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राज्यसभा में दिग्विजय का विदाई भाषण,अटल जी की पंक्तियां दोहराईं:बोले- न मैं टायर्ड हूं न रिटायर्ड हूं, आगे चलकर और काम करेंगे

अगले तीन महीनों (अप्रैल से जुलाई के बीच) में राज्यसभा से रिटायर हो रहे 59 सांसदों को आज राज्यसभा में विदाई दी गई। इस दौरान एमपी से कांग्रेस के राज्यसभा सदस्य दिग्विजय सिंह ने भी विदाई भाषण दिया। पूर्व पीएम अटल जी की लाइनें सुनाई दिग्विजय सिंह ने राज्यसभा में कहा मैंने अपने राजनीतिक जीवन में अपना रास्ता खुद तय किया है। मैं कांग्रेस पार्टी का आभारी हूं जिन्होंने मुझे हर सदन में आने का मौका दिया। आज इस अवसर पर अटल जी की वो बात याद आती है कि मैं न टायर्ड हूं न रिटायर्ड हूं। आगे चलकर हम और काम करेंगे। मैं उन सदस्यों के प्रति आभार प्रकट करता हूं जिन लोगों ने मेरे लिए अच्छे शब्दों का प्रयोग किया। भाषण के अंत में बोले- न काहू से दोस्ती न काहू से बैर दिग्विजय अपने विदाई भाषण में करीब 5 मिनट बोले। अपने भाषण के अंत में उन्होंने कबीरदास जी की पंक्तियां दोहराईं। दिग्विजय ने कहा मैं अपने राजनीतिक जीवन में जैसा कबीरदास जी कह गए थे उन पंक्तियों पर चलता हूं। कबिरा खड़ा बाजार में मांगे सबकी खैर, न काहू से दोस्ती न काहू से बैर अब दिग्विजय का पूरा भाषण पढ़िए.. 22 साल की उम्र में नपाध्यक्ष बन गया दिग्विजय सिंह ने कहा कि लोगों को इस बात का आश्चर्य होगा कि छात्र जीवन में मेरा राजनीति से कोई संपर्क और संबंध नहीं था। कुछ परिस्थितियां इस प्रकार की बनीं कि मैं 22 साल की उम्र में सर्वसम्मति से नगर पालिका अध्यक्ष बन गया। 30 साल की उम्र में विधायक और 33 साल की उम्र में मंत्री बन गया, सांसद बन गया और 46 साल की उम्र में मुख्यमंत्री बन गया, लेकिन मैं हमेशा अपनी विचारधारा के मार्ग पर चला। कभी विचारधारा के साथ समझौता नहीं किया। किसी से कटुता नहीं पाली दिग्विजय ने कहा- मैंने अपने राजनीतिक जीवन में कभी किसी से कटुता नहीं पाली। मतभेद होते थे विचारधारा में मतभेद होंगे, लेकिन मनभेद होने का मैंने कभी मौका नहीं दिया। हो सकता है कि मेरे भाषण में कई बार कटुता आई हो किसी को बुरा लगा हो उसके लिए मैं क्षमा प्रार्थी हूं। जिनकी विचारधारा से सहमत नहीं, उनसे भी अच्छे संबंध दिग्विजय ने कहा- मैं इतना कह सकता हूं कि चाहे मप्र की विधानसभा में हो लोकसभा में हो चाहे यहां राज्यसभा में हो। मेरे संबंध उन लोगों के साथ भी बहुत अच्छे रहे हैं जिनकी विचारधारा से मैं कभी सहमत न था न हूं और न रहूंगा। जहां तक कॉमरेड्स का सवाल है। उनके कार्यसंचालन में कोई बात हो सकती है, लेकिन इनकी गरीबों के पक्ष में जो विचारधारा रहती है मैंने उसका हमेशा समर्थन किया है। अटल जी, राजीव गांधी के साथ लोकसभा में रहा मेरा सौभाग्य है कि मैं उस लोकसभा में भी रहा जिसमें अटल जी, राजीव जी, चंद्रशेखर जी भी थे। इंदिरा जी ने मुझे कांग्रेस में प्रवेश दिया। इन लोगों से प्रभावित होकर मैंने अपना राजनीतिक सफर पूरा किया है। सदन में जो डिस्टर्बेंस होते हैं मैं कभी भी उसके पक्ष में नहीं रहा। लोकतंत्र की बुनियाद है चर्चा और सदन में ये सत्तापक्ष की जवाबदारी होती है कि वो विपक्ष के साथ चर्चा होने के बाद और कोई रास्ता निकालें। इस सदन में हमारे अंसारी साहब भी चेयरमैन रहे हैं। उन्होंने कोई भी बिल दिन में पास होने का मौका नहीं दिया। रास्ता निकलता है यही लोकतंत्र की बुनियाद है जिसमें आज कमी देखने को मिलती है। आज इस देश में जिस प्रकार से साम्प्रदायिक कटुता, मनमुटाव बढ़ता जा रहा है ये देश के लिए उचित नहीं हैं। न हमारे संस्कार और संस्कृति न लोकतंत्र और भारतीय संविधान के लिए उचित है।

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