एमपी में सवा साल बाद नगरीय निकाय के चुनाव होने हैं। अर्बन लोकल बॉडी इलेक्शन के पहले बीजेपी ने कार्यकर्ताओं को नगरीय निकायों में एल्डरमैन बनाकर एडजस्ट करने का फॉर्मुला फाइनल कर लिया है। हफ्ते भर के भीतर प्रदेश के 413 नगरीय निकायों में नियुक्त होने वाले एल्डरमैन की लिस्ट घोषित हो सकती है। मिशन ‘निकाय चुनाव’: अनुभवी नेताओं को कमान भाजपा इस बार एल्डरमैन की नियुक्तियों को केवल पद भरने के तौर पर नहीं, बल्कि निकाय चुनावों से पहले कार्यकर्ताओं को एक्टिव करने के टूल के रूप में देख रही है। फॉर्मूले के तहत उन पुराने और अनुभवी नेताओं को प्राथमिकता दी गई है, जिन्हें नगर प्रशासन का गहरा ज्ञान है। रणनीति के पीछे दो मुख्य उद्देश्य कार्यकर्ताओं की नाराजगी दूर करना: चुनाव से पहले जिला स्तर के उन सक्रिय नेताओं को एडजेस्ट करना जो लंबे समय से नियुक्तियों का इंतजार कर रहे थे। प्रशासनिक पकड़: अनुभवी एल्डरमैन के जरिए परिषदों के कामकाज और विकास कार्यों की निगरानी को मजबूत करना चाहती है। बडे़ शहरों से लेकर छोटे कस्बों तक के लिए फॉर्मुला तय भाजपा संगठन में कई दौर के मंथन के बाद यह तय हुआ है कि नगरीय निकायों में 10 लाख से अधिक आबादी वाले 12 नगरीय निकायों में 4-4 एल्डरमैन की नियुक्ति की जाएगी। 10 लाख से कम आबादी वाले 4 नगर निगमों में 8-8 एल्डरमैन की नियुक्ति होगी। नगर पालिकाओं में 6-6 और नगर परिषदों में 4-4 एल्डरमैन की नियुक्ति का फॉर्मूला तय किया गया है। इस लिहाज से 99 नगर पालिकाओं में 594 और 298 नगर परिषदों में 1192 एल्डरमैन की नियुक्तियां होंगी। वहीं 16 नगर निगमों में कुल 80 एल्डरमैन नियुक्त होंगे। 413 निकायों में 18 सौ से ज्यादा वर्कर हो सकते हैं एडजस्ट नियम और अधिकार: वोटिंग नहीं कर सकते प्रदेश के नगरीय निकायों में एल्डरमैन की नियुक्ति का मुख्य आधार प्रशासनिक अनुभव और नगर पालिका अधिनियम की जानकारी होता है। संगठन की सिफारिश पर नियुक्त होने वाले ये एल्डरमैन परिषद की बैठकों और चर्चाओं में तो सक्रिय रूप से भाग ले सकते हैं, लेकिन इनके पास मत (वोट) देने का अधिकार नहीं होता। इनका कार्यकाल परिषद के कार्यकाल के साथ ही समाप्त होता है। सरल शब्दों में कहें तो, ये परिषद के ‘मार्गदर्शक’ की भूमिका में होते हैं, ‘निर्णायक’ की नहीं।
