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निगम कमिश्नर बोलीं- महापौर निर्णय लेने में अक्षम:सिंगरौली में कहा- महापौर पति सुनकर दु:ख होता है; मेयर बोलीं- बिना पढ़े फाइल साइन नहीं करूंगी

सिंगरौली नगर निगम में महापौर और कमिश्नर के बीच लंबे समय से चला आ रहा विवाद शुक्रवार को परिषद की बैठक में खुलकर सामने आ गया। बैठक के दौरान दोनों के बीच तीखी नोकझोंक हुई, जिसका वीडियो शनिवार को सामने आने के बाद यह मामला सार्वजनिक हो गया। परिषद की बैठक में एजेंडा बिंदुओं पर चर्चा के दौरान महापौर के अधिकारों और फाइलों के निस्तारण को लेकर सवाल उठे। यह चर्चा जल्द ही व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोप में बदल गई, जिससे सदन का माहौल गरमा गया। नगर निगम अध्यक्ष देवेश पांडे ने नियमों की जानकारी देने के लिए कमिश्नर सविता प्रधान से अपनी बात रखने को कहा। कमिश्नर सविता प्रधान ने सदन में आरोप लगाया कि महापौर निर्णय लेने में सक्षम नहीं हैं, जिसके कारण फाइलें आगे नहीं बढ़ पा रही हैं। उन्होंने यह भी कहा कि कई बार फाइलें निगम कार्यालय में न रुककर बाहर चली जाती हैं, जिससे प्रशासनिक कामकाज प्रभावित होता है। कमिश्नर सविता प्रधान के इस बयान के बाद सदन में गहमागहमी बढ़ गई। उन्होंने महिलाओं के आरक्षण का जिक्र करते हुए कहा कि जब संविधान ने महिलाओं को 50 प्रतिशत आरक्षण दिया है, तो उन्हें निर्णय लेने की जिम्मेदारी भी उठानी चाहिए। उन्होंने सदन में मौजूद महिला पार्षदों से अपने अधिकारों का सही तरीके से उपयोग करने का आग्रह किया। कमिश्नर ने आगे कहा कि नगर निगम में 25 महिला पार्षद हैं, लेकिन उन्होंने कई महिला पार्षदों को परिषद की बैठकों में पहली बार देखा। तीन दिन तक फाइल रखने का अधिकार कमिश्नर के बयान के दौरान ही सिंगरौली नगर निगम की महापौर रानी अग्रवाल अपनी सीट से खड़ी हो गईं और उन्होंने पलटवार करते हुए कहा कि फाइलें तीन दिनों तक अपने पास रखना उनका अधिकार है। उन्होंने कहा कि डी-1 बंगला उनका घर नहीं बल्कि कार्यालय है और वहां फाइलें ले जाकर पढ़ना और समझना उनका विशेषाधिकार है। महापौर ने यह भी कहा कि बिना पढ़े और समझे किसी भी फाइल पर हस्ताक्षर करना उनके लिए संभव नहीं है।
महापौर रानी अग्रवाल ने सदन में कहा कि यदि किसी फाइल में भ्रष्टाचार की आशंका होती है तो उसे रोकना उनकी जिम्मेदारी है। उन्होंने कहा कि अधिकारी भी फाइलें अपने साथ ले जाते हैं, ऐसे में महापौर द्वारा फाइल ले जाने पर सवाल उठाना गलत है। इस बयान के बाद सदन में शोर-शराबा शुरू हो गया और दोनों पक्षों के बीच बहस तेज हो गई। हालात बिगड़ते देख नगर निगम अध्यक्ष देवेश पांडे ने हस्तक्षेप किया और सभी को मूल विषय पर लौटने की अपील की। अध्यक्ष की समझाइश के बाद मामला कुछ देर में शांत हुआ और बैठक आगे बढ़ी। “पार्षद पति” या “महापौर पति” जैसे शब्द सुनकर दुख होता
इस पूरे मामले पर दैनिक भास्कर ने नगर निगम कमिश्नर सविता प्रधान से बातचीत की। उन्होंने स्पष्ट किया कि उनका उद्देश्य किसी को नीचा दिखाना नहीं था। उन्होंने कहा कि महिलाओं को जो अधिकार मिले हैं, उनका सही उपयोग होना चाहिए। निर्णय लेने की क्षमता महिला पार्षदों और महापौर दोनों में होनी चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें “पार्षद पति” या “महापौर पति” जैसे शब्द सुनकर दुख होता है और यह सोच बदलनी चाहिए। महीनों तक फाइल लंबित रहने पर विकास पर असर नगर निगम अध्यक्ष देवेश पांडे ने इस विवाद पर कहा कि कमिश्नर द्वारा कही गई बातों में नियमों का हवाला दिया गया है। उन्होंने बताया कि नियमों के अनुसार महापौर को सीमित समय तक फाइल अपने पास रखने का अधिकार है। लेकिन यदि महीनों तक फाइलें लंबित रहती हैं तो इसका सीधा असर शहर के विकास पर पड़ता है। उन्होंने कहा कि परिषद की बैठक 11 महीने बाद हो पाई है और निर्णयों में देरी से विकास कार्य प्रभावित हो रहे हैं।

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