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तीन प्राचीन मंदिरों के शंभु… संयोग से तीनों ही स्वयंभू:नेवरी और बड़ वाले महादेव मंदिर 200 साल से अधिक पुराने, गुफा मंदिर का शिवलिंग 77 साल पहले प्रकट हुआ

शहर के तीन प्रमुख शिव मंदिर ऐसे हैं, जहां शिवलिंग को मानव द्वारा स्थापित नहीं, बल्कि स्वयं प्रकट यानी स्वयंभू माना जाता है। बात हो रही है, नेवरी स्थित मनकामेश्वर महादेव, सोमवारा के बड़ वाले महादेव और लालघाटी के प्रसिद्ध गुफा मंदिर की। नेवरी और बड़वाले महादेव का मंदिर 200 साल से भी ज्यादा पुराना बताया जाता है, जबकि गुफा मंदिर करीब 77 साल पुराना है। तीनों मंदिरों में सावन के सभी सोमवार व शिवरात्रि पर विशेष पूजा-अर्चना, अभिषेक और मेले का आयोजन होता है। हजारों भक्त यहां पहुंचते हैं। सावन सोमवार और महाशिवरात्रि पर भरता है मेला, दूर-दूर से दर्शन के लिए आते हैं हजारों श्रद्धालु नेवरी महादेव : 18वीं सदी का है मंदिर
मंदिर ट्रस्ट के वरिष्ठ उपाध्यक्ष सुनील श्रीवास्तव का कहना है कि मंदिर का निर्माण नवाबी काल में राजा किशन राव द्वारा कराया गया था। वे जागीरदार थे। वे अपनी भूमि पर खुदाई करा रहे थे, तब यह शिवलिंग भूमि में दबा दिखाई दिया। ये एक ही लंबे पत्थर से बना है। इसको डेढ़ फीट ही बाहर निकाला जा सका, जो अभी स्थापित है। करीब 4-5 फीट भूमि के भीतर है। ट्रस्ट सचिव 80 वर्षीय अधिवक्ता डीके सक्सेना बताते हैं कि पुरातत्व विभाग ने इसे 18वीं सदी का बताया है। ऐसा बोर्ड भी यहां लगा हुआ है। बड़ वाले महादेव : ​बरगद के नीचे प्रतिमा
कायस्थपुरा सोमवारा क्षेत्र स्थित बड़ वाले महादेव मंदिर में शिवलिंग एक विशाल वट वृक्ष के नीचे स्थित है। मंदिर सेवा समिति के प्रमुख संजय अग्रवाल का कहना है कि यहां शिवलिंग स्वयं प्रकट हुआ था। तब यहां ठहरे कुछ संतों ने इसे देखा था। उन्होंने यहां मढ़ैया बनवाई। कायस्थ समाज के लोगों ने काफी दिन मंदिर का संचालन किया। बाद में ट्रस्ट बना और निर्माण होने के साथ प्रसिद्धि भी बढ़ती गई। अब मंदिर का पुन: नवीनीकरण का कार्य चल रहा है। शिवरात्रि पर यहां से भव्य शिव बारात निकलती है। गुफा मंदिर : शिवलिंग के पास जलधारा
लालघाटी पहाड़ी पर बना गुफा शिव मंदिर राजधानी के सबसे अनोखे शिवधामों में शामिल है। शिवलिंग जहां है, वहां गुफा के भीतर से जलधारा झरने की तरह बहती रहती है। मंदिर के पुजारी सोनू शर्मा के अनुसार, मंदिर के प्रथम ब्रह्मलीन महंत नारायण दास त्यागी 1948 में उप्र से भोपाल आए थे। पहाड़ियों पर घूमते समय समय उन्होंने इस गुफा में शिवलिंग देखा। लोगों को बुलाकर चट्टानों के बीच दबे शिवलिंग को बाहर निकाला गया और पूजा प्रारंभ हुई। इसके बाद वे महंत यहीं रुक गए। 1980 में मंदिर का पुनरुद्धार हुआ।

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