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23 साल पुराना जग्गी मर्डर केस फिर खुला:जोगी बोले- 11000 पन्नों का केस, कॉपी तक नहीं; सतीश बोले- ये एक बेटे की लड़ाई

छत्तीसगढ़ के 23 साल पुराने बहुचर्चित जग्गी हत्याकांड में एक बार फिर सुनवाई शुरू हो गई है। 2003 में कांग्रेस नेता रामावतार जग्गी की रायपुर में गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। मामले की जांच CBI को सौंपी गई थी, जिसमें कई आरोपियों को दोषी ठहराया गया, जबकि अमित जोगी को सबूत के अभाव में बरी कर दिया गया था। अब सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद इस मामले की सुनवाई फिर से छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में शुरू हो रही है। कोर्ट ने मामले में अगली सुनवाई के लिए 1 अप्रैल की तारीख तय की है। इस बीच मामले को लेकर अमित जोगी और रामावतार जग्गी के बेटे सतीश जग्गी के अलग-अलग बयान सामने आए हैं।भास्कर की टीम ने दोनों पक्षों से बातचीत की है, अमित जोगी और सतीश जग्गी ने मामले को लेकर क्या कहा पढ़िए:- अमित जोगी सवाल: जग्गी हत्याकांड केस का फिर से रीओपन होना… क्या आपको लगता है कि फिर से आपके लिए खतरा खड़ा हो गया है? अमित जोगी: अभी-अभी मुझे जानकारी मिली कि 1 अप्रैल को इस मामले की सुनवाई हो रही है, जिसमें दो दशक पहले मुझे बाइज्जत बरी कर दिया गया था। मैंने अपने जीवन में एक ही बात सीखी है कि जो लोग ईश्वर पर आस्था रखते हैं और धैर्य रखते हैं, वे हमेशा सफल होते हैं। न्यायपालिका पर मेरी पूरी आस्था है, देश की न्यायिक व्यवस्था पर भी पूरा भरोसा है। मुझे पूरा यकीन है कि यहां पर भी मुझे न्याय मिलेगा। सवाल: पहले आपको बरी कर दिया गया, फिर इतने सालों बाद केस रीओपन हो गया… क्या ये मामला आपका पीछा नहीं छोड़ रहा? अमित जोगी: जब मैं पहली बार इस मामले में अभियुक्त बनाया गया था, तब कानून मेरा पीछा कर रहा था। लेकिन मैंने उस चुनौती को स्वीकार किया और फिर मैंने कानून का पीछा करना शुरू कर दिया। मैंने वकालत की पढ़ाई की और रायपुर यूनिवर्सिटी से मुझे लॉ में गोल्ड मेडल भी मिला। चुनौतियों का सामना करना ही जीवन है। यह बहुत पुराना मामला है और मैं भी चाहता हूं कि जो बातें हैं, वे और स्पष्ट होनी चाहिए। सवाल: इस मामले में पहले से सबूत कम थे या राजनीति ज्यादा हुई? अमित जोगी: मेरा तो यह मानना है कि जिस आदेश में मुझे बरी किया गया था, उसमें भी यही कहा गया था कि यह पूरी तरह से मेरे खिलाफ एक राजनीतिक षड्यंत्र था। मेरे पिताजी को किसी और मामले में टारगेट नहीं कर पाए, तो मैं एक सॉफ्ट टारगेट था। छत्तीसगढ़ी में एक कहावत भी है- “तोला नइ सकन त तोर पिला ला देखबो”। मुझे एक सॉफ्ट टारगेट के रूप में फंसाया गया और ट्रायल कोर्ट ने भी इस बात को स्वीकार किया। यह पहली बार नहीं है जब मामला हाईकोर्ट में आया। मेरे बरी होने के खिलाफ तीन अपीलें दायर हुई थीं, छत्तीसगढ़ शासन, CBI और प्रार्थी की तरफ से। तीनों को हाईकोर्ट ने खारिज कर दिया। मामला सुप्रीम कोर्ट भी गया, वहां भी छत्तीसगढ़ सरकार की अपील खारिज हो गई। प्रार्थी की रिवीजन को अपील में बदलने की मांग भी खारिज हुई, क्योंकि इस मामले में बहुत ज्यादा देरी हो चुकी थी।
पहली बार जब मामला हाईकोर्ट आया, तब 3 साल का विलंब था, अब 20 साल का विलंब हो चुका है। जिंदगी आगे बढ़ती है, मैंने भी इन 20 सालों में बहुत कुछ देखा है। अब फिर से वही बातें सामने आई हैं। हर चुनौती को मैंने ईश्वर के भरोसे स्वीकार किया है और हमेशा सफलता मिली है। सवाल: क्या इस केस की वजह से आपके राजनीतिक करियर को नुकसान हुआ? अमित जोगी: शायद यह केस नहीं होता तो मैं राजनीति में भी नहीं होता। नुकसान और फायदा, यह सब सार्वजनिक जीवन का हिस्सा है। अभी बहुत कुछ देखना बाकी है, इसलिए किसी निष्कर्ष पर पहुंचना जल्दबाजी होगी।
