मध्यप्रदेश सरकार ने जमीन के सरकारी रेट बढ़ाए। मकान, दुकान और खेत की रजिस्ट्री महंगी हुई। उम्मीद थी कि खजाने में भी उसी रफ्तार से पैसा आएगा। नई गाइडलाइन के पांच महीने के आंकड़ों ने राजस्व का अजीब गणित सामने रखा है। प्रदेश के बड़े प्रॉपर्टी बाजार लक्ष्य से पीछे हैं। छोटे जिले सरकार के लक्ष्य से कहीं आगे निकल गए हैं। इंदौर में सरकार ने जितना राजस्व जुटाने का लक्ष्य रखा था, उसका सिर्फ 78 प्रतिशत ही आया। भोपाल 84 प्रतिशत, जबलपुर 83 प्रतिशत, उज्जैन 82 प्रतिशत और ग्वालियर 85 प्रतिशत पर रहे। इसके उलट सिंगरौली ने लक्ष्य का 287 प्रतिशत, पन्ना ने 140 प्रतिशत, झाबुआ ने 136 प्रतिशत, आलीराजपुर ने 136 प्रतिशत और धार ने 134 प्रतिशत राजस्व जुटा लिया। 1 अप्रैल से 31 अगस्त तक प्रदेश के लिए 5,796 करोड़ रुपए का लक्ष्य था। कुल वसूली 5,434.59 करोड़ रुपए हुई। खजाना तय लक्ष्य से 361.41 करोड़ रुपए पीछे रह गया। पिछले साल की इसी अवधि के मुकाबले राजस्व में 12.68 प्रतिशत (611.40 करोड़ रुपए) की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। राजस्व जरूर बढ़ा है, लेकिन बड़े बाजारों में रफ्तार सुस्त रही। 14 दिन में 434 करोड़ आए, फिर भी गैप बरकरार
17 अगस्त तक प्रदेश में 5,000.73 करोड़ रुपए का राजस्व आया था। उपलब्धि 86.28% पर अटकी थी। 18 से 31 अगस्त के बीच केवल 14 दिनों में अफसरों ने स्पेशल ड्राइव चलाकर 433.86 करोड़ रुपए का राजस्व जुटाया। इससे लक्ष्य-उपलब्धि का आंकड़ा 7.5% उछलकर 93.76% तक पहुंचा। बड़े बाजारों की सुस्ती के कारण 5 महीने पूरे होने पर सरकार 361.41 करोड़ रुपए के अंतर से पिछड़ गई। संभागवार में भी पश्चिम पीछे राजस्व के इस गणित में क्षेत्रीय अंतर भी उभरा है। पश्चिमी मध्यप्रदेश के बड़े आईटी और औद्योगिक केंद्रों वाले संभाग लक्ष्य से पीछे हैं। इंदौर-भोपाल: सबसे बड़े बाजार, लक्ष्य से सबसे दूर 1. इंदौर: चारों पंजीयन कार्यालयों को 1,331 करोड़ रु का लक्ष्य था। 1,039.37 करोड़ रु ही आए (उपलब्धि 78.09%)। इंदौर अकेले 291.63 करोड़ रु. के घाटे में रहा। 2. भोपाल: तीन पंजीयन कार्यालयों का लक्ष्य ₹906 करोड़ था, लेकिन वसूली ₹762.50 करोड़ (84.16%) ही हो सकी। भोपाल-3 सिर्फ 74.25% ही हासिल कर सका। 3. अन्य बड़े शहर: जबलपुर में 354 करोड़ के मुकाबले 292.92 करोड़, उज्जैन में 229 करोड़ के मुकाबले 187.53 करोड़, ग्वालियर में 412 करोड़ के मुकाबले 350.64 करोड़ ही आए। सिंगरौली ने इंदौर की 36% कमी भर दी एक तरफ जहां सबसे बड़े बाजार पिछड़ रहे हैं, वहीं खनन और औद्योगिक गतिविधियों वाले छोटे जिले तीन गुना तक कमाई दे रहे हैं। भास्कर सवाल जमीन की सरकारी कीमतें बढ़ीं और राजस्व भी बढ़ा, लेकिन पांच महीने बाद सवाल वही है-क्या सरकार ने बड़े शहरों की गाइडलाइन रेट तो बढ़ा दिए, पर उस दर पर होने वाले सौदों का अनुमान जरूरत से ज्यादा लगा लिया? एक नजर में (5 महीने का रिपोर्ट कार्ड)
