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रिश्वत मांगते लोकायुक्त के कर्मचारी पहली बार कैमरे में कैद:केस कमजोर करने के लिए ₹5 लाख की डील; बोले- वॉयस सैंपल बदल देंगे

एमपी में भ्रष्टाचार पर कार्रवाई करने वाले लोकायुक्त संगठन के भीतर ही रिश्वत लेकर केस कमजोर करने वाला नेटवर्क सक्रिय है। भास्कर के स्टिंग ऑपरेशन में दो कॉन्स्टेबल, एक टेक्नीशियन और एक रीडर कैमरे में रिश्वत की डील करते दिखे। एक डीएसपी के लिए टेक्नीशियन ने 3 लाख और दूसरे के लिए 5 लाख रुपए की डिमांड की। रिपोर्टर ने पुराने ट्रैप मामलों में फंसे कर्मचारियों के रिश्तेदार बनकर इन लोगों से संपर्क किया था। भास्कर इन्वेस्टिगेशन के पहले पार्ट में पढ़िए कि लोकायुक्त संगठन में कैसे चल रहा रिश्वत का नेटवर्क? केस को कमजोर करने के लिए ये कर्मचारी किन पैतरों का इस्तेमाल करते हैं? इन्वेस्टिगेशन ऐसे किया गया ‘केस रिटायरमेंट तक लंबा खीचेंगे’ भास्कर टीम ने सबसे पहले भोपाल लोकायुक्त के टेक्नीशियन अमित विश्वकर्मा से संपर्क किया। पहली बातचीत में उन्होंने खुद को जबलपुर में बताया और अगले दिन भोपाल लौटकर मिलने का समय दिया। बाद में उन्होंने करोंद के एक प्राइवेट अस्पताल के सामने मुलाकात तय की। मुलाकात में अमित ने कहा कि केस अब दूसरे डीएसपी के पास है। उनके मुताबिक, विवेचना लंबी खींचकर आरोपी की रिटायरमेंट तक मामला रोका जा सकता है, ताकि पेंशन और अन्य लाभ प्रभावित न हों। अमित ने दावा किया कि वॉयस सैंपल के दौरान आवाज बदलवाकर रिपोर्ट प्रभावित की जा सकती है। अमित ने कहा, सर से क्लियर बात हो गई है तभी यह बता पा रहा हूं। सोमवार को सर से पूछ लूंगा कि कितने पैसे लगेंगे। मेरी तरफ से बस ये दो काम होंगे वॉयस सैंपल और केस को लंबा खींचना। बोला- गवाहों को भी मैनेज करना पड़ता है दूसरी मुलाकात में अमित ने दावा किया कि 5 लाख रुपए में वॉयस सैंपल और विवेचना “मैनेज” हो जाएगी। जांच 3 से साढ़े 3 साल तक खिंच सकती है। उन्होंने रिपोर्टर को किसी और से संपर्क न करने की सलाह दी। बाद में उन्होंने डीएसपी से वॉट्सएप कॉल पर बात कर 19 तारीख को मुलाकात का समय तय कराया। पेमेंट के सवाल पर अमित ने कहा कि आधी रकम पहले और बाकी वॉयस सैंपल के बाद देनी होगी। उन्होंने खुद को अफसर और आरोपी पक्ष के बीच “मीडिएटर” बताया। अमित ने दावा किया कि वॉयस सैंपल के दौरान मौजूद गवाहों को भी “मैनेज” करना पड़ता है। उन्होंने कहा कि आरोपी को क्या बोलना है, इसकी तैयारी पहले से कराई जा सकती है। क्या बोलना है, क्या नहीं, आधा पढ़ना है, आधा नहीं सब बता दूंगा। जिस केस में वॉयस सैंपल और दो-तीन साल की देरी हो जाए, समझो गंगा नहा लिए। ‘बुंदेलखंडी में प्रैक्टिस करना शुरू कर दो’ भोपाल लोकायुक्त से सागर ट्रांसफर हो चुके यशवंत सिंह पर नेटवर्क में सक्रिय रहने की सूचना थी। रिपोर्टर ने संपर्क किया तो उसने भोपाल में बात करके मदद का भरोसा दिया। कई दौर की बातचीत के बाद रिपोर्टर की उससे सागर में मुलाकात हुई। यशवंत ने दावा किया कि केस सागर ट्रांसफर होने पर वॉयस सैंपल “मैनेज” किया जा सकता है। इसके लिए उसने 5 से 6 लाख रुपए खर्च होने की बात कही। घटना वाले दिन आरोपी की मौजूदगी न साबित होने की रणनीति बताई। यशवंत ने कहा कि वॉयस सैंपल और अनुपस्थिति के जरिए इन्वेस्टिगेशन को कई महीनों तक टाला जा सकता है। यह भी दावा किया कि अंदरूनी संपर्कों से जांच और लंबी खिंच सकती है। यशवंत ने RFSL और FSL में संपर्कों के जरिए रिपोर्ट प्रभावित कराने का दावा भी किया। यशवंत ने दावा किया कि भाषा और बोलने के तरीके में बदलाव कर वॉयस सैंपल प्रभावित किया जा सकता है। साथ ही ट्रांसक्रिप्ट और दस्तावेज “मैनेज” कराने का दावा किया। बुंदेलखंडी में प्रैक्टिस करना शुरू कर दो। रीडर से ट्रांसक्रिप्ट निकलवा देंगे। 