सतना के धारकुंडी आश्रम के 102 वर्षीय संत परमहंस स्वामी सच्चिदानंद महाराज का निधन हो गया। उनकी पार्थिव देह आज धारकुंडी आश्रम पहुंचेगी और सोमवार को उन्हें समाधि दी जाएगी। उनके अंतिम दर्शन के लिए मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव रविवार को दोपहर 3.40 बजे आश्रम पहुंचेंगे। परमहंस सच्चिदानंद महाराज ने मात्र 22 वर्ष की आयु में वैराग्य धारण किया और अपना पूरा जीवन मानव कल्याण तथा आध्यात्मिक उन्नति के लिए समर्पित कर दिया। उन्होंने ‘मानस बोध’ और ‘गीता बोध’ जैसे महत्वपूर्ण ग्रंथों की रचना की। इसके अलावा, आश्रम द्वारा उनके प्रवचनों और सारसंग्रह पर आधारित कई पुस्तकें प्रकाशित की गईं, जिनसे जिज्ञासु और साधक ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं। समाधि स्थल का चयन जीवन में ही किया मिली जानकारी के अनुसार, परमहंस सच्चिदानंद महाराज ने अपने जीवनकाल में ही समाधि स्थल का चयन कर लिया था। उनकी पार्थिव काया को धारकुंडी आश्रम के गर्भगृह में समाधि दी जाएगी। उनके गुरु भाई, चुनार के सक्तेशगढ़ आश्रम के संत स्वामी अडग़ड़ानंद महाराज शनिवार शाम को ही धारकुंडी आश्रम पहुंच गए हैं। इसके अलावा आश्रम के अन्य संत, श्री श्री 1008 रामायण महाराज, वीरेन्द्र कुमार महाराज और विजय महाराज भी उपस्थित हैं। सुरक्षा के लिए 500 पुलिसकर्मी तैनात धारकुंडी आश्रम में सुरक्षा के लिए लगभग 500 पुलिसकर्मी तैनात किए गए हैं। इसमें 200 जिला पुलिस बल, जबलपुर की छठी बटालियन से 60, रीवा पीटीएस से 150 और जेएनपीए सागर तथा जबलपुर जिला पुलिस बल से 60-60 पुलिसकर्मी शामिल हैं। रीवा और सतना की ओर से आने वाले श्रद्धालुओं के लिए आश्रम से लगभग 5 किलोमीटर पहले धारकुंडी अस्पताल के पास वाहन पार्किंग की व्यवस्था की गई है। पुलिस अधीक्षक हंसराज सिंह ने शनिवार शाम को आश्रम पहुंचकर सुरक्षा व्यवस्थाओं का जायजा लिया। प्रशासन और राजस्व विभाग के अधिकारी भी उनके साथ मौजूद रहे। विंध्य में शोक की लहर परमहंस स्वामी सच्चिदानंद महाराज के ब्रम्हलीन होने की खबर से पूरे विंध्य क्षेत्र में शोक की लहर है। उनके अनुयायी और अन्य संप्रदायों के लोग भी संत के प्रति कृतज्ञता व्यक्त कर रहे हैं। सांसद गणेश सिंह, चित्रकूट क्षेत्र के विधायक सुरेन्द्र सिंह गहरवार, नगर निगम परिषद के पूर्व अध्यक्ष सुधीर सिंह तोमर और संजय पटारिया सहित कई लोगों ने स्वामी सच्चिदानंद महाराज के निधन पर गहरा शोक व्यक्त किया है। धारकुंडी आश्रम को जानिए धारकुंडी नाम दो शब्दों, धार और कुंडी से बना है। धार का अर्थ है जलधारा और कुंडी का अर्थ है जलराशि। यह पवित्र जलधारा प्राकृतिक रूप में घने जंगलों से बहती है और वन्य जीवों के जीवन का आधार बनती है। धारकुंडी की भूमि भले ही भौतिक रूप से छोटी हो, लेकिन हमेशा से आध्यात्मिक ऊर्जा का स्रोत रही है। प्राचीन तीर्थस्थल और आध्यात्मिक महत्व जुड़ा धारकुंडी का शांत, एकांत और आनंदमय वातावरण हमेशा से आत्म-खोज करने वाले ऋषियों और साधुओं को आकर्षित करता रहा है। इसका इतिहास पांडवों के वनवास से भी जुड़ा है। हजारों वर्षों से यह अघमर्षन तीर्थस्थल माना जाता रहा है। आज भी राची-जप्तम में यहां विशाल मेला लगता है, जिसमें श्रद्धालु अघमर्षन कुंड में स्नान कर स्वयं को निर्मल पाते हैं। चित्रकूट के चौरासी कोश की परिक्रमा करने वाले तीर्थयात्रियों में धारकुंडी श्री भी शामिल हैं। इस प्रकार यह स्थल अनादिकाल से धार्मिक और आध्यात्मिक केंद्र रहा है।
