तुम्हारी फाइलों में गांव का मौसम गुलाबी है
मगर ये आंकड़े झूठे हैं, ये दावा किताबी है अदम गोंडवी के इस शेर की जमीनी हकीकत बालाघाट के बैगा गांवों में दिखती है। कुपोषण से बुरी तरह जूझ रहे बालाघाट के बिरसा ब्लॉक के आधा दर्जन गांवों में दो महीने से बच्चों की मौतें हो रही हैं। सरकारी रिकॉर्ड में हाल की 8 मौतें हैं, पर भास्कर की गांव-गांव पड़ताल में 19 बच्चों की मौत सामने आई। इनमें मातला और मछुरदा की 6 मौतें मौजूदा सरकारी रिकॉर्ड में नहीं हैं। कई बच्चे अब भी अस्पताल में हैं या बीमार हैं। भास्कर बोंदारी, कोंडेकसा, मछुरदा, मातला और कोरका सहित बैगा-गोंड बहुल गांवों में पहुंचा। हर जगह तस्वीर लगभग एक जैसी मिली। कुपोषित बच्चे, तेज बुखार, मच्छरों का प्रकोप। ग्रामीणों की शिकायत है कि करीब 6 महीने से टेक होम राशन नहीं मिला और 5 साल से मच्छरदानी न के बराबर बंटी। कागजों में नल-जल है, लेकिन कई परिवार हैंडपंप और उसके बंद होने पर नदी-नालों के पानी पर निर्भर हैं। इलाज के लिए भी झाड़-फूंक, ‘गुनिया’ और ‘सूजा-पानी’ यानी इंजेक्शन पर भरोसा दिखा। हालांकि, कलेक्टर कुमार सत्यम ने भास्कर से कहा- सभी 19 मौतों को हाल की 8 मौतों से जोड़कर देखना ठीक नहीं है। इनमें कुछ मौतें काफी पहले की हैं। ज्यादातर गांव नक्सल प्रभावित रहे। शुरुआत में मरीजों को दवा खिलाने, जांच कराने और अस्पताल ले जाने के लिए राजी करना भी मुश्किल था। इन 2 गांवों में ही 6 मौतें- कोई रिकॉर्ड में नहीं मातला गांव : एक परिवार में 2 मौतें; गर्मी से पोषण आहार नहीं, जंगली भाजी-चावल सहारा मछुरदा गांव: सगनू के 1 बेटे की मौत, 3 अस्पताल में, बोले- पोषण आहार मिलता तो बेटा बच जाता मछुरदा गांव में 3 बच्चों की मौत हुई है। सगनू मरकाम के बेटे सूरज की मौत हो चुकी है, जबकि उनके तीन बच्चे अस्पताल में हैं। सगनू का पांच साल का एक बच्चा 10-15 किलो से भी कम वजन का है, दूसरा भी बेहद कमजोर है। सगनू बताते हैं कि कई महीनों से पोषण आहार नहीं मिला। वे कहते हैं- ‘मेरा बच्चा बहुत दुबला हो गया था। पोषण आहार मिलता तो शायद बच जाता।’ गांव में दूसरी मौत एक साल के रवनलाल की हुई, जो सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज नहीं है। तीसरी मौत मंगल के 7 साल के बेटे कुंवरलाल की हुई। रवनलाल की मां बताती हैं – ‘सूजा-पानी’ यानी इंजेक्शन लगवाकर घर लाए थे। कुछ खा रहा था, तभी हिचकी आई और आंखें पलट गईं। परिवार करील (बांस के अंकुर) और जंगल की भाजी खाकर गुजारा करता है। कुंवरलाल को तेज बुखार और मुंह में दाने थे। परिवार का कहना है कि कई महीनों से पोषण आहार नहीं मिला- पूरी गर्मी निकल गई। ग्रामीण बताते हैं कि मच्छर बहुत हैं, लेकिन मच्छरदानी कभी नहीं मिली। बच्चे की मौत के बाद दवा का छिड़काव हुआ। अब बैगा युवक दुलेश्वर और उनके साथी पैसे जुटाकर मुफ्त मच्छरदानी बांट रहे हैं। दुलेश्वर कहते हैं – “एक मच्छरदानी 60 रुपए की है। 100 का पैसा जुटा लिया है, कम से कम 500 बांटेंगे। सरकार नहीं कर रही तो हम करें, हमारे लोग हैं।” प्रभावित परिवारों का कहना है कि अब तक मुआवजा नहीं मिला। एक और चुनौती : बीमारी के बाद भी पहले अस्पताल नहीं पहुंचते कई परिवार बैगा गांव लंबे समय तक दुर्गम और नक्सल प्रभावित रहे हैं। स्थानीय स्तर पर बीमारी में ‘गुनिया’, झाड़-फूंक और ‘सूजा-पानी’ जैसे उपचार पर भरोसा भी दिखता है। प्रशासन भी मानता है कि शुरुआत में मरीजों को दवा खिलाना, जांच कराना और अस्पताल ले जाने के लिए राजी करना मुश्किल था। इलाज में होने वाली यह देरी पहले से कमजोर बच्चों के लिए खतरा और बढ़ाती है। 240% ज्यादा जांच का दावा, फिर सवाल – मलेरिया इतना घटा कैसे?
इस साल लक्ष्य से 240% ज्यादा जांच का दावा है, लेकिन भास्कर की पड़ताल में अधिकांश जांच रैपिड किट से होने की बात सामने आई। इनकी जांच क्षमता पर भी सवाल हैं। विधायक संजय उईके मामलों में गिरावट को इन्हें ‘कम दिखाने’ के कथित दबाव से जोड़ते हैं। सवाल है – तीन साल 50% से 57% केस वाला बालाघाट एक साल में 30% पर कैसे आ गया?
4.5 किलो की 3 साल की बच्ची, फिर भी रिकॉर्ड में कुपोषित नहीं अस्पताल में मृत तीन साल की बच्ची का वजन सिर्फ 4.5 किलो था, लेकिन विभाग की सूची में वह कुपोषित नहीं थी। रीजनल ट्राइबल रिसर्च इंस्टीट्यूट पहले ही जनजातियों में विटामिन-प्रोटीन की गंभीर कमी पर आगाह कर चुका है। टाटा इंस्टीट्यूट ने मोटे अनाज पर निर्भरता, सीमित शिक्षा और रोजगार को भी कुपोषण से जोड़ा है। दो बड़े खतरे – कुपोषण और मलेरिया, दोनों में सिस्टम कमजोर कुपोषण – यहां हर छठा बच्चा कुपोषित बालाघाट में 5 साल तक के करीब सवा लाख बच्चे हैं। इनमें 17% कुपोषित या अति गंभीर कुपोषित हैं। मौतों वाले इलाकों में 36% बच्चों का विकास तय मानकों से कम है। 33% बच्चे अंडरवेट हैं। मलेरिया – प्रदेश के 50% केस यहीं पर प्रदेश के मलेरिया मामलों में बालाघाट की हिस्सेदारी 2022 में 50%, 2023 में 51.5%, 2024 में 57% थी, जो 2025 में 30% रह गई। । पांच साल से मच्छरदानी न के बराबर बंटी।
