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शास्त्रीय संगीत संघर्ष कर रहा है, पर आशावादी हैं:पद्मश्री उस्ताद वासिफुद्दीन डागर बोले- इतनी पीढ़ियों तक आया तो आगे भी जाएगा

शास्त्रीय संगीत आज स्ट्रगल कर रहा है। हमको सबको दिखाना तो पड़ेगा। हम लोग आशावादी है। इतनी पीढ़ियों तक आया है तो आगे भी जाएगा। कोई चीज जब शुरू हो जाती है तो खत्म नहीं होती। ये कहना है सुप्रसिद्ध संगीतज्ञ पद्मश्री उस्ताद वासिफुद्दीन डागर का। वे ग्वालियर में राजा मानसिंह संगीत विश्वविद्यालय में आयोजित तीन दिवसीय बैजू बाबरा महोत्सव शामिल होने आए थे। इस दौरान उन्होंने दैनिक भास्कर से खास बातचीत की। आपको बता दें कि ध्रुपद गायकी के एक प्रख्यात भारतीय शास्त्रीय गायक हैं, जो प्रसिद्ध डागर घराने की 20वीं पीढ़ी हैं। उन्हें भारत सरकार द्वारा पद्म श्री से सम्मानित किया गया। वासिफुद्दीन डागर अपने पिता उस्ताद नासिर फैयाजुद्दीन डागर के निधन के बाद एकल गायन कर रहे हैं और डागरवाणी ध्रुपद परंपरा के प्रमुख वाहक हैं। भास्कर से बातचीत उन्होंने ध्रुपद और ग्वालियर से जुड़ाव को लेकर कहा कि ध्रुपद को लेकर मैं अपनी रुचि क्या बताऊं मेरे पूर्वज यही करते हुए आए हैं हमें उसमें ढाल दिया गया। यही हमारा जीवन है यही हमारा खान है और यही हमारा पान है। और इसी को आगे भी खूब प्रचलित करना है। और ग्वालियर से तो ध्रुपद का पुराना जुड़ाव है राजा मानसिंह द्वारा इसका खूब प्रचार प्रसार किया गया। उसके बाद मियां तानसेन और पंडित बैजू बावरा द्वारा भी इसपर खूब काम किया गया। उन्होंने कहा कि ध्रुपद ही आधार है। उसके बाद ही संगीत की और विधाएं निकली हैं। चाहे ख्याल हो या ठुमरी हो या टप्पा हो। इसलिए इसे भारतीय संगीत की जननी भी कहा जाता है। वर्तमान में शास्त्रीय संगीत की स्थिति को लेकर उन्होंने कहा कि यह सही है कि आज के समय में उसे उतनी जगह नहीं मिल रही है। जितनी जगह उसे मिलनी चाहिए। और चीज़ें इतनी प्रचलित हो गई हैं। क्योंकि रेडियो पर आपको नहीं सुनाई पड़ता है। टीवी पर आपको ये दिखाई नहीं देता है। ले दे कर ये हमारी कुछ यूनिवर्सिटी तक या इस तरह के समारोह तक सीमित रह गया है। जबकि पॉप म्यूजिक को इतना जगह दे दी गई है। कि शास्त्रीय संगीत स्ट्रगल कर रहा है। उन्होंने कहा कि शास्त्रीय संगीत को दिखाने का काम सिर्फ दूरदर्शन का ही नहीं है अन्य इतने सारे प्राइवेट चैनल है। मैं किसी का नाम नहीं लूंगा। जो इतने रियल्टी शो चलते है। जिनमें रियलिटी कम नजर आती है। उन्हें भी शास्त्रीय संगीत का प्रस्तुतीकरण करना चाहिए। उन्हें भी तो ये सोचना चाहिए कि आखिर शास्त्रीय संगीत के लिए आप क्या कर रहे हैं। इतना ही नहीं आप तो उसे प्रस्तुत ही नहीं होने देते हैं। तो उन्हें इसके लिए भी स्थान देना चाहिए। इसके अलावा उन्होंने रेडियो और बॉलीवुड में भी शास्त्रीय संगीत की अनिवार्यता को लेकर जोर दिया।

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