शहर की हरियाली बचाने और मप्र वृक्षों का परिरक्षण (नगरीय क्षेत्र) अधिनियम-2001 को लागू करने का जिम्मा जिस नगर निगम पर है, उसे पेड़ की सही परिभाषा तक स्पष्ट नहीं है। कानून के अनुसार किसी पौधे को पेड़ मानने के लिए उसकी ऊंचाई 2 मीटर व तने का व्यास जमीन पर कम से कम 30 सेंटीमीटर (यानी गोलाई 94 सेमी) होना चाहिए, लेकिन निगम अमला जमीन पर नाप लेने की बजाय 3-4 फीट ऊपर तने की गोलाई नाप रहा है। जबकि पेड़ का तना नीचे मोटा और ऊपर पतला होता है। इस गलत माप का नतीजा यह हुआ कि पिछले वर्षों में हजारों पेड़ों को पौधा बताकर काट दिया गया। आमतौर पर 3 से 4 फीट ऊंचाई पर लगभग 8 साल में पेड़ की गोलाई 30 सेमी हो जाती है, जबकि धरातल पर गोलाई 94 सेमी होने के लिए इससे दोगुना यानी 15 साल का समय चाहिए। इस तरह निगम अमला ऊपर से नापकर 5-7 साल पहले लगाए गए पेड़ों को भी पेड़ मानने से इनकार करता रहा और जैसे ही वे किसी प्रोजेक्ट की जद में आए, उन्हें काट दिया गया। कानून के मुताबिक इनके बदले क्षतिपूर्ति पौधरोपण होना था, पर वह भी नहीं किया गया। दिल्ली में छोटे पौधे के बदले भी पौधरोपण जरूरी
दिल्ली में तो छोटे पौधे से लेकर वनस्पतियां तक संरक्षण में हैं। वहां यदि कोई पौधा भी काटा है तो उसके बदले में पौधरोपण अनिवार्य है। भोपाल में पेड़ कटाई के नियम में प्रजाति का कोई महत्व नहीं है। वहीं राजस्थान में पीपल, नीम, आम और महुआ जैसे पेड़ सुरक्षित श्रेणी में रखे गए हैं। इनकी कटाई के लिए डीएफओ की अनुमति जरूरी है। 2001 में आए कानून के बाद भी अंग्रेजों के जमाने के डायमीटर एट ब्रेस्ट हाइट के नियम से नाप रहे पेड़ वन विभाग का नियम नगरीय क्षेत्र में लगाया
डायमीटर एट ब्रेस्ट हाइट वन विभाग का वैज्ञानिक माप है। अंग्रेज शासन से इसका उपयोग जंगल क्षेत्र में लकड़ी की मात्रा का आकलन करने के लिए किया जाता है। नगरीय क्षेत्र में इसे बिना कानूनी आधार के लागू कर दिया गया है। निगम के पास ये भी आकलन नहीं होता कि कितने पेड़ कटने पर कितनी लकड़ी निकलनी चाहिए। ये लकड़ी निगम के स्टोर में पहुंचती है, जहां कोई पारदर्शिता नहीं है। भास्कर एक्सप्लेनर – ऐसे शुरू हुई गड़बड़ी पहले पेड़ कैसे नापे जाते थे…
सितंबर 2020 से पहले भोपाल में पेड़ कटाई की अनुमति राजधानी परियोजना प्रशासन देता था। सीपीए की अपनी फॉरेस्ट विंग थी। तकनीकी माप इस तरह होती थी: जमीन से 1.2 से 1.37 मीटर ऊंचाई पर पेड़ के तने की गोलाई नापी जाती थी। फिर गोलाई को 3.14 से भाग देकर व्यास निकाला जाता था। इसी निकले हुए व्यास के आधार पर तय होता था कि पेड़ काटने योग्य है या नहीं। तो गलती क्या और कहां हुई…
पहली गलती तो यही हुई कि सीपीए ने नगरीय क्षेत्र में मप्र वृक्षों का परिरक्षण अधिनियम 2001 के नियम के हिसाब से पेड़ों की नपाई करने की बजाय अंग्रेजों के जमाने के वन विभाग के नियम को अपना लिया। और उसी के हिसाब से ब्रेस्ट हाइट पर पेड़ों का तना नापा जाने लगा। गणित का सीधा नियम है:
वृत्त की गोलाई = व्यास × 3.14 (पाई) यानी अगर किसी पेड़ का व्यास 30 सेमी है, तो उसकी वास्तविक गोलाई 94 सेमी होगी।
गलती यह भी हुई कि- 30 सेमी को व्यास की जगह परिधि मान लिया गया। इस तरह गोलाई को व्यास मान लेने के कारण निगम ने व्यास की गणना का फार्मूला लगाया ही नहीं 3️⃣सितंबर 2020 में क्या बदला…
सितंबर 2020 में पेड़ कटाई की जिम्मेदारी सीपीए से नगर निगम को दे दी गई। यहीं सबसे बड़ी गड़बड़ी हुई। सीपीए जिस 30 सेमी व्यास को मानक मानता था नगर निगम ने उसे सीधे 30 सेमी परिधि मान लिया। यानी जहां 94 सेमी गोलाई वाला पेड़ माना जाना चाहिए था, वहां 30 सेमी गोलाई वाले पेड़ भी बिना पौधरोपण कटाई की श्रेणी में आ गए। एक पेड़ के बदले 10 पेड़ का शुल्क 14,500 रु… पूरे मप्र में क्षतिपूर्ति पौधरोपण को लेकर अलग अलग नियम हैं। भोपाल में एक पेड़ के बदले में 10 पेड़ के बराबर शुल्क 14 हजार 500 रुपए जमा कराए जा रहे हैं। सरकारी आंकड़ों के अनुसार भोपाल में पिछले पांच साल में करीब 20 हजार पेड़ काटे गए हैं। लेकिन ये आंकड़े उन्हीं पेड़ों के हैं, जिन्हें रिकॉर्ड में 30 सेमी या अधिक का दिखाया गया। हो सकता है स्टाफ को भ्रम हो, इसे दूर कराएंगे… हो सकता है कि पेड़ों की गिनती करने के मामले में डायमीटर और गिर्थ (गोलाई)की समझ और कानून के प्रावधान को लेकर फील्ड स्टाफ को भ्रम हो। हम इसे दूर कराएंगे और कानून के अनुसार ही कटाई हो, यह सुनिश्चित करेंगे। -संस्कृति जैन, कमिश्नर, नगर निगम