लेकिन हां, इस केस की वजह से जो प्रताड़ना मुझे, मेरे पिताजी और मेरे पूरे परिवार को सहनी पड़ी, वह जगजाहिर है। सवाल: आपने लॉ की पढ़ाई की, गोल्ड मेडल भी लिया… क्या आप यह केस खुद लड़ेंगे या आपकी लीगल टीम इसे संभालेगी? अमित जोगी: डॉक्टर कभी खुद अपना ऑपरेशन नहीं करता। मेरे लिए यह दुर्भाग्यपूर्ण और अजीब स्थिति है कि कल दोपहर मुझे सूचना दी गई कि मेरे खिलाफ अपील आई है और आज मुझसे कहा गया कि आप खड़े हो जाइए।
अब तक मुझे यह तक नहीं बताया गया कि मेरे खिलाफ मामला क्या है, उसकी कॉपी भी मुझे नहीं मिली है। 1 अप्रैल को सुनवाई रखी गई है और जिस तरह से यह मामला बुलेट ट्रेन की स्पीड से आगे बढ़ रहा है, वह थोड़ा अजीब लग रहा है। सवाल: अजीब मतलब… क्या आपको इसमें राजनीतिक षड्यंत्र नजर आता है? अमित जोगी: मैं वकील हूं और जब तक पूरे मामले का अध्ययन न कर लूं, कुछ कहना उचित नहीं होगा। यह केस करीब 11 हजार पन्नों का है। CBI के वकील ने भी कहा कि इतनी जल्दी कॉपी उपलब्ध कराना संभव नहीं है। उस समय मेरे जो वकील थे, वे अब एडवोकेट जनरल या हाईकोर्ट जज बन चुके हैं। मुझे नए सिरे से वकील करना होगा, पुरानी फाइलें खोलनी होंगी और पूरे केस को समझने के लिए समय चाहिए ताकि मैं अपने वकील को ठीक से ब्रीफ कर सकूं। सवाल: क्या इस मामले में आपको अग्रिम जमानत लेनी पड़ सकती है? अमित जोगी: अभी तो मैंने फैसला भी नहीं पढ़ा है। एक वकील के तौर पर मैं यह कहूंगा कि जब कोई अपील आपके खिलाफ दायर होती है, तो पहले “लीव टू अपील” का चरण होता है यानी क्या उसे स्वीकार किया जाए। उसके बाद अंतिम सुनवाई होती है, जिसमें मेरिट्स पर बात होती है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि मेरिट्स को देखा जाना चाहिए। मेरिट्स के भी दो चरण होते हैं। एक प्रथम दृष्टया और दूसरा विस्तृत सुनवाई।
लेकिन मुझे अभी तक यह भी नहीं बताया गया कि मेरे खिलाफ मामला क्या है। मुझे अपना पक्ष रखने का पूरा अवसर नहीं मिला है। कानून मुझे दो बार अवसर देता है, लेकिन मुझे अभी तक सुना ही नहीं गया। कुछ बातें ऐसी हैं जिन्हें एक वकील होने के बावजूद मैं समझ नहीं पा रहा हूं। सवाल: तो 1 अप्रैल को आप कोर्ट जरूर जाएंगे? अमित जोगी: जी हां, जो कानूनी लड़ाई है, उसे कानूनी तरीके से ही लड़ा जाएगा। लेकिन मेरा व्यक्तिगत मानना है। ये सांसारिक लड़ाइयां अपनी जगह हैं, असली लड़ाई भगवान लड़ता है। और जिसके साथ भगवान होता है, वह कभी हार नहीं सकता। सतीश जग्गी सवाल: आपके पिता रामावतार जग्गी हत्याकांड का केस फिर से रीओपन हुआ है। क्या ये आपके ही पिटीशन का नतीजा है? सतीश जग्गी: निश्चित तौर पर इस दिन का जग्गी परिवार बेसब्री से इंतजार कर रहा था। पिताजी के हत्याकांड में CBI ने जांच की, 29 अभियुक्त बनाए गए थे। उनमें से 28 को सजा मिली और 1 अभियुक्त बाइज्जत बरी हो गया था।