20 से 30 हजार लेगा। फिर एक प्रोफार्मा बनाकर दे देंगे, आपके रिश्तेदार जो पढ़ेंगे वही पढ़ना होगी। जिस नंबर से बातचीत हुई है, उसे पोर्ट करवा सकते हो- कंपनी बदल जाएगी। ‘भोपाल के मामले में मदद कर सकता हूं’ सूत्रों के अनुसार, भोपाल लोकायुक्त में पदस्थ आरक्षक रामदास कुर्मी ट्रैप मामलों में “सेटलमेंट” कराने के आरोपों के कारण चर्चा में थे। संपर्क करने पर उन्होंने रिपोर्टर को लोकायुक्त कार्यालय बुलाया। रिपोर्टर ने आदिम जाति कल्याण विभाग से जुड़े एक ट्रैप केस के बारे में बताया। जानकारी लेने के बाद रामदास ने कहा कि कार्रवाई जबलपुर टीम ने की थी, इसलिए वहीं संपर्क करना होगा। उन्होंने कहा कि यदि मामला भोपाल का होता तो मदद की जा सकती थी। कुछ दिन बाद रिपोर्टर ने दूसरे मामले में फिर संपर्क किया। इस बार कुर्मी ने फोन पर चर्चा से बचते हुए ऑफिस आकर मिलने को कहा और मदद का भरोसा दिया। ऑफिस पहुंचने पर कुर्मी ने रिपोर्टर को अंदर बुलाया। हालांकि, चेंबर के बाहर पहले से संपर्क में रहे अमित विश्वकर्मा को देखकर रिपोर्टर ने भीतर जाने से परहेज किया। बाद में कुर्मी ने फोन कर मुलाकात न करने का कारण पूछा। इस पर रिपोर्टर ने एक जरूरी काम का हवाला दे दिया। ‘ट्रैप के बाद लीगल प्रोसेस में टाइम लगता है’ भोपाल लोकायुक्त में लंबे समय तक रहे आरक्षक बृज बिहारी पांडे फिलहाल पीएचक्यू में पदस्थ हैं। संपर्क करने पर उन्होंने खुद को कोलकाता में बताया और भोपाल लौटने के बाद मिलने की बात कही। बातचीत में उन्होंने कई लोगों पर पैसा लेकर काम न करने का आरोप लगाया, लेकिन मदद का भरोसा भी दिया। एक केस में मदद मांगने पर पांडे ने कहा कि ट्रैप के बाद कानूनी प्रक्रिया पूरी करनी पड़ती है। भोपाल लौटने पर आगे बात होगी। दोबारा संपर्क पर पांडे ने बताया कि वे बाहर हैं, लेकिन उन्होंने गौरव साहू का नाम देते हुए कहा कि वह मदद कर देंगे। ‘3 लाख में मामला मैनेज कर दूंगा’ पांडे से बातचीत के कुछ दिन बाद रिपोर्टर के पास गौरव साहू का फोन आया। उन्होंने खुद को भोपाल लोकायुक्त में पदस्थ बताते हुए सीधे उनसे संपर्क करने और भोपाल आकर मिलने को कहा। गौरव ने दावा किया कि जांच उनके डीएसपी के पास है और वही पूरा मामला संभाल रहे हैं। उन्होंने किसी तीसरे व्यक्ति को बीच में न लाने की सलाह दी। गौरव ने 3 लाख रुपए में मामला “मैनेज” करने का दावा किया। उन्होंने कहा कि पहले 2 लाख और बाकी रकम काम होने के बाद देनी होगी। अमित का पार्ट हटा दो- पेमेंट 3 लाख ही लगेगा। अभी 2 लाख दे दो, बाकी काम हो जाने के बाद। एक बार जो कह दिया, वही होगा, फैसला आपके फेवर में ही होगा।” भास्कर इन्वेस्टिगेशन के पार्ट-2 में पढ़िए… भास्कर इन्वेस्टिगेशन के अगले भाग में पढ़िए कि दो डीएसपी पर केस रफा-दफा करने के लिए डील करने के क्या आरोप लगे और ऐसे मामलों में कोर्ट तक पहुंचते-पहुंचते केस कमजोर क्यों पड़ जाते हैं।

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