सबने प्रसन्नजीत को मरा मान लिया था। कई सालों तक उसकी कोई खबर नहीं थी। लेकिन बहन संघमित्रा मानने को तैयार नहीं थी कि उसका भाई इस दुनिया में नहीं है। उसे भरोसा था-मेरा भाई जिंदा है। बालाघाट के महकेपार का रहने वाला प्रसन्नजीत 8 साल तक पाकिस्तान की जेल में बंद रहा। ये 8 बरस परिवार के लिए बेहद मुश्किल भरे रहे। न भाई की कोई खबर, न कोई चिट्ठी और न ही ऐसा कोई सुराग, जिससे पता चल सके कि वह कहां है। धीरे-धीरे लोगों ने मान लिया कि प्रसन्नजीत अब इस दुनिया में नहीं रहा। बहन संघमित्रा ने हार नहीं मानी। 10वीं तक पढ़ी संघमित्रा के पास भरोसे और हौसले के सिवाय शायद कुछ नहीं था। फिर एक दिन ऐसा फोन आया, जिसने उसके हौसले को और मजबूत कर दिया। फोन करने वाले ने कहा-आपका भाई पाकिस्तान के लाहौर की कोट लखपत जेल में है। वहां उसका नाम प्रसन्नजीत नहीं, बल्कि सुनील कुमार अते दर्ज है। संघमित्रा के लिए यह उस उम्मीद का पहला ठोस सबूत था, जिसे उसने कई सालों तक जिंदा रखा था। फोन करने वाले ने भाई से जुड़ी एक और बात बताई, जिसने संघमित्रा को अंदर तक हिला दिया। प्रसन्नजीत ने उसे अपनी बहन का पूरा पता और ठिकाना बताया था। इसके बाद संघमित्रा ने देर नहीं की। उन्होंने भाई को वापस लाने की कोशिश शुरू कर दी। बात सरकार तक पहुंची, कागजी प्रक्रिया शुरू हुई। भारत सरकार की पहल के बाद पाकिस्तान की जेल में बंद प्रसन्नजीत की पहचान और उसके भारत लौटने की प्रक्रिया आगे बढ़ी।
भाई को लेने खुद पंजाब गईं संघमित्रा
आखिरकार वह दिन भी आया, जिसका इंतजार संघमित्रा ने पूरे 8 साल तक किया था। जब पाकिस्तान रेंजर्स ने पिछले दिनों 31 जनवरी 2026 को प्रसन्नजीत सहित 7 भारतीयों को भारत की सीमा पर छोड़ा, तो उसे लेने के लिए संघमित्रा खुद बालाघाट से पंजाब पहुंचीं। वह अपने भाई को लेकर बालाघाट लौटीं। हालांकि, प्रसन्नजीत को अब भी ठीक से याद नहीं है कि वह पाकिस्तान कैसे पहुंचा था। उसकी मानसिक हालत भी पूरी तरह बेहतर नहीं है। वह यह याद नहीं कर पाता कि किन परिस्थितियों में वह सीमा पार पहुंच गया। प्रसन्नजीत फार्मेसी ग्रेजुएट है। उसके पिता ने बड़ी मेहनत से उसे पढ़ाई के लिए जबलपुर भेजा था। उसने वहां अपनी ग्रेजुएशन की पढ़ाई सफलतापूर्वक पूरी की थी। 8 साल बाद भाई को बांधी राखी संघमित्रा कहती हैं कि इन 8 सालों में उन्होंने किसी और को राखी नहीं बांधी। उन्हें भरोसा था कि उनका भाई जरूर लौटेगा। वह बताती हैं कि इकलौते बेटे के गम में उनके पिता भी सदमे में चल बसे। मां की मानसिक हालत भी ठीक नहीं है। अब संघमित्रा की बस यही इच्छा है कि भाई का बेहतर इलाज हो जाए और वह फिर से सामान्य जिंदगी शुरू कर सके। प्रसन्नजीत को नहीं पता, वह पाकिस्तान कैसे पहुंचा प्रसन्नजीत आखिर पाकिस्तान कैसे पहुंच गया? इस सवाल का सीधा जवाब आज भी किसी के पास नहीं है। संघमित्रा कहती हैं कि प्रसन्नजीत बिहार गया था। वहां से वह पाकिस्तान कैसे पहुंच गया, यह परिवार को नहीं पता। वह 2018 में घर छोड़कर चला गया था। संभावना है कि उसने गलती से सीमा पार कर ली हो। इसी दौरान पाकिस्तानी सुरक्षा एजेंसियों ने उसे गिरफ्तार कर लिया हो। हालांकि, प्रसन्नजीत को खुद भी इस बारे में कुछ याद नहीं है कि वह पाकिस्तान कैसे पहुंचा। उसे बस इतना याद है कि पाकिस्तान की जेल से घर की जिंदगी बहुत अच्छी है। वह अपनी मार्कशीट देखकर अपने अतीत को याद करने की कोशिश करता है, लेकिन ज्यादा याद नहीं कर पाता। फिलहाल वह महकेपार में अपनी बहन के घर रह रहा है। मां बीमार हैं, ऐसे में संघमित्रा ही मां की तरह उसकी देखभाल कर रही हैं। 2021 में पाक जेल से रिहा हुए कुलदीप ने दी प्रसन्नजीत की जानकारी जम्मू के कठुआ निवासी कुलदीप ने बताया कि वह भी कोट लखपत जेल में बंद थे और 2021 में वहां से रिहा हुए थे। प्रसन्नजीत भी उनके साथ उसी जेल में बंद था। कुलदीप के मुताबिक, प्रसन्नजीत ने उन्हें अपने परिवार के बारे में पूरी जानकारी दी थी। उसने बताया था कि उसकी एक बहन संघमित्रा है, भांजी सृष्टि और जीजा राजेश खोब्रागढ़े हैं। कुलदीप ने बताया कि पाकिस्तान की जेल के रिकॉर्ड में प्रसन्नजीत का नाम सुनील अते के तौर पर दर्ज था। वहां ये नाम कैसे दर्ज किया ये किसी को नहीं पता। पाकिस्तान सरकार ने भारत सरकार से प्रसन्नजीत के भारतीय नागरिक होने से जुड़े दस्तावेज मांगे थे। 4 साल की कानूनी उलझनों के बाद प्रसन्नजीत आखिरकार भारत लौट सका।