उस बरी के खिलाफ मैं हाईकोर्ट गया था। वहां मेरी रिविजन पिटिशन एडमिट हुई थी। हम चाहते थे कि CBI जल्द से जल्द आए, लेकिन किसी कारणवश देरी हुई। इसके बाद मैं सुप्रीम कोर्ट गया और आग्रह किया कि जब तक CBI नहीं आती, तब तक इस पिटिशन को स्टे किया जाए। सुप्रीम कोर्ट ने स्टे दिया और हमने CBI का इंतजार किया। आखिरकार अमित जोगी के बरी होने के खिलाफ राज्य सरकार, CBI और मेरी तीनों की पिटिशन सुप्रीम कोर्ट पहुंची। कुछ महीने पहले सुनवाई हुई और सुप्रीम कोर्ट ने मामले को गंभीर मानते हुए हाईकोर्ट को दोबारा सुनवाई का आदेश दिया। सवाल: इस पूरे मामले में कितने साल लग गए? सतीश जग्गी: यह 2003-2004 का मामला है। 20 साल से ज्यादा हो चुके हैं। 20 साल से जग्गी परिवार न्याय की प्रतीक्षा में है। लेकिन अब लगता है कि वह समय आ गया है, जब हमें जल्द न्याय मिलेगा। सवाल: कोर्ट ने किस आधार पर इसे दोबारा सुनने का फैसला लिया? सतीश जग्गी: अमित जोगी को बेनिफिट ऑफ डाउट पर बरी किया गया था, जिसमें कोई ठोस आधार नहीं था। बाद में उनके ही लोगों द्वारा यह बात सामने आई कि जज से बातचीत हुई थी। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने इस मामले में उनके परिवार के कुछ लोगों पर कार्रवाई भी की थी, लेकिन मैं उस पर नहीं जाना चाहता क्योंकि यह न्याय प्रक्रिया का मामला है। सुप्रीम कोर्ट ने माना कि इतने गंभीर मामले में सिर्फ बेनिफिट ऑफ डाउट पर मुख्य आरोपी को छोड़ना उचित नहीं है। इसी आधार पर हाईकोर्ट को सुनवाई के निर्देश दिए गए। सवाल: अब अमित जोगी को कोर्ट में पेश होना पड़ेगा और जमानत भी लेनी पड़ सकती है? सतीश जग्गी: बिल्कुल, क्योंकि बाइज्जत बरी का जो चैप्टर था, वो अब खत्म हो गया है। अब उन्हें बेल फर्निश करनी पड़ेगी, क्योंकि वे फिर से अभियुक्त की श्रेणी में आ गए हैं। सवाल: जब यह घटना हुई थी, उस समय अजीत जोगी मुख्यमंत्री थे। इतने लंबे समय तक न्याय के लिए संघर्ष कैसा रहा? सतीश जग्गी: मैंने कभी इसे राजनीतिक एंगल से नहीं देखा। मैंने अपने पिता को खोया है। मेरे निर्दोष और निहत्थे पिता की बेरहमी से हत्या हुई थी। मैंने एक पुत्र का फर्ज निभाने की कोशिश की है और उसी भावना से अब तक लड़ रहा हूं, आगे भी लड़ता रहूंगा। मैंने इस केस में कभी राजनीति को शामिल नहीं किया, हमेशा न्यायपालिका पर भरोसा रखा है और आज भी मुझे विश्वास है कि न्यायपालिका से ही न्याय मिलेगा। सवाल: अमित जोगी का कहना है कि उन्हें पहले ही बरी किया जा चुका है, ऐसे में इतने साल बाद केस रीओपन करना समझ से परे है? सतीश जग्गी: दिल्ली में मेरी बड़े अधिकारियों से बात हुई थी। उन्होंने कहा था कि CBI के मामलों में ऐसा कम होता है कि किसी अभियुक्त को सजा न मिले। अभियुक्त CBI ने बनाया है, सतीश जग्गी ने नहीं। मेरी एफआईआर तो दूसरे दिन ही शून्य घोषित कर दी गई थी और मुझे कहा गया था कि हमारी पुलिस को मौका दो। सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर यह केस रीओपन हुआ है, किसी राजनीतिक दल के कहने पर नहीं। कोर्ट ने सभी पहलुओं को देखकर ही यह फैसला लिया है। सवाल: क्या ऐसे पहलू थे जिन्हें पहले नजरअंदाज किया गया? सतीश जग्गी:
हां, निचली अदालत में कई बातें नजरअंदाज हुईं, इसलिए मैं हाईकोर्ट गया। CBI का केस साबित हुआ और 28 लोगों को सजा हुई, लेकिन अमित जोगी को क्यों छोड़ा गया। इस पर कई सवाल थे। इन्हीं बिंदुओं को हमने सुप्रीम कोर्ट में रखा, जिसे मानते हुए हाईकोर्ट को सुनवाई के निर्देश दिए गए। सवाल: 20 साल से ज्यादा हो गए… अभी भी न्याय प्रणाली पर भरोसा है? सतीश जग्गी: शत-प्रतिशत भरोसा है। अगर मैं जीता तो वे सुप्रीम कोर्ट जाएंगे, और अगर वे जीते तो मैं जाऊंगा। मुझे लगता है कि यह केस अभी 5 से 10 साल और चलेगा, लेकिन मैं तैयार हूं। मेरे पिता की हत्या में जो भी शामिल हैं, वे सलाखों के पीछे नहीं जाएंगे, तब तक मैं शांत नहीं बैठूंगा।

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