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MP में टाइगर का निवाला छीन रहे शिकारी:5-7 हजार रुपए में बेचते हैं हिरण-चिंकारा का मांस, कैमरे पर बोला- जहां कहोगे वहां पहुंचा देंगे

साबुत जानवर ला दूंगा। हिरण-चिंकारा जो कहें, मंगवा देंगे। बस दो दिन पहले बता दें। यह कहते हुए जुबैर नाम का युवक मुस्कुराया। उसने कहा, ‘आपने मिलने की जिद की, वरना वॉट्सऐप कॉल पर ही इंतजाम हो जाता।’ वह उस नेटवर्क की कड़ी है, जो भोपाल और आसपास के जंगलों में वन्यजीवों का शिकार कर मांस पार्टियों तक पहुंचाता है। शहर की सीमाओं पर बाघों की मौजूदगी और पर्याप्त शिकार प्रजातियां इस अवैध गतिविधि को बढ़ावा देती हैं। भास्कर की एक महीने से अधिक की पड़ताल में सामने आया कि कोड वर्ड, बिचौलिए और फार्महाउस पार्टियों से यह नेटवर्क सक्रिय है, जबकि जिम्मेदार एजेंसियां अनजान बनी हुई हैं। भास्कर ने यह पड़ताल क्यों शुरू की
दिसंबर 2025 में वन विभाग की एसटीएसएफ ने सागर के राहतगढ़ में काले हिरण के शिकारियों को गिरफ्तार किया। जांच में खुलासा हुआ कि गिरोह मुनाफे के लिए शिकार कर मांस भोपाल से मुंबई तक सप्लाई करता था, जो “खास” पार्टियों में परोसा जाता था। इस नेटवर्क में डॉक्टर वसीम खान का नाम सामने आया, जिसे शिकार से सप्लाई तक की कड़ी माना गया। इसके बाद भास्कर टीम ने नेटवर्क और उसके काम करने के तरीके की गहराई से जांच शुरू की। ऐसे उजागर हुआ शिकारियों का नेटवर्क
रिपोर्टर्स ने खुद को एक उद्योगपति के कर्मचारियों के रूप में पेश किया। गांधी नगर, रायसेन और सीहोर रोड के ढाबों पर मटन ऑर्डर के साथ ‘खास गोश्त’ मांगा गया। रात में पुराने शहर में यह संदेश फैलाया गया कि मुंबई से आने वाली पार्टी के लिए ‘चौपाया’ का मांस चाहिए और कीमत मायने नहीं रखती। लगातार संपर्क और ज्यादा पैसे के लालच में एक व्यक्ति तैयार हुआ, जिसने ‘स्पेशल मांस’ उपलब्ध कराने की बात कही। 4 शिकारियों से संपर्क: 1 पीछे हटा, 3 तैयार पहला शिकारी: शक होने पर बातचीत से पीछे हटा
मोबाइल पर संपर्क करने पर एक व्यक्ति ने शुरुआत में बात की, लेकिन शक होते ही उसने कहा, ‘गलत नंबर है… अब संपर्क नहीं होगा।’ उसने पहचान की पुष्टि के लिए दूसरे व्यक्ति से बात कराने की शर्त रखी, लेकिन आखिर में पीछे हट गया। जो तैयार हुए, उनका तरीका चौंकाने वाला था पुराने शहर में आधी रात की मुलाकात में एक ‘कटर’ मिला, जो शिकारियों के साथ जाकर जानवरों को काटने और पैक करता है।उसने कहा, ‘हिरण-चिंकारा जो कहें, सब मंगवा देंगे। पूरा जानवर साबुत मिल जाएगा। हमारे लोग फार्महाउस में ही चूल्हे-देगची पर पकाते हैं।’ उसने बताया कि मांस मोटरसाइकिल से पहुंचाया जाता है और ऑर्डर दो दिन पहले देना होता है। सुरक्षा पर उसने कहा, ‘कोई दिक्कत नहीं होगी, हम संभाल लेंगे।’ सीहोर रोड पर रातीबड़ के आगे एक डेरे में संपर्क हुआ। व्यक्ति ने बताया कि तीतर नहीं मिलेंगे, लेकिन खरगोश उपलब्ध हैं। उसने 2.5–3 किलो खरगोश की कीमत करीब 2 हजार रुपए बताई। हिरण के बारे में पूछने पर उसने कहा, ‘वह दो नंबर का मामला है, उस पर सख्त पाबंदी है… यह भी मुश्किल से दे रहा हूं।’ कटर की अहम भूमिका पड़ताल में सामने आया कि “कटर” इस नेटवर्क की अहम कड़ी है। जुबैर जैसे कटर सप्लाई चेन के सक्रिय हिस्से हैं, जो जंगल से शहर तक इस अवैध कारोबार को जोड़ते हैं। टाइगर के भोजन पर असर: विशेषज्ञ की राय पूर्व उपवन संरक्षक आर.के. दीक्षित के मुताबिक, ईको सिस्टम में छोटे-बड़े सभी जानवर अहम होते हैं। इसे दीवार की ईंटों से समझा जा सकता है- एक ईंट हटाने पर पूरी संरचना प्रभावित होती है। इसी तरह छोटे जानवरों के शिकार से बड़े जानवरों के भोजन पर असर पड़ता है। उनका कहना है कि जंगल में मानवीय दखल कम होना चाहिए, क्योंकि इससे वनस्पति और वन्यजीवों को नुकसान होता है।

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