड हैं। मान्यता है कि कुंड खोदने पर पानी उकलता हुआ निकला था, इसलिए इस क्षेत्र का नाम ऊंकाला रखा गया। पूजन-दर्शन व्यवस्था : सभी भक्त सामान्य रूप से गर्भगृह में दर्शन कर सकेंगे। कम से कम समय में दर्शन कराने की व्यवस्था रहेगी। महिला-पुरुषों के लिए अलग-अलग लाइन होगी। भगवान को राजस्थान से आए मोटी बूंदी के लड्डुओं का ही भोग लगाया जाता है। मंदिर की खासियत : यहां गणेश जी पद्मासन में विराजमान हैं। प्रतिमा बहुत ही दुर्लभ है। पूरे भारत में यहीं गणेश जी के साथ रिद्धि-सिद्धि की प्रतिमाएं हैं। तीनों प्रतिमाएं एक ही पत्थर से बनी हैं। इनके पीछे दो मोर भी बने हैं। मान्यता है कि यहां 7 या 11 बुधवार पूजा करने से मनोकामना पूरी होती है। मंदिर का इतिहास : फूलबाग गुरुद्वारा के सामने विराजमान गणेश जी की प्रतिमा 350 साल पुरानी है। वर्षों से यहां एक मोटे पत्थर की पूजा होती थी। 1980 में अचानक पत्थर ने चोला छोड़ दिया। इसके बाद गणेश जी की प्रतिमा अस्तित्व में आई।
पूजन-दर्शन व्यवस्था: गणेश उत्सव के दौरान प्रतिदिन विशेष श्रृंगार होगा। सुबह-शाम विशेष आरती होगी। मंदिर की खासियत: यहां गणेश जी की दो प्रतिमाएं हैं। एक में गणेश जी रिद्धि-सिद्धि के साथ विराजमान हैं, जबकि दूसरी प्राचीन प्रतिमा है, जिस पर सिंदूर चढ़ाया जाता है। मंदिर के द्वार पर हनुमान जी भी विराजमान हैं। गणेशोत्सव के दौरान यहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। मंदिर का इतिहास: मंदिर करीब 60 साल पुराना है। मान्यता है कि यहां विराजित गजानंद भगवान की प्राचीन प्रतिमा जमीन से निकली थी। इसके बाद 1996 में मंदिर निर्माण का काम शुरू हुआ। यहां सभी सिद्ध कार्य होने की मान्यता है। पूजन-दर्शन व्यवस्था : प्रतिदिन सुबह अभिषेक, शाम को भजन-कीर्तन, वस्त्र व फूल-माला अर्पण, प्रसादी भोग और आरती होगी। मंदिर की खासियत : विराजमान भगवान की शिला को कल्कि स्वरूप माना जाता है। भगवान श्रीगणेश घोड़े पर सवार हैं। इनके केवल ऊपरी हिस्से के दर्शन होते हैं, जबकि शेष भाग धरती के अंदर है। मान्यता है कि यहां लगातार 40 दिन दर्शन-पूजन करने से मनवांछित फल की प्राप्ति होती है। भगवान को हर 3 माह में 25 किलो सिंदूर चढ़ाया जाता है। उन्हें 32 मीटर की माला और 32 मीटर का वस्त्र पहनाया जाता है। मंदिर का इतिहास : मंदिर की संस्थापक सुधा अविनाश राजे को भगवान ने सपने में दर्शन दिए। बार-बार दर्शन देकर भगवान ने उन्हें गणेश जी की स्थापना और पूजा का आदेश दिया। सपने में बताए मार्ग से वे यहां पहुंचीं। 4 सितंबर 1989 को भक्तों ने गीत-सिंदूर लगाकर भगवान का पूजन किया। तब से यह सिलसिला लगातार जारी है। पूजन-दर्शन व्यवस्था: लिंक रोड गणेशपुरी से एंट्री और खजराना मेन रोड से एग्जिट रहेगा। जिगजैग रेलिंग में 5 हजार से ज्यादा श्रद्धालु खड़े हो सकेंगे। दर्शन 15 से 20 मिनट में होंगे। एक बार में करीब 500 श्रद्धालु दर्शन कर सकेंगे और भगवान के सामने 1 से 2 मिनट रुक सकेंगे। सवा लाख मोदक का भोग अर्पित होगा। मंदिर की खासियत: मंदिर के गर्भगृह का गेट चौड़ा किया गया है। गर्भगृह के सामने सभामंडप नीचे होने से पीछे खड़े भक्तों को भी भगवान के आसानी से दर्शन होंगे। भगवान को 7 करोड़ रुपए के स्वर्ण आभूषण धारण कराए जाएंगे। हीरे के नेत्र भी धारण कराए जाएंगे। मंदिर का इतिहास: औरंगजेब से सुरक्षा के लिए मूर्ति को कुएं में छिपाया गया था। 1735 में इसे बाहर निकाला गया और देवी अहिल्याबाई होलकर ने मंदिर का जीर्णोद्धार कराया। मंदिर में आज भी कई विकास कार्य किए जा रहे हैं। पूजन-दर्शन व्यवस्था: मंदिर के छोटे गेट से भक्तों की एंट्री और बड़े गेट से एग्जिट होगा। भगवान को 101 किलो के लड्डुओं का भोग अर्पित किया जाएगा, जिसमें 5 किलो का सबसे बड़ा लड्डू भी रहेगा। चैनलाइज व्यवस्था में भगवान के सामने 20-25 मिनट में दर्शन हो सकेंगे। रेलिंग में 10 से 15 मिनट इंतजार करना पड़ेगा। इसके बाद 2 मिनट चौक में आराम से दर्शन कर सकेंगे। मंदिर की खासियत: मूर्ति चूना पत्थर, गुड़, ईंटों और देश के प्रमुख तीर्थस्थलों की पवित्र मिट्टी व पानी के अनोखे मिश्रण से बनाई गई है। दावा है कि यह भगवान गणेश की विश्व की एकमात्र ऐसी मूर्ति है, जिस पर सवा मन घी और सिंदूर चढ़ाया जाता है। मंदिर का इतिहास: मंदिर का निर्माण पं. नारायण दधीच ने तीन साल में कराया था। इसका निर्माण 17 जनवरी 1901 को पूरा हुआ था। मूर्ति 25 फीट ऊंची और 14 फीट चौड़ी है। पूजन-दर्शन व्यवस्था: गणेश उत्सव के दौरान प्रतिदिन विशेष श्रृंगार किया जाएगा। मंदिर की खासियत: तिल चतुर्थी पर यहां मेला लगता है। दाहिनी ओर सूंड वाली प्रतिमाएं बहुत दुर्लभ हैं। ऐसी प्रतिमा MP में कहीं और नहीं है। आमतौर पर बाईं ओर सूंड वाली प्रतिमाएं मिलती हैं। मंदिर का इतिहास: मान्यता है कि बाचावानी में यह मूर्ति स्वयं प्रकट हुई है और हर साल तिल चतुर्थी पर तिल के बराबर बढ़ती है। राजा-महाराजाओं के समय मूर्ति को महल ले जाने का प्रयास किया गया, लेकिन मूर्ति अपने स्थान से हिली तक नहीं। ————————- इनपुट: उज्जैन से मोहित राठौर, इंदौर से अमित सालगट, सीहोर से महेंद्र ठाकुर, भोपाल से साकिब खान, रतलाम से केके शर्मा, जबलपुर से शिशिर वाजपेयी, नर्मदापुरम से धर्मेंद्र दीवान, ग्वालियर से विजय सिंह राठौर।

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