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वैलेंटाइन नाइट पर ओशो जैन की सुरमयी महफिल:’देखा ही नहीं’ टूर का भोपाल में धमाकेदार आगाज; रवीन्द्र भवन में गूंजा मोहब्बत का संगीत

शहर के सांस्कृतिक केंद्र रवीन्द्र भवन के हंसध्वनि सभागार में शनिवार रात मोहब्बत, संगीत और शब्दों की ऐसी महफिल सजी, जिसमें हर उम्र के श्रोता देर तक डूबे रहे। मौका था इंडी सिंगर-सॉन्गराइटर ओशो जैन के ‘देखा ही नहीं’ इंडिया टूर के आगाज का। वैलेंटाइन डे की शाम 8:30 बजे जैसे ही सभागार की लाइटें मंद हुईं, सन्नाटा छा गया और मंच के पीछे से उभरी आवाज “बड़ी देरी से आए हो, बड़े दूर हो तुम… चलो अब ना सोचो, मेरे घर चलो…”। टेंजरिन ऑरेंज ब्लेजर में गिटार थामे ओशो के मंच पर आते ही तालियों की गड़गड़ाहट गूंज उठी। पहले ही गीत से दर्शक हुए मंत्रमुग्ध
कार्यक्रम की शुरुआत उन्होंने “इश्क ये हर बार नया कैसे लगता है…” से की। कुछ ही पलों में उन्होंने दर्शकों को लिरिक्स सिखाते हुए साथ गुनगुनाने के लिए प्रेरित किया। जेन-जी से लेकर मिलेनियल्स तक, हर कोई सुर में सुर मिलाता दिखा। सभागार की सभी सीटें भरी थीं और युवाओं में खासा उत्साह नजर आया। डायरी का किस्सा और सफर की कहानी मंच से ओशो ने अपने संघर्ष के दिनों का जिक्र भी किया। बताया कि एक दशक पहले दिल्ली के एक बुक स्टोर में उन्हें एक खूबसूरत डायरी पसंद आई, लेकिन कीमत ज्यादा होने के कारण उन्होंने नहीं खरीदी। साथ गए मित्र ने वह डायरी उन्हें उपहार में दे दी। उसी डायरी के पहले पन्ने पर लिखी पंक्तियां उन्होंने सुनाईं- “दौलतें, शौहरतें, हसरतें…हज़ारों, लाखों, अनगिनत ये चाहतें…तुझसे बढ़कर नहीं है…”इन पंक्तियों पर सभागार देर तक तालियों से गूंजता रहा। एक से बढ़कर एक प्रस्तुतियां कॉन्सर्ट में “मील के पत्थरों को मत देखो…”, “कोई भी ना मिलता है मुझसे…”, “मेरे खाली आसमां का तारा हो गया…”, “बहुत हुआ”, “जिसका चेहरा नकाब है प्यारे” और नए रिलीज गीतों की प्रस्तुति ने श्रोताओं को भावुक कर दिया। ओशो कभी बैंड के साथ झूमते दिखे तो कभी दर्शकों के बीच उतरकर ताल से ताल मिलाते रहे।

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