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RTI के दायरे में आएगा मप्र लोकायुक्त?:सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई पूरी, दलीलें सुनने के बाद फैसला सुरक्षित

मध्य प्रदेश लोकायुक्त संगठन को सूचना के अधिकार (RTI) से बाहर रखने वाली राज्य सरकार की 2011 की अधिसूचना की वैधानिकता पर बुधवार को सुप्रीम कोर्ट में महत्वपूर्ण सुनवाई पूरी हो गई। जस्टिस जेके माहेश्वरी और जस्टिस अतुल एस. चंदुरकर की पीठ ने राज्य सरकार और अन्य पक्षों की दलीलें सुनने के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया है। कोर्ट के पिछले आदेश के अनुपालन में मध्यप्रदेश के महाधिवक्ता प्रशांत सिंह स्वयं उपस्थित हुए। उन्होंने लोकायुक्त को RTI से छूट देने के पीछे राज्य सरकार के तर्क रखे हालांकि, कोर्ट पहले ही स्पष्ट कर चुका था कि धारा 24(4) के तहत केवल ‘खुफिया’ या ‘सुरक्षा’ संगठनों को ही ऐसी छूट मिल सकती है। ऐसे में लोकायुक्त के कार्य इस श्रेणी में कैसे आते हैं, यह बड़ा सवाल बना हुआ है। कोर्ट की तल्ख टिप्पणी
कोर्ट ने दोहराया कि रिकॉर्ड पर ऐसा कोई तथ्य नहीं है, जिससे यह साबित हो कि लोकायुक्त स्थापना एक ‘खुफिया या सुरक्षा’ संगठन है। इसके बिना सरकार की 2011 की अधिसूचना RTI अधिनियम की मूल भावना के खिलाफ प्रतीत होती है। सुनवाई के दौरान यह भी चर्चा में रहा कि उत्तर प्रदेश, कर्नाटक और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में लोकायुक्त संगठन RTI के दायरे में रहकर पारदर्शिता के साथ काम कर रहे हैं। 20 दिसंबर 2021 के आदेश के खिलाफ दायर की गई याचिका
यह मामला मप्र हाईकोर्ट के 20 दिसंबर 2021 के उस आदेश के खिलाफ है, जिसमें कोर्ट ने लोकायुक्त संगठन को RTI में मांगी गई जानकारी 30 दिन के भीतर उपलब्ध कराने के निर्देश दिए थे। साथ ही लोकायुक्त संगठन पर 5 हजार रुपए का जुर्माना भी लगाया था। सरकारी वकीलों के रवैये पर नाराजगी बरकरार
सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार के पैनल वकीलों की लापरवाही पर फिर चिंता जताई। कोर्ट पहले ही मुख्य सचिव और विधि सचिव को निर्देश दे चुका है कि वे अपने वकीलों के पैनल की समीक्षा करें, क्योंकि कई मामलों में राज्य का पक्ष रखने के लिए कोई वकील मौजूद नहीं होता। अगस्त 2011 से RTI के दायरे से बाहर है मप्र लोकायुक्त
मप्र सरकार ने अगस्त 2011 में अधिसूचना जारी कर लोकायुक्त के विशेष पुलिस स्थापना (SPE) और राज्य आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो (EOW) को RTI के दायरे से बाहर कर दिया था। सरकार का तर्क था कि शिकायतकर्ताओं और गवाहों की सुरक्षा के लिए यह जरूरी है। यूपी में पहले ही खत्म हो चुकी है छूट
उत्तर प्रदेश सरकार ने वर्ष 2012 में यूपी लोकायुक्त संगठन को RTI से बाहर रखने की अधिसूचना जारी की थी। हालांकि, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इसे रद्द कर दिया था। कोर्ट ने स्पष्ट कहा था कि भ्रष्टाचार विरोधी जांच को पारदर्शिता से अलग नहीं रखा जा सकता। तब से यूपी लोकायुक्त में RTI कानून लागू है। कर्नाटक लोकायुक्त भी RTI के तहत सूचनाएं साझा करता है। आंध्र प्रदेश और तेलंगाना के लोकायुक्त संगठन भी RTI अधिनियम की धारा 4(1)(b) के तहत अपनी जानकारियां वेबसाइट पर सार्वजनिक कर चुके हैं। वहीं, केरल, महाराष्ट्र और राजस्थान में भी लोकायुक्त संगठनों में RTI के तहत लोक सूचना अधिकारी नियुक्त हैं।

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