बालाघाट में गुरुवार को आदिवासी समाज के बुलाए गए बंद का मुख्यालय में काफी असर दिखा। दुकानें बंद रहीं और बसों के पहिए थमे रहे। हालांकि, बंद कराने वाले आदिवासी समाज ने स्कूल और इमरजेंसी सेवाओं को बंद से छूट दी थी। प्रदर्शन के दौरान, 21 अगस्त से अनिश्चितकालीन हड़ताल पर बैठे समाज के प्रदर्शन स्थल पर आदिवासी समाज ने एक सभा की। यहां समाज के प्रतिनिधियों ने बताया कि 27 बच्चों की मौत के बाद भी सरकार गंभीर नहीं दिख रही है। यही वजह है कि अब तक जिम्मेदारों पर कोई कार्रवाई नहीं हुई है। रोजाना बच्चे पहुंच रहे अस्पताल दरअसल, जिले के बैहर और परसवाड़ा के आदिवासी अंचल में खसरा, मलेरिया, चर्मरोग, डायरिया और अन्य बीमारियों से 27 मासूम आदिवासी बच्चों की करीब ढाई महीने में मौत हो गई है। लेकिन, बीमारियों पर अब भी रोक नहीं लग पाई है। रोजाना ही बीमार बच्चे अस्पताल पहुंच रहे हैं। इससे प्रभावित क्षेत्र में प्रशासन की स्वास्थ्य और अन्य सेवाओं पर सवाल उठ रहे हैं। उचित मुआवजा दे सरकार आदिवासी समाज इस मामले में मुख्यमंत्री से पूछ रहा है कि आदिवासी बच्चों की मौत की कीमत सिर्फ 2 लाख रुपए है? समाज मृतक बच्चों के परिवार को उचित मुआवजा और सीएमएचओ, पीएच, महिला एवं बाल विकास विभाग सहित स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाने में लापरवाही करने वाले क्षेत्रीय स्वास्थ्य अमले पर कार्रवाई की मांग कर रहा है। सभी जिम्मेदारों पर कार्रवाई की मांग हालांकि, सरकार ने सीएमएचओ डॉ. परेश उपलप को हटा दिया है, लेकिन आदिवासी समाज मामले की निष्पक्ष जांच कर सभी जिम्मेदारों पर कार्रवाई चाहता है। इसी को लेकर गुरुवार को आदिवासी समाज ने बालाघाट बंद का आह्वान किया था। इसमें जिले के व्यापारियों और आम लोगों ने खुद ही बंद आंदोलन को समर्थन दिया। बंद को देखते हुए पुलिस व्यवस्था कड़ी रही। आदिवासी समाज अपनी मांगों का ज्ञापन रैली के जरिए प्रशासन को सौंपेगा। बंद की अन्य तस्वीरें…
