दिसंबर 2025 में हमारी एमएस-एमडी यानी पोस्टग्रेजुएशन पूरी हो चुकी है, लेकिन 10वीं, 12वीं और एमबीबीएस सहित हमारी तमाम डिग्रियां सरकार के पास बंधक हैं। एमबीबीएस और एमडी करने के बाद भी हम पिछले 6 महीने से बेरोजगार हैं। हालत यह है कि हममें से ज्यादातर डॉक्टर अपने एजुकेशन और पर्सनल लोन की किस्तें तक नहीं भर पा रहे हैं।’ यह उसी मध्य प्रदेश के डॉक्टरों की आपबीती है, जहां सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों के आधे से ज्यादा पद खाली हैं। तस्वीर इसलिए भी परेशान करने वाली है, क्योंकि नीट और री-नीट जैसी कठिन परीक्षाओं के बाद चुनिंदा छात्रों को मेडिकल कॉलेजों में दाखिला मिलता है, लेकिन पढ़ाई पूरी होने के बाद उन्हें भी सरकारी सिस्टम के आगे संघर्ष करना पड़ रहा है। मेडिकल एजुकेशन विभाग का तर्क है कि यह मामला स्वास्थ्य विभाग का है, जबकि स्वास्थ्य विभाग के अफसरों के पास इन डॉक्टरों की बात सुनने तक का समय नहीं है। भास्कर ने हेल्थ डायरेक्टर, एडिशनल सेक्रेट्री और अंडर सेक्रेट्री से इस संबंध में संपर्क किया, लेकिन कहीं से भी कोई स्पष्ट जवाब नहीं मिला। सेना छोड़ पीजी पूरी की… अब अफसरों के चक्कर मेजर डॉ. यश श्रीवास्तव बताते हैं कि एमबीबीएस के बाद उन्हें एसएससी के जरिए सेना में कमीशन मिला था। पांच साल सेना में सेवा देने के बाद पारिवारिक कारणों से वे भोपाल लौट आए और जनरल सर्जरी में पीजी में दाखिला लिया। उन्होंने कहा, “दिसंबर 2025 में एमएस जनरल सर्जरी पूरी की। एडमिशन के समय हमसे ग्रामीण सेवा के लिए बॉन्ड साइन कराया गया था। नियम के मुताबिक पासआउट होने के बाद सरकार को ग्रामीण स्वास्थ्य केंद्र में पोस्टिंग देनी चाहिए, लेकिन सात महीने बाद भी पोस्टिंग नहीं मिली है। हमारी 10वीं, 12वीं की मार्कशीट और एमबीबीएस की डिग्री बंधक रखी गई हैं। इसके कारण मैं न मध्यप्रदेश में और न ही किसी दूसरे राज्य में काम कर सकता हूं, क्योंकि संचालनालय से एनओसी जरूरी होती है। शादी अटकी, बंधक जैसी जिंदगी हो गई यश बताते हैं कि उन्होंने पीजी करने के लिए एजुकेशन लोन लिया था, जिसकी ईएमआई अब रुक गई है। स्टैंडर्ड ऑफ लिविंग बनाए रखना मुश्किल हो रहा है। जहां भी नौकरी के लिए आवेदन करते हैं, वहां ओरिजिनल सर्टिफिकेट मांगे जाते हैं। यह सिर्फ मेरी नहीं, बल्कि मेरे कई साथियों की परेशानी है। किसी की शादी अटकी हुई है तो दूसरे राज्यों से आए छात्र अपने गृह राज्य तक नहीं जा पा रहे हैं। संवैधानिक रूप से यह हमारी व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर भी हमला है। हम बंधक जैसे हो गए हैं। हमने सरकार को हाईकोर्ट का आदेश भी दिया है, जिसमें कहा गया है कि यदि तीन महीने तक बॉन्ड पोस्टिंग नहीं मिलती तो बॉन्ड स्वतः समाप्त माना जाएगा। डॉक्टर बना, लेकिन अपने राज्य नहीं लौट पा रहा आर्थोपेडिक्स में पीजी कर चुके डॉ. अमित कुमार हरियाणा के रहने वाले हैं। वे कहते हैं कि पीजी पूरी होने के बाद भी मैं अपने गृह राज्य नहीं जा पा रहा हूं। वहां काम करने के लिए यहां से एनओसी जरूरी है। पर्सनल लोन लिया, अब किस्तें चुकाना मुश्किल पल्मोनरी मेडिसिन में एमडी कर चुके डॉ. शरद सिंगोर कहते हैं कि पीजी की फीस काफी ज्यादा होती है। हमारा परिवार इतनी फीस नहीं भर सकता था। एजुकेशन लोन मिलने में दिक्कत आई तो पर्सनल लोन लेना पड़ा। पर्सनल लोन पर ब्याज भी ज्यादा होता है। अब हालत यह है कि लोन की किस्तें भरना मुश्किल हो रहा है। पीजी कंप्लीट हुए सात महीने हो चुके हैं, लेकिन न हमें डिग्री मिल रही है और न ही नौकरी। हम तो बॉन्ड की शर्तों के मुताबिक गांवों में सेवा देने के लिए तैयार हैं, लेकिन सरकार ने अब तक पोस्टिंग ही नहीं दी। मेडिकल एजुकेशन डायरेक्टर ने ऑन कैमरा बोलने से इनकार किया मेडिकल एजुकेशन डायरेक्टर डॉ. अरुणा कुमार से जब इस मामले में सवाल किया गया तो उन्होंने कहा कि पहले हमारे ऑफिस के पास कॉलेजों से सूची आती थी। ग्रामीण सेवा में पोस्टिंग के लिए हम यह सूची हेल्थ डायरेक्टरेट को भेजते थे। उन्होंने बताया कि अब कॉलेज सीधे स्वास्थ्य संचालनालय को सूची भेजते हैं, इसलिए इस प्रक्रिया में हमारे ऑफिस की कोई भूमिका नहीं है। हालांकि डॉ. अरुणा कुमार ने ऑन कैमरा कोई प्रतिक्रिया देने से इनकार कर दिया। स्वास्थ्य आयुक्त से भी जवाब नहीं मिला स्वास्थ्य आयुक्त धनराजू एस. से फोन पर संपर्क किया गया, लेकिन उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया। उनके कार्यालय में पदस्थ एडिशनल सेक्रेट्री धरणेंद्र कुमार जैन ने कहा कि वे आठ दिन पहले ही यहां पदस्थ हुए हैं, इसलिए उन्हें मामले की जानकारी नहीं है। उन्होंने अंडर सेक्रेट्री से बात करने की सलाह दी। अंडर सेक्रेट्री सीमा डहेरिया ने कहा कि इसका जवाब तो आपको उच्च अधिकारियों से ही लेना होगा। यह जवाब या तो कमिश्नर धनराजू सर देंगे या फिर एसीएस वर्णवाल। भास्कर ने हेल्थ डायरेक्टर और मेडिकल एजुकेशन कमिश्नर धनराजू एस. को वाट्सएप संदेश भेजकर भी उनका पक्ष जानने की कोशिश की, लेकिन उनकी ओर से भी कोई जवाब नहीं मिला। पीएमओ तक पहुंची शिकायत, मध्यप्रदेश से मांगा जवाब पीजी डिग्री पूरी होने के बाद भी ग्रामीण सेवा में पोस्टिंग नहीं मिलने और डॉक्टरों की डिग्रियां बंधक रखे जाने की शिकायत डॉ. दिव्यांश द्विवेदी ने 9 जून को प्रधानमंत्री कार्यालय में की थी।
शिकायत में कहा गया था कि डिग्रियां रोके जाने से डॉक्टर मानसिक तनाव का सामना कर रहे हैं। प्रधानमंत्री कार्यालय ने इस शिकायत को File No. F/3-0099750/2026 के रूप में दर्ज किया है। इसके बाद 19 जून को पीएमओ ने मध्यप्रदेश प्राइवेट यूनिवर्सिटी रेगुलेटरी कमीशन को पत्र भेजकर इस मामले में जवाब मांगा है। हालांकि, मध्यप्रदेश सरकार के अधिकारी अब भी इस पूरे मामले पर खुलकर कुछ भी कहने से बच रहे हैं।
